कहानी : पारिश्रमिक

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कहानी : पारिश्रमिक

अखौरी दिव्या सिन्हा का यह कहानी लिखने का यह पहला प्रयास है. उनकी इस कोशिश को हम आपके सामने लेकर आये हैं, ताकि वे आगे भी लेखन जारी रखें. उन्होंने इस कहानी में एक कम आय वाले मजदूर के जीवन में उसके पारिश्रमिक और रिश्तों के महत्व को दर्शाया है.

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वार्डन- कौन है वो ?

सरोजनी-मेरे मोहल्ले में रहता है मणिपुर का है. इस बार जब मैं मणिपुर से आ रही थी तो मैंने पूछा, क्या तुम भी रांची चलना चाहोगे ? वहां कुछ काम नहीं था, इसके पास दिन भर बेकार बैठा रहता था अत: मैंने सोचा, स्कूल में काम लग जायेगा, कुछ कमा लेगा.

तीन दिनों का थकाऊ सफर तय कर सरोजनी, मोहिनी, संजय अन्नपूर्णा पब्लिक स्कूल पहुंचे थे. यह एक आवासीय विद्यालय था.

वार्डन- कमरे का चाबी ले लो और कमरे की सफाई कर लो. ये आगे प्ले ग्राउंड के पास का कोई एक कमरा की चाबी संजय को दे दो. सभी अपने अपने कमरे की सफाई में जुट गये. जाला साफ किया. फर्श की सफाई की. कमरे की चारपाई और कुर्सियों को पोंछा, फर्श को पानी से धोया. चार दिनों की थकाऊ यात्रा के बाद कमरे की सफाई करना सभी को और थका दिया.

दोपहर होने को था सरोजनी ने अपनी बहन से कहा (जो पेशे से एक नर्स थी) चलो चलकर लंच कर लें अन्यथा खत्म न हो जाये संजय को भी दे दो. भोजन के बाद पहला प्रश्न था चारपाइयों पर गद्दे नहीं है आराम कैसे करेंगे, सरोजनी अनुभवी थी जाकर स्टोर रूम से तीन गद्दे निकलवाये . माली काका ने आश्वस्त किया गद्दे धूप में सुखाये गये है. एक गद्दा संजय के लिए उसके कक्ष में भेज गद्दों को अपनी चारपाइयों में डालकर थोडी देर के लिए लेट गई.

तीन दिनों की यात्रा के कारण कब आंख लग गई पता ही नहीं चला. आंख खुली तो सूर्यास्त हो चुका था अंधेरा होने को था. झारखंड यूं तो एक हिंदीभाषी राज्य है लेकिन यह तीनों मणिपुर भाषा में बातें किया करते थे. शायद इससे उन्हें अपनापन का बोध होता था. साथ ही स्कूल की बातें दिल खोलकर कर सकते थे.

सरोजनी- चलो चलकर मीना मैम को बताते हैं. इस बार मेरे साथ मोहिनी और संजय आये हुए है. उनके लायक काम बताये.

मोहिनी- हां, हम दोनों की पारिश्रमिक कितनी होगी यह भी पूछ लेंगे. संजय ने भी अपनी सहमति जाहिर की.

मीना मैम उस विद्यालय की प्राचार्या थी. उसी परिसर में रहती थी और आफिस में शाम के 6 या 6:30 पर आती थी. मणिपुर उच्चारण के अनुसार मैम को मेम कहा जाता है.

सरोजनी- मेम यह मोहिनी है पेशे से एक नर्स है, एक सेशन के लिए आयी है. और संजय जो इंटरमीडिएट पास है वो भी आया है. यहां रहकर कुछ काम कर लेगा, कुछ पैसे कमा लेगा.

मीना मैम- अच्छा किया जो साथ लेते आयी तुम्हें कंपनी मिल जायेगी अकेला महसूस नहीं होगा. लेकिन मोहिनी को मैं नर्सरी और केजी की कक्षाएं ही दे सकती हूं और संजय को एकेडमिक नहीं बल्कि पीटीआई के रूप में देखरेख करना होगा. मोहिनी और संजय दोनों एक दूसरे को देखने लगे. फिर साहस बटोर कर पूछा हम दोनों का पारिश्रमिक कितना होगा

मीना मैम- डेढ़ हजार

यदि मणिपुर होता तो अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते लेकिन, यहां घर से इतनी दूर अनजान लोगों से भला क्या बहस करते ? वापस लौट जाने को जी चाहता था लेकिन तीन दिनों की थकाऊ यात्रा और फिर वापस जाने का रेल भाड़ा कहां से लाते ?

सरोजनी- चलो एक सेशन के लिए आये हैं, किसी तरह एक सेशन पूरा कर चले जायेंगे. संजय ने भी कलेजा थाम हामी भर दी.

हॉस्टल में खाने के पैसे नहीं देने पड़ते थे और लॉजिंग भी नि:शुल्क था. डेढ हजार हाथ में आयेंगे जिससे अन्य जरूरतें पूरी होगीं और कुछ पैसे संचय करेंगे. ताकि घर लौटते वक्त हाथ खाली न हो. कुछ सौगातें लेनी होगीं. वापस जाने का किराया बचाना होगा. इंद्रधनुषी सपने बुनने में बड़ा मजा आ रहा था.

दिनचर्या धीरे-धीरे सामान्य होने लगी. 5 बजे सुबह उठना,तैयार होकर 7 बजे विद्यालय पहुंचना. दोपहर 2 बजे तक कक्षाएं चलती थी. दोपहर का भोजन कर थोड़ा विश्राम करना. फिर शाम 7 बजे से 5 बजे तक सेल्फ स्टडी की कक्षाएं लगती थी. जिसमें बच्चों के साथ बैठना पड़ता था. उन्हें उनकी स्टडी में मदद करना होता था. फिर डिनर की एक-दो पाली चलती थी जिसमें बैठ रात्रि का भोजन करना और तब रात्रि के करीब 9 बजे अपने हॉस्टल के कमरे में आना. आपस में शिक्षिकाएं गप्प करती थीं.

इन तीनों की वार्तालाप हमेशा मणिपुर भाषा में हुआ करती थी. एक भाषा ही तो रह गया था जो तीनों को अपनेपन का बोध करता था, और किसी की शिकायत करनी होती थी तो वह भी धड़ल्ले से किया जा सकता था. भला कौन था उस परिसर में जो उनकी मणिपुरी भाषा समझ लेता ?

संजय की एक कमजोरी थी और वह थी उसकी प्रेमिका. जिसे उसने मणिपुर में छोड़ दिया था, इस आश्वासन के साथ की रांची (झारखंड) से ढेरों पैसे कमाकर लौटेगा. विवाह होगा और एक नयी जिंदगी का अगाज करेंगे.

यूं तो प्रेयसी से वियोग दर्द का सबब होता है और यदि एक दूसरे का हाल समाचार जानने के लिए फोन के पैसे न हो तो दर्द दिल की टीस बन जाती है, जो नश्तर की तरह चुभती रहती है. संजय महीने भर अपने सहकर्मियों से पैसे उधार मांगा करता और चुटुपालू

के पीसीओ टेलीफोन बूथ से अपनी प्रेयसी से बातें किया करता था. पैसे की कमी के कारण हमेशा महसूस होता मानो कुछ बातें अधूरी रह गयी हो. दर्द को सीने से लगा पीटीआई की डियूटी निभाता रहता था.

एक महीना ऐसा आया जब सभी नें उधार देने से इंकार कर दिया

भाई, इस महीनें तो मेरी मां की दवाईयों पर खर्च हो गया

मैनें नई जूते खरीद लिये

भाई, बुरा न मानना नई किताबें खरीदनें पडी

हर किसी की अपनी जरूरतें पूरी हुई लेकिल संजय की जरूरत पर किसी को दया नही आई. परिणाम हुआ कि संजय पूरा महीना अपनी प्रेयसी से बात न कर सका.

महीना पूरा हुआ, संजय आफिस के बाहर अपना पारिश्रमिक पाने का इंतजार कर रहा था. उसकी भी पारी आयी. पूरे डेढ़ हजार मिले. कुछ रूपये पिछले महीने लिये गये उधार में चुकाने मे चले गये. बचे रूपयों को ले वह सरपट चुटुपालू चौक की तरफ बढा. फोन मिलाकर मणिपुरी भाषा में शुरू हो गया. मन भर बातें की, आश्वस्त हो फोन रखा. चहेरे पर संतोष की मुस्कान फैल गयी. पसीना पोंछा और फिर पूछा कितना हुआ बिल

800 सौ रूपये

महीने भर की कमाई चंद मिनटों में हाथ से निकल गई थी, लेकिन संतोष की मुस्कान चहेरे पर थी. माथे से चिंता की लकीरें हट गई थीं.

संपर्क :बी 24, सिटी पार्क टाउनशिप

पोस्ट-लोधीपुर, शाहजहॉपुर 242001 उ0प्र0

मो0नं0-7905310383

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