Ideal: विवाह के दिन सुबह हुआ दुल्हन के पिता का निधन, पहले उठी बेटी की डोली, फिर निकली पिता की अर्थी

Ideal: विवाह के दिन सुबह में दुल्हन के पिता का निधन हो गया. इसके बावजूद लड़के के पिता ने आदर्श प्रस्तुत करते हुए मंदिर में विवाह करने का फैसला लिया.
Ideal: कहते हैं कि मुसीबत के समय ही इंसान की पहचान होती है, फिर वो चाहे रिश्तेदार हों या दोस्त. पूर्णिया में एक ऐसा ही वाकया सामने आया है, जहां बेटी का रिश्ता तय कर चुके पिता के निधन पर वर पक्ष ने बेटे का विवाह कर समाज के समक्ष अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है. सामाजिक जकड़न से निकलकर वर पक्ष के इस साहसपूर्ण फैसले की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है.
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मधुबनी कोरठबाड़ी निवासी महेश्वरी शरण ने अपनी पुत्री शिखा का रिश्ता प्रतापनगर निवासी अनुज कुमार चांद के पुत्र आभास के साथ तय किया था. विवाह 11 मई को था. दोनों ओर से विवाह की रस्म अदायगी भी हो रही थी. बारात शाम में आनी थी. लेकिन, विवाह की तैयारियों की खुशियां उस समय मातम में बदल गयीं, जब विवाह के दिन अहले सुबह लड़की के पिता का निधन हो गया.
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दुल्हन के पिता का निधन होने से वधू पक्ष के घर में कोहराम मच गया. एक तरफ पिता की अर्थी, तो दूसरी तरफ बेटी की डोली. उधर, लड़के वालों के यहां भी मायूसी छा गयी. आसपास के लोग आये. सगे-संबंधी से भी राय-मशविरा किया गया और पंडितों की सलाह ली गयी. जितने लोग उतनी बात. एक तरफ सामाजिक बंधन का डर, तो दूसरी तरफ एक बेटी के अरमान.
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लड़के के पिता अनुज कुमार चांद कहते हैं कि क्षण भर के लिए उन्हें सदमा लग गया. लेकिन, शुभचिंतकों और अपने सगे-संबंधियों की सलाह के बाद उन्होंने तय किया की विवाह किसी कीमत पर नहीं रुकेगा. तय हुआ कि मंदिर में विवाह की रस्म पूरी की जायेगी. बात हुई थी कि दोनों ओर से 5-5 लोग विवाह में शामिल होंगे. दोनों पक्ष सुखनगर स्थित शीतला मंदिर पहुंचे और पूरे विधि-विधान से विवाह की रस्म पूरी की गयी.
महेश्वरी शरण कहते हैं कि विवाह के फैसले से लोग इतने खुश थे कि पांच की बजाय पांच सौ से अधिक लोग मंदिर पहुंच गये. उन्होंने कहा कि ईश्वर के आगे किसी का वश नहीं चलता है, जो होना था, वह हो गया. लेकिन, मेरे मन में एक ही बात थी कि विवाह होना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. यह सोच कर मैंने यह फैसला किया.
विवाह के बाद लड़की के पिता की अर्थी निकाली गयी. इस मौके पर बड़ी संख्या में लोग जुटे थे. सभी की आंखें नम थीं. समाजसेवी पंकज श्रीवास्तव कहते हैं कि इस साहसिक कार्य के लिए वर पक्ष की जितनी भी प्रशंसा की जाये, कम होगी. डॉ संजीव कुमार सिन्हा का मानना है कि अब समय आ गया है, जब लोगों को समाज के दकियानूसी विचार से बाहर निकलना चाहिए. अनुज बाबू ने जो आज किया, उससे समाज को प्रेरणा लेनी चाहिए.
पूर्णिया से अरुण कुमार की रिपोर्ट
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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