कहानी : तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में...

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कहानी : तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में...

-पूनम मनु-

परिचय -शिक्षा : एम ए हिंदी

संप्रति : स्वतंत्र लेखन एक कहानी संग्रह 'समंदर मंथन तथा एक काव्य संग्रह'कविता है कि स्त्री है' इसके अलावा दो साझा काव्य संग्रह। ( हंस,नया ज्ञानोदय,वागर्थ, इंद्रप्रस्थ भारती,लमही, कथाबिम्ब, माटी, आभा किरण,हिन्दी चेतना, उत्पल,वसुधा, अहा! ज़िंदगी, जनसत्ता, विश्वगाथा, समाज कल्याण पत्रिका समेत कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित )

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मेरे प्रिय,

प्यार...
आज फिर तुम्हारी याद में हूँ. हाँ, याद... . भले अब तुम कहोगे...याद, भूलने के बाद की प्रक्रिया है. फिर भी मैं कहूँगी, याद में हूँ तुम्हारी. और भूलना..... वह तो मैं भूल ही गई थी कि किसे भूलना चाहिए...तुम्हें कि स्वयं को. बस इतना भर याद रहा.... स्वयं को याद रखती, तब भी तुम याद आते. तुम्हें भूलना चाहती, तब भी तुम याद आते. ये याद है कि यातना? इससे गुजरना तुम क्या जानो!


‘ओह! क्या हुआ...? तुमने मेरी उँगलियों के पोरों को छूआ... धत्त!. अब इनमें वह ललाई कहाँ है जो तुम्हारे नाम से ही मेरे गालों पर उतर आती थी. और उन हया भरे कपोलों को छूते ही सुर्ख हो जाते थे पोर. वैसे तुम्हारे नाम में क्या है लाल, जो मेरे कपोलों को रंग देता था. बताओ तो! नहीं बताओगे न, पता है मुझे... हर सवाल की खोह से बच-बच कर जो निकलते हो तुम!


अच्छा बताओ... मेरी हथेलियों पर अपनी अंगुलियाँ घुमाते-घुमाते कहाँ तक घूम आते हो तुम, बताओ! ऊँहूँ... न मानूँगी आज कुछ भी . चाहे रख लो अपने होंठों को मेरी अलकों-पलकों पर. चाहे रख लो अपनी अँखियों के धारे मेरी आँखों में. नहीं मानूँगी कहे बिना कि, ‘तुम बुरे हो!. बहुत बुरे!’

हंसो मत. बनाते हो बात. ओ...ओ... यूं ही रहने दो न अपनी बाहों के घेरे में. तुम इतना लंबा कुर्ता क्यों पहनते हो? क्या मेरे लिए... बोलो न... . ताकि इसकी लंबी-चौड़ी आस्तीन से ढाँप सको मुझे. एक बार तुम्हारे सीने से लगती हूँ तो कब हटती हूँ मैं जल्दी. क्या इसीलिए इत्मीनान से बैठे रहते हो मुझे गले से लगाए, यूं पीपल तले.


तुम्हारी साँसों की उफ! ये थमी-थमी-सी हरारत मुझे मदहोश करती है. जानते हो ना तुम!.
क्या तभी आँखें मूँदे बैठे रहते हो तुम कि तुम्हारी बाहरी हलचल से विकल हो जल्दी ही न हट जाऊँ तुम्हारे सीने से. अवश्य तुम सब जानते हो. मेरा सुख. मेरा दुःख. आ... आ... आ, तुम जब भी हथेलियों में भरते हो मेरा मुख याकि अपने जलते हुए लब रखते हो मेरे मस्तक पर मेरा मुखड़ा पूनम हो जाता है. तुम ही कहते हो न, कितनी प्यारी हो तुम. कितनी कोमल. कितनी सुंदर. कितनी भोली हैं तुम्हारी आँखें.... ‘भोली हिरनी-सी’


तुम्हारी हथेलियों में घिरे अपने मुखड़े को शुक्रिया कहती हूँ. जिसकी छुअन मेरी आत्मा को तृप्त करती है. उस घेरे के कुछ और कसे जाने तक... तुम्हारे मुख के अपने चेहरे पर झुके रहने की अवधि के मध्य ही , मैं निकाल लेती हूँ जीवन के लिए वह सामग्री, जो एक वृंद को जीवित रखने के लिए आवश्यक है. स्वयं को तसल्ली देती हूँ.


तुम अच्छे से जानते हो, सारी सामग्री एकत्रित करने में मुझे औरों से थोड़ा... अधिक वक़्त लगता है. ... तभी तो तुम थामे रखते हो मेरे मुख को अपनी हथेलियों में तब तक, जब तक तुम्हारे हाथों के घेरे को तोड़ते हुए मैं अपना मुख तुम्हारे सीने में छुपा नहीं लेती. या कि जब तक उस मौन पीपल की टहनियों से वो मधुर संगीत न फूट पड़ता.


‘मधुर संगीत... ’ पता नहीं किसी ने सुना है कि नहीं वह. हम तो सदा सुनते हैं . जब भी मिलते हैं. है ना! बताओ !!!
या ये मेरा मात्र एक भ्रम ही है कि- ‘तुम भी ये संगीत सुन पाते होगे. मेरी तरह. मुझे लेकर. बेशक कल्पनाओं में ही.’
मेरी अतृप्ति केवल मेरी नहीं होगी. तुम्हारी भी होगी. आभास है. तुम जब भी मिलते हो तृप्त करते हो मेरी दुनिया. मेरा जीवन . मेरी आत्मा और मेरा शरीर.
श... श... शरीर से मतलब को कब समझाना पड़ा तुम्हें. तुम तो पहली ही मुलाक़ात में समझ गए थे न कि ‘ये प्यासी है. शरीर से नहीं, आत्मा से.’ तभी तो सबसे पहले छूईं तुमने मेरी हथेलियाँ. अपनी बादामी आँखों को मेरी आँखों में उतारते हुए.
हाँ... बहुत गहरी हैं तुम्हारी आँखें. दो मिनट से भी कम समय में नाप आई थीं सब भीतर... है ना! याद है मुझे. तुम्हें अब हो न हो.
जब-जब भी उकताए जीवन से, समय मिला. जब जहां भी खाली हो गया कुछ . मैंने तुम तक दौड़ लगाई. खाली के भरे होने तक थमी रही तुम्हारे कदमों में. तुमने हौले से पोंछा कि सख्ताई से. मचल कर लगी ही रही तुम्हारे सीने से. तुम्हारी धड़कनें गिनने की औकात नहीं थी मेरी. इसलिए कभी गिनीं नहीं. कल्पनाओं में भी नहीं.


पर इसका ये मतलब तो नहीं, तुम हक़ीक़त में शर्मिंदा करोगे मुझे!
मैंने तुमसे कभी कोई गिला किया... ? कभी नहीं. मैं लड़ी-झगड़ी, प्यार में पगी... पर कभी बताया कि पिछले कई वर्षों से, कहने को एक दूसरे के ‘घने निकट’ हम सदा ही घर की चिंता घर पर रखकर आते रहे. एक दूसरे के सामीप्य को पर्दे की ओट से महसूस कर तृप्त होते रहे. पर ये तृप्ति कब-कब पूरी रही. कब अधूरी . बताया तुम्हें, नहीं!

मृगतृष्णा में भटकती हुई मैं. तुमसे मिलकर वास्तविकता में अपने घर, जब भी लौटी हूँ... कुछ जिरहें ही सही, कुछ बहसें ही सही, कुछ न कुछ लेकर लौटती रही हूँ मैं तुम्हारा. आज क्या लेकर लौटूँ? बताओ तुम! बता सकोगे!
नहीं!!!
बताओ मुझे... बताओ मुझे के नाम पर साफ बच निकलते हो तुम. ये अब तक न चुभता था. पर आज... तुम्हारा यूं बचकर निकलना, साल गया..... कुछ नहीं सूझा. चली आई. सारे रास्ते गिरे आंसुओं पर धूल जम गयी होगी ज़रूर. मोती तो नहीं हैं वे कि चुनता कोई. वे तो आँसू हैं मेरे . भला कोई क्यों चुनेगा. क्यों संभालेगा.

संभाले ही होते तो पति ने संभाले होते. भाई संभालता. बेटा संभालता. या तुम.... बस इतनी-सी ही तो दुनिया थी मेरी. बस इत्ती सी. चींटी बराबर.
चींटी, जिसे कोई भी मसल सकता है. मसल ही तो गई थी, बीसों साल पहले . अब तो अवशेष थे. जिन्हें देह के आवरण से ढंककर, आती रही तुम्हारे पास. फिर से ज़िंदा होने की ललक में...


पर आज... मेरे ही मुख से निकले दो अलफाज नंगा-सा कर गए मुझे. बाद इसके, इस नंगेपन में कौन कितना नंगा हुआ... नहीं पता.
“हम्म, देखती हूँ. अभी नहीं कर पाऊँगी ऑर्डर. पर जल्द ही मंगाकर पढ़ूँगी तुम्हारी ये किताब” के मेरे आश्वासन पर तुम चुप न रह सके थे.
“कंजूस हो पूरी... एक किताब तक खरीदकर नहीं पढ़ सकती.” तुमने मेरा उपहास उड़ाते ऐसे कहा था जैसे तुम ही हर बार मुझे किताब खरीदकर देते हो. जबकि एक चवन्नी भी तुमने आजतक मुझ पर खर्च नहीं की थी. तड़प गई थी भीतर ही भीतर, उस पर ढेर सारा मलाल. साथ ही ऊपर तक भरा हलाहल, अचानक जाने कैसे छलक गया...

“ऐ, मुझे कंजूस मत कहो!. आजकल घर की स्थिति सही नहीं चल रही . बहुत दिनों से रमण जी घर में पैसा कम दे रहे हैं. वे मुझसे नहीं किसी और से प्रेम करते हैं. शादी से पहले से ही.”
उफ!
इस छलके हलाहल पर मैं एकदम से बदहवास ही हो गई थी-‘कि हाय! ये क्या लिखकर भेज दिया मैंने!’ मुझे अभी कुछ सूझा ही नहीं था कि एक पल से भी कम समय में, इसके जवाब में भेजा तुम्हारा ये मैसेज, यूं लगा हँसकर तमाचा मारा तुमने मेरे मलाल पर---“ तुम भी तो करती हो किसी से प्रेम. वे करते हैं तो क्या गलत करते है .”


हाय! ....क्या मार गया मुझे? तुम्हारा हास, मेरा उपहास. कुछ चिर गया भीतर.
बिन सोचे बोले कि तुम्हें कुछ फर्क नहीं पड़ा था. वर्ना कहने से पहले तनिक सोचते तो.
‘यदि शादी से पूर्व ही किसी से प्रेम था तो फिर किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने की क्या आवश्यकता थी.’ अपना रोष व्यक्त करते.
संभवतः कोई मलाल छाती में घर नहीं कर गया था तुम्हारे . एक नॉर्मल बात लगी शायद. उसके लिए जो तुमसे लिपट-लिपट रोज जीवन राग गाती रही. सारी दुनिया को भूल केवल तुम्हें याद रखती रही. उसके जीवन के इस कड़वे सच का सामना तुमने हास से किया. हल्के में कैसे ले लिया तुमने उसका जीवन? क्या उसका जीवन राग अब तुम्हारे वास्ते मूल्यहीन हो गया था. कैसे धक्का नहीं लगा तुम्हें ? कैसे नहीं सोचा उसके वास्ते रत्ती भर भी कि इतनी मुस्कान लिए भर-भर प्रेम उमेड़ती तुम पर यह स्त्री भीतर से कितनी रिक्त और कितनी बिखरी हुई है? कराह निकलती मुख से. हास नहीं!

नहीं सोचा, जाने कितनी-कितनी पीड़ाओ से भरी होती होगी इसकी रात. जाने कितनी अवहेलनाओं से भरा होता होगा इसका दिन. आह! किसके वास्ते जीती है. किसके सहारे. कौन सींचता होगा इसे . कौन...? किसके प्रेम में लगाए इसने अपने मन में कल्पित हरियाले बाग. कौन इसके बंजर मन में हरियाली उपजाता होगा? उलटे कहा- “जाने दो! मस्त रहो”.
मस्त!!!

कहानी : तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में...


कैसे रहते हैं प्रिय, मस्त?
जब कहने को भी दुनिया में आपका कोई न हो. दुःख में . तकलीफ में . परेशानी में . ना माँ, ना पिता, न भाई, न बहन, ना पति, ना मित्र, ना सखी... पूरी दुनिया खाली वीरान.
बच्चे भी उदास हो ताकते हैं मुख कई बार- “माँ, हमारा कोई नहीं.”
“ना... मैं हूँ ना” कहते हुए सिसक उठती हूँ मैं. तब तुम याद नहीं आते. याद रहती हैं, आने वाली दुश्वारियाँ. और उससे निपटने की रणनीति. जीवननीति काम जो नहीं आई कभी. न आएगी. भली-भांति जानती हूँ मैं.
तुम कितना पसीज गए थे मेरे दर्द से. भले कहने को कहा ‘मस्त रहो.’
कहते हो- ‘लड़ना-झगड़ना मत भूलना’
कैसे लड़ते है लोग, अपने उपदेशक से? एक बेगाने से. प्रिय बताओ तो!
क्या छीना आज तुमने मुझसे. क्या दिया. सोचना भी न चाहोगे शायद.


लेकिन मैं पूछती हूँ... आज तुम्हारे हाथों का कंपन कैसे थम गया मेरे वास्ते? कैसे वहाँ भी अकाल पड़ा. जहां मैंने अपने हाथों से बाग लगाए थे? मेरे रोज सींचते भी कैसे सूखा पड़ा वहाँ मेरे लिए. बताओ! आह! कौन बताएगा....?


रमण जी तो फिर भी भले इंसान थे. जिन्होंने पहली ही रात्रि में बताया कि ‘वो किसी और से प्रेम करते हैं.’ बिना ये सोचे कि-अब बताने से क्या लाभ. बताते तो तब बताते जब इस पर कोई निर्णय लिया जा सकता. इससे परे... बजाय नाराजगी के प्यार से संभाले मैंने वो पल. रमण जी की भलमनसाहत थी, उन्होंने बताया. पर मैं तो भली न थी. तभी तो खलनायिका की तरह अड़ गई कि-एकदिन अपने प्रेम से जीत लूँगी इन्हें. क्या कमी है मुझमें. मैं जीत लूँगी सब. पति को, ससुराल को, सारी दुनिया को.


किन्तु ... कहाँ जीत पाई कुछ भी. प्रयास पर प्रयास हर प्रयास विफल. विफल तो होना ही था, मूर्ख मैं कैसे न समझी थी कि हारे हुए को कौन जिता सकता है. हार तो तब ही गई थी, जब भाभी ने विदाई में, चुपके से कंधे पर हाथ रखकर कहा था- ‘जिस घर में तेरी डोली जा रही है. उस घर से अब तेरी अर्थी ही उठनी चाहिए. भाई का घर बर्बाद करने न आ जाना. जानती है न, पिता नहीं हैं तेरे.’
माँ का मुखड़ा देखकर खूब रोई थी उस पल. उस बेचारी को कब खबर लगी कि क्या आशीर्वाद दिया भाभी ने विदाई में. क्या शगुन डाला जाते उसकी झोली में. जिसने कन्यादान में एक साड़ी न दी. एक मंगलकामना न दी. उसने एक सीख दी कि कैसे एक ही पल में कर दी जाती हैं बेटियाँ पराई. एक रहस्य से पर्दा उठाया कि क्यों एक नारी ही नारी की दुश्मन है. क्यों एक माँ की आँखें सदा नम रहती हैं. हार गई वह स्वयं को उस पल में...तो बताओ फिर उसकी जीत कैसे होती?


फिर भी यकीन था भीतर कि स्वर्ण सुंदरी है वह. उसके मुकाबिले में कोई लड़की कब ठहर सकती है उसके पति के पास. प्रेम से भर देगी वह पति का जीवन.


नवजीवन के वे सुनहरे दिन... जो उन दोनों के होने चाहिए थे. वे सुनहरे दिन, पति को रास आने लगे थे स्यात. वह... वह तो सब भूल, प्रेम से लबालब पति पर भर-भर उमेड़ने लगी थी नेह. उसी के प्रेम की प्रतिमूर्ति उसके बच्चे. पर पता कब था, जो पहले से भरा हो, उसे कैसे भरा जा सकता है भला.


बच्चों के उजले मुखड़े भी कब दिखा पाए भटके राहगीर को राह. वहाँ अंधेरा था. केवल भ्रम रहा. मैं मशाल लिए घूमती रही. बेवकूफ. जिसकी मंजिल ही वह थी. उसके लिए कोई राह भटकी हुई कैसे होगी. कहीं अंधेरा क्यों होगा. सोचा नहीं.
पति क्रोधी थे. समय के साथ और क्रोधी होते गए. घर की हर ज़िम्मेदारी उन्होंने पहली रात में ही मेरे कंधो पर बड़ी ईमानदारी से डाल दी थी. मैं मायके नहीं लौटी तो समझ गए. यह बोझ स्वेच्छा से उठाया है इसने. उनकी गलती भी कब थी. नहीं थी. वो तो ईमानदार निकले. बेईमान तो मैं थी. जो उनके जीवन में संकट पैदा करने रुक गई थी.
भाइयों को पता नहीं क्या दिखा था उनमें या कि मुझे बेगार समझकर टाल दिया गया मायके से. उस दिन जिह्वा पर लगा ताला माँ के स्वर्गवास के बाद भी नहीं खुला. क्या करना था खोलकर.
तुमने कहा... ‘तुम भी तो, किसी से प्रेम करती हो.’


प्रिय, कहते तो यह कहते- मैं भी तो प्रेम करता हूँ तुमसे. अपनी पत्नी के रहते हुए. पर नहीं कहा. कैसे कहते. प्रेम तो मैंने किया किसी और से.
यदि पति ज़रा भी परवाह करते मेरी. याकि थोड़ी भी हरियाली होती भीतर तो कभी न उतरती किसी दूसरे के बाग में. फिर भी प्रिय क्या चुराया किसी का मैंने? या तुम्हारा ही! कभी बताया तुम्हें कि- ‘भीतर आग है बहुत.’ तुम्हारे नजदीक आते भी आँच लगने दी तुम्हें!? आँच लगती तो क्या करते तुम?


बेचारी बनना कभी नहीं सुहाया. किसी को नहीं बताया. तुम्हें भी नहीं. स्वयं से भी छिपाया कि- ‘मैं केवल एक सूखा ठूंठ हूँ. जिसको कोई नहीं सींचता. ईश्वर भी नहीं. वह भी यदि जल देता है, तो हरियाली बचा लेता है. घना निर्दयी.
तुम कब जान सकोगे. जान ही नहीं सकते. जानने के लिए हृदय में प्रेम चाहिए. जो तुम्हारे हृदय में नहीं है. प्रेम नहीं था, कोई बात नहीं. प्रिय, मेरे प्रेम की लाज ही रख लेते! मित्रता की लाज रख लेते! कैसे रखते लाज ? वह भी तो नहीं आता तुम्हें. हमदर्दी है सबके लिए तुम्हारे दिल में. नहीं है तो, मेरे लिए प्रेम नहीं.
आग लगे प्रेम में... प्रेम! प्रेम!! प्रेम!!!


क्या मिला इसमें मुझे? पति को जब-जब भी प्रेम किया, उनके जिस्म से किसी और की बू आती रही. आत्मा तक भरी थी वह गंध. और तुम... तुम तो और भी भले हो. बहुत भले. “मस्त रहो. तुम भी तो किसी और से प्रेम करती हो. वे करते हैं तो क्या गलत करते हैं.” कितने सच्चे हैं तुम्हारे ये शब्द. कितनी मिठास है इनमें. कितना संबल दे रहे हैं तुम्हारे शब्द. सच, बहुत नाज है मुझे, तुमसे नेह भरा नाता जोड़कर.
नाता... जो केवल मैंने जोड़ा. जिसकी डोरी भी मेरी थी. रंग भी मेरा और मोह भी मेरा. आज पता चला. पर, हुक तो तुमने ही दिया होगा लगाने को. तभी तो ये जुड़ा या कि अटका रहा आज तक!


यूं तो कभी नहीं गिनाए तुम्हें मैंने अपने वे पल, कितना और कब-कब याद किया तुम्हें. परंतु इसका ये मतलब तो नहीं कि तुम कभी ये अनुमान भी न लगाते कि कोई तुम्हारे लिए कितना तड़पता है!
हिचकी को तुम देह की एक नैसर्गिक प्रक्रिया से अधिक नहीं मानते. जबकि इस लॉजिक को अच्छे से समझते भी, हर लगी हिचकी पर मेरे मुख से सदैव निकला कि ‘तुम याद करते होगे.’
याद... जिसका तुम्हारे जीवन से दूर-दूर तक नाता नहीं. बहुत तड़प के बाद कसकते मन से स्वीकार कर लिया था बहुत पहले मैने.
प्रेम में है ही क्या... विरह, आँसू, तड़प....कहा सबने. कई जगह पढ़ा भी.
प्रेम, विरह... आँसू... तड़प... नहीं तो! प्रेम तो तुम हो. हृदय ने कहा, मैंने मान लिया. मन ने कहा था-‘तुम में क्या नहीं. प्रेम का अंकुरण. जोबन और परिपक्वता के साथ सहजता भी.’ मैं मान गई.


ओशो ने कहा- ‘प्रेम तो बिखरा है, समेटा नहीं जा सकता. एक हृदय में.’ मैंने देखा, तुम्हारे हृदय में समूचे जगत के लिए प्रेम है. मेरे लिए भी होगा. सोचा. और अपने हृदय में बसा लिया तुम्हें.
तुम्हारा तिलिस्म भी गजब रहा देखो---
‘सुनो, एक इच्छा है... डूबते सूरज को देखते हुये कभी देर तक तुम्हारी हथेलियों को थामे रहूँ. क्या दोगे अपना हाथ मेरे हाथ में?’ एक दिन यूं ही बेचैन होकर कहा था तुमसे.
‘तुमने कहा था- बेशक’
फिर एक बार किसी अनुभूति में डूबे हुये मुख से निकला था-‘तुम्हारी पीठ से पीठ मिलाकर बैठना चाहती हूँ बहुत देर तक...’
तुमने हँसते हुये कहा था-‘बस!’
एक बार मैंने यूं ही पूछा था-‘क्या टाइम पास हूँ मैं तुम्हारा?’
तुमने कहा था-‘इतना समय नहीं है मेरे पास, जिसे पास करने के लिए मुझे किसी की आवश्यकता पड़े.’
तो बताओ मैं कैसे नहीं समझती कि तुम्हें भी मुझसे प्रेम है. बताओ... कैसे बचा पाती मैं स्वयं को तुम्हारे जादू से. बताओ! ओह! तुम्हारा रचा इंद्र्धनुष...
आज मैं झूम उठी तुमसे सांत्वना के प्रेम भरे बोल पाकर. आज पता चला प्रेम का नहीं, अपना नाता केवल हास- परिहास का था. यानि हम प्रेमी-प्रेमिका नहीं, देवर भाभी हुए. तुमने तो ये अनुभूत भी नहीं किया कि- इस सत्य के अचानक बाहर आने पर कितना दीन, कितना हीन महसूस किया था मैंने. पता नहीं, कैसे... कैसे निकल गया मुख से... हिच्च! स्वयं को कंजूस सुनकर तड़प उठी थी मैं....
प्रिय, प्रिय... मेरे प्रिय...


तुम अवश्य प्रेम जताना चाहते होगे. पर नहीं जता सके होगे. जानती हूँ मैं. मेरा दिल जानता है. पर ये दिमाग है न बेवकूफ, कहता है- तुम न एक प्रेमी का फर्ज अदा कर पाए. न एक मित्र का. तुम्हें सूझा तो बस हास. उफ़! कट गई मैं.
रमण जी, मेरे रमण जी जिनके घर में हूँ मैं. जिनका नाम मिला है मुझे. जिनके बच्चे मेरी इच्छा से मेरी गोदी में आए. भले वे किसी और से प्रेम करते थे. पर इतना कटाव इतना अपमान उनके साथ कभी नहीं महसूस किया मैंने. जितना कि तुम्हारे शब्दों ने छील दिया मुझे. गलती भारी गलती हुई. आज ये मौनी अमावस्या कैसे चाँदनी में आ गई. कैसे बता गई जरा भी किसी और को. उस किसी और को जिसे प्रेम करती आई.
कहते, सोचते तो जरा... इस स्त्री ने अपनी मर्यादा कभी नहीं लांघी. पति के कहीं और संबंध होने के बावजूद. क्या तूफान आ जाता यदि ऐसे पति के साथ में रहते वह भी पर पुरुष से संबंध बना लेती तो. क्या गज़ब हो जाता.


कुछ गज़ब नहीं होता यदि पुरुष उसके जितना ही उससे नेह करता तो सौंप देती वह भी, स्वयं को उसे. पर नहीं सौंपा. तुम्हें भी तो नही सौंपा. क्यूकि सौंपने न सौंपने से बहुत दूर... मैं तो नेह की अधिक प्यासी थी ना! पहले उस रिक्तता को भरता कोई तो तब पाता वह सम्पूर्ण समुन्द्र. नहीं तो बिलकुल नहीं. इसलिए एक अनाम-सी रेखा खिंची रही हम दोनों के मध्य भी. यह भी हो सकता है कि न तोड़ती मैं मर्यादा कभी. तुम्हें सूखा ही लौटा देती. जानते भी कि-प्रेम में देह गौण है. पर उस सीमा तक पहुँचते तो. न तुम में ललक थी. न मुझे ख़्वाहिश. तन जुड़े न जुड़ें. मन का जुड़ाव ज़रूरी था मेरे लिए. वही नहीं जुड़ा तब!
या तुम भी केवल देह के समर्पण को ही प्रेम समझते हो... मन को नहीं?
मैं पागल, बेकार ही सफ़ेद कागजों को तुम्हारे नाम से रंगती रही. इस बात से बिलकुल बेपरवाह कि तुम इस रिश्ते से कभी मन से नहीं जुड़े. आज पता चल गया सब. मेरी कल्पनाओं की उड़ानें बहुत-बहुत बहुत निष्ठुर निकलीं.


यदि, मेरे दुःख पर जरा-सा भी हाथ रखते तुम तो मैं आज हिलककर बताती तुम्हें कि कैसे रमण जी अपनी प्रेमिका की असमय हुई मृत्यु से टूट कर एक निर्जीव प्राणी मात्र रह गए थे. छह माह पहले कैंसर से हुई उसकी मृत्यु पर पूरे चार महीने का शोक मनाया था उन्होंने. पति से अलग मायके में रह रही अपनी प्रेमिका के इलाज़ में ब्याज पर भी पैसा लेकर लगाया था उन्होंने. और...बताती-घर में, हर खर्चे में कटौती और कटौती करते कितना थक गई हूँ मैं.


फिर ये भी तो बताती- मायके से मिले सारे गहने, पैसे सब बच्चो की परवरिश में लगा देने के बाद भी. हारी नहीं हूँ. और न हारूँगी. संघर्ष में हारना नहीं सीखा मैंने.
फिर ये भी कब छुपा पाती कि माँ ने भी ठीक अपनी ही माँ की तरह उसे समझाया था कि, ‘पति मर्द है. वह दस जगह मुंह मार सकता है. हो-हल्ला करने से बेहतर है, ठसक से उसकी विवाहिता के नाम पर उसके घर में रहना.’
ठसक!!
हाँ, बस ये नहीं बताया था माँ ने कि एक साधारण जन इक्कीसवीं सदी में, जो नौकरी से बीस हजार कमाता है. वह अगर दस जगह मुंह मारेगा तो घर में ठसक से रहने के लिए उसकी विवाहिता किसके आगे हाथ फैलाएगी. उसने भी नहीं पूछा. उसने तो बस ये पूछा था- “माँ, भले वो दस जगह मुंह मारें. पर क्या करूँ जो प्रेम केवल मुझे यानि अपनी विवाहिता से ही करें.”


कितना लताड़ दिया था माँ ने तब- “अरी चुप! कोई मर्द किसी स्त्री को प्रेम न करता... प्रेम जैसी चीज कुछ न होती. आग होती है बस.”
तब चुप रह गयी थी मैं उनकी लताड़ पर. पर आज होती माँ तो अवश्य पूछती उनसे ‘माँ ये आग क्या होती है? कहाँ मिलती है? वह भी ला सकती है क्या ऐसी आग जैसी आग उसके पति और उनकी प्रेमिका के बीच थी.’
पूछना चाहती थी वही बात तुमसे, जो माँ से न पूछ सकी थी तब. सब बताकर...
जानते हो? उनके आने से घर महक उठा हैं. जो नीरसता घर में दिखाई देती रही बरसों अब वह चहचाहट में बदल गई है. माता-पिता, बहन-भाई, बच्चे, सब प्रसन्न हैं. सब!


किन्तु मैं खुश क्यों नहीं हूँ? पूछती तुमसे.
ये... ये भी बताती- बहुत अकेलापन, बहुत वीरानापन है इन दिनों. लगता है छलावा है सब. मानो वह लौट आएगी और ये फिर..... अपने शक को तुम्हारे आगे प्रकट कर पूछती मैं कि बाकी के बचे जीवन को और भी बढ़िया तरीके से जीने के साधन तो नहीं कहीं हम? मैं गुपचुप कान में फुसफुसाती तुम्हारे कि वे छूते हैं तो लगता है कि उसके हिस्से का सुख था ये जो उसके जाने के बाद उसकी अनुपस्थिति में भी ‘उसके’ होने के एहसास को जीते हुए जिया जा रहा है. सब बनावटी. पर न बता पाई.कैसे बताती, जब सुनना नहीं था तुम्हें! जब तुम्हें मेरे गम से कुछ लेना-देना ही नहीं था. कैसे बताती.


आज वास्तविकता के धरातल से टकराते समझ आया कि कल्पनाएँ भी बहुत कुटिल होती हैं. क्रूर होती हैं. मनोहारी कल्पनाएँ एक तिलिस्म रचती हैं. मनुष्य फंस जाता है इस तिलिस्म में. फंस गए मनुष्य का समूचा बच पाना बहुत कठिन है. बहुत कठिन. जैसे तुम्हारे तिलिस्म से बच पाना कठिन है.


प्रिय,
अगर खरे होते तुम तो शुरुआत में ही, दोस्ती की आड़ लेकर, मेरा भ्रम दूर कर सकते थे कि “तुमसे प्रेम नहीं है मुझे” तब मैं भी अपने पति की बाहों में समाते हुए कभी, तुम्हारे सीने में समाने का एहसास न करती. सच!
पर कैसे बताते तुम... तुम्हें तो ऐसे ही आनंद आता होगा न ! भावुक स्त्रियों/ लड़कियों को अपने मोहजाल में फंसी देखकर. उनके मीठे मैसेज पढ़कर. वैसे कितनी फंसी हैं तुम्हारे इस तिलिस्म में? मेरी तरह कई और भी होंगी. है ना! इस बात से पूरी तरह अंजान कि जब उनका ये तिलिस्म टूटेगा. वे स्वयं को कितना, कितना ठगा हुआ महसूस करेंगी. अरे,एक शादीशुदा स्त्री तो दिल टूटने के दुःख में बुक्का फाड़कर रो भी नहीं सकती. किसी को बताना तो बहुत दूर की बात है.


देह से परे हृदय की चोट अधिक कष्टदायी है.पागलख़ानों में चिल्लाते,रेलवे प्लेटफार्मों के इर्द-गिर्द भटकते, बस स्टॉप के पास बड़बड़ाते वे सभी लोग... किन्हीं ऐसे ही तिलिस्मों के शिकार हैं. देखो! तुम जैसे लोग नहीं समझते. खैर...
मैं अब भी निराश नहीं हूँ. मैं जानना चाहती हूँ कि प्रेम क्या है... ? निःस्वार्थ प्रेम. और किसके पास मिलेगा... बताओ मुझे! मैं उससे प्रेम करना चाहती हूँ, आज भी. जो मुझसे प्रेम करे. या कोई तो हो ऐसा जिसमें प्रेम हो. केवल आग नहीं. बता सकोगे न... तुम्हारे उत्तर की प्रतीक्षा में...
जो अब तुम्हारी नहीं
......
मेघा ने पत्र को तहकर, डायरी के बीचोंबीच ठीक ऐसे रखा मानों वह उसे डाकखाने जाकर पोस्ट कर आई हो. बाकी उन सभी खतों के साथ जिन्हें उसने उसके नाम लिखे अवश्य थे. किन्तु जो पोस्ट नहीं किए थे. इसके बाद वह फूट-फूटकर रोने लगी. ऐसा हर बार होता था. वह अपना प्रेम तो मोबाइल मैसेज के जरिये उसे भेज देती थी. मगर अपना हर गुस्सा, अपना हर मलाल, अपना गिला, शिकवा, अपनी हर शिकायत एक खत में उसके नाम लिखकर,खत को डायरी में रख लेती थी.


शिरीष...जिसके नाम वे सारे शिकायती पत्र थे. वह शिरीष, जिससे मिलने के नाम पर वह केवल दो-तीन बार ही (दिल्ली पुस्तक मेले में )मिली थी. उसी से मोबाइल पर संदेशों के आदान-प्रदान पिछले पाँच-छह वर्षों से लगातार चल रहे थे. वैसे शिरीष, बहुत ही व्यस्त रहने वाला शख्स था. परंतु जब भी वह मोबाइल से कोई संदेश भेजती. वह तुरंत उसका जवाब देता. हालांकि इतने लंबे अंतराल में उसने उसे कभी एक दो बार (औपचारिक)से अधिक फोन भी नहीं किया था. न उसने ही. ये अजीब बात थी.


वह जल्द ही समझ गई कि-शिरीष को केवल हास-परिहास और विनोदी बातें ही अधिक पसंद हैं. उसे याद है, शुरू में उसने जब भी कहा-‘आज मैं बहुत उदास हूँ शिरीष....’
शिरीष की खेदभरी खामोशी उसके दिमाग से टकराई थी हर बार... ‘ओह! तो, तुम आराम करो. मुझे भी आज कई ज़रूरी काम हैं.”
“आराम... ” हैरत से ठगी-सी रह गई थी वह तब.
'मेरी उदासी का कारण तो पूछते शिरीष’उसके अटपटे से जवाब पर बुदबुदाई थी हर बार. पर इसके बाद उसने शिरीष से कभी नहीं कहा था कि वह उदास है... ‘उदास होते भी.’
हाँ, एक बात और... जब वह संदेश भेजती, तभी रिप्लाइ आता. नहीं तो चाहे वर्ष बीत जाये... कभी पूछता भी नहीं था कि क्या हुआ...कहाँ हो? सब ठीक है ना? तिसपर वह हमेशा रूठ जाती थी. हाँ, उसके रूठने पर उसने उसे कभी मनाया भी नहीं था. ये अलग बात थी.
उसे प्रेम में पगी बातें भी बहुत पसंद थीं. वह जब भी करती, सदा खुश रहता. वह जब भी पूछती “बताओ न मुझसे प्रेम करते हो...” हँसकर टाल देता. गोलमोल जवाब देता. असमंजस में रहती. सोचती करता ही होगा. वर्ना बात ही क्यों करता.


... “ठीक है, तुम नहीं करते तो, मत करो. मैं तो करती हूँ.” सोचा, अब तो कुछ कहेगा.
“अच्छाsss ..” वह हँसते हुये बोला था. बाद इसके वह ऐसे हो गया था, उसका उसे चाहना कोई बड़ी बात न हो.
‘आह! यहाँ भी ठग गई.’ कलेजे में दर्द की एक लहर उठी गहरे तक.
आँखों में भरा खारा पानी शिरीष के लिए नहीं था. वह तो भरे को उलीच रही थी. खाली होगा घड़ा, तभी तो भरा जाएगा उसमें ताज़ा जल. जिसे वह निर्मल कर देगा.


उसने घड़ी की ओर नज़र घुमाई. सुबह के पाँच बज रहे थे. वह उठी. हाथ मुंह धोकर उसने स्वयं को संयत किया. झाड़ू लेकर बाहर अपने छोटे से बगीचे में चली आई. बड़ी शांति से उसने अमरूद के बिखरे सभी पत्तों को एक जगह इकट्ठा किया. बाईं हाथ की मुट्ठी में दबे शिरीष के नाम के सभी पत्रों को पत्तों के बीच में रखकर आग के हवाले कर दिया.

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