कहानी : तीस साल

By Prabhat Khabar Digital Desk
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कहानी : तीस साल

-शहादत-

बेवफ़ा औरत का दूसरा नाम है. और मर्द का...??? शादी के वक्त सबिया की उम्र बीस साल थी. वह एक खूबसूरत और शांत स्वभाव की लड़की थी. उसके पतले और लाल होंठ, तीख़े नैन-नक्श और काले लंबे बाल जो उसकी कमर के नीचे तक लहराते रहते थे, उसकी खूबसूरती में चार-चांद लगाते थे. सबिया जितनी खूबसूरत थी उतनी ही दीनदार भी थी. स्कूल के दिनों से ही वह नमाज़ की पाबंद थी.

उसकी खूबसूरती और दीनदारी को देखते हुए बहुत पहले से ही उसके लिए रिश्ते आने शुरू हो गये थे. उसके वालिद साहब कई लड़कों को देखने भी गए थे और कितने ही रिश्तेदारों ने उन्हें कई ओर लड़कों के बारे में बताया भी था. लेकिन उनमें से कोई भी लड़का उन्हें अपनी खूबसूरत और पढ़ी-लिखी नेक लड़की के लिए जंचा नहीं था. किसी का रंग काला होता तो, किसी की नाक बड़ी होती, कोई रंग रूप में सुंदर होता तो अनपढ़ होता. किसी में दोनों खासियत होती तो उनके घर का माहौल समझ में नहीं आता. और जहां ये तीनों शर्त पूरी होती नज़र आती... तो फिर लड़का क्या करता है? इस पर आकर बात खत्म हो जाती.

इसी देखने-दिखाने में एक साल गुज़र गया था. लेकिन लड़कों को देखने का सिलसिला बदस्तूर जारी था. जिन दिनों यह सिलसिला चल रहा था उन्हीं दिनों एक रोज़ सबिया के वालिद साहब के एक पुराने दोस्त उनसे मिलने आए. शाम को खाना खाने के बाद बातचीत के दौरान जब सबिया के रिश्ते की बात चली तो उन्होंने अपने किसी करीबी के लड़के बारे में बताया था. साथ ही उन्हें उसे एक बार जरूर देख लेने की सलाह भी दी थी.

अपने दोस्त के जाने के एक सप्ताह बाद ही सबिया के वालिद साहब उनके यहां गए थे और लड़के को देख आए थे. लड़का देखते ही उनकी समझ में आ गया था. लड़का का नाम साकिब था. वह कपड़े की दुकान थी. देखने में वह एक लंबा-तगड़ा और खूबसूरत जवान था. उसके सिर पर काले और छोटे घुंघराले बाल थे. गाल भरे हुए और चमकदार. नाक-नक्श इतना बेहतर की अगर कोई उसे एक बार देख लेता तो दोबारा देखने की इच्छा जरूर करे. माथे पर नमाज़ पढ़ने का निशान था. जिससे पता चलता था कि वह खूबसूरत होने के साथ-साथ दीनदार भी है. घर पुराने समय का बना हुआ था, लेकिन था बहुत बड़ा.

कहानी : तीस साल

साकिब की दो बहनें थी. दोनों की शादी हो चुकी थी. वालिदैन के तौर पर सिर्फ वालिद साहब मौजूद थे जबकि वालिदा का बहुत पहले ही इंतकाल हो चुका था. यानी परिवार के नाम पर सिर्फ दो जन. सबिया के वालिद को न सिर्फ लड़का पसंद आया था बल्कि उसका घर, कारोबार और परिवार सब कुछ पसंद आ गया था. उन्होंने सोचा कि जब आए ही हुए है तो लगे हाथ सवा रुपया देकर क्यों न लड़के को रोक (बात पक्की करना) दिया जाएं. महीने भर में सगाई के साथ शादी भी कर दी जाएंगी. जब उन्होंने अपने मन की बात अपने होने वाले समधी के सामने रखी तो उन्होंने भी इस बात पर कोई एतराज़ नहीं किया. और खुशी-खुशी अपनी रज़ामंदी दे दी.

तय वक्त के अनुसार साकिब से सबिया की शादी हुई और वह दुल्हन बनकर अपनी ससुराल आ गई. साकिब ने जब पहली रात सबिया को देखा तो वह उसे बहुत पसंद आई थी. सबसे ज्यादा तो वह उसकी खूबसूरती और दीनदारी से प्रभावित हुआ. क्योंकि शादी वाली रात भी वह इशा और ताहज्ज़ुद की नमाज़ पढ़ना नहीं भूली थी. उसे उसका लाल रंगत लिए गोरा चेहरा और लंबे बाल बहुत आकर्षक और लुभावने लगे थे. वह जितनी देर घर में रहता सबिया के ही इर्द-गिर्द घूमता रहता. उससे छोटी-छोटी मज़ाक करता.

कभी जबर्दस्ती खींच कर अपने पास बैठा लेता. उसके बालों से खेलता और जब मन करता उसे अपनी बांहों में भरकर लेट जाता. वह उसकी चमकदार आँखों में अपनी स्नेह भरी और मुस्कुराती आँखों से झाँकता और फिर उसके लाल होठों को चूम लेता. अगर उसे घर से बाहर कहीं जाना होता, चाहे वह नमाज़ पढ़ने ही क्यों न जा रहा हो, सबिया को प्यार करना कभी नहीं भूलता. और न ही उसे बिना बताये कहीं जाता था.

और सबिया, सबिया को तो मानो बिन मांगी मुराद मिल गई थी. इतना बड़ा घर. जिसकी वह अकेली मालकिन. न कोई कहने वाला और न सुनने वाला. न सास, न ननदें. न देवरानी और न जेठानी. बस ससुर थे. वह भी बेचारे सुबह नाश्ता करने बाद अपने हमउम्रों के पास बैठने चले जाते और फिर दोपहर को खाने के वक्त ही आते. खाना खाकर फिर निकल जाते और शाम को मगरिब की नमाज़ के बाद लौटते. और इस सब पर इतना प्यार करने और चाहने वाला शौहर. एक औरत इससे ज्यादा की हसरत करती भी कहां है? चाहे वह कितनी ही समझदार और पढ़ी लिखी क्यों न हो?

वे दोनों अपनी इस नयी ज़िंदगी से कितने खुश थे यह तो उनके हर वक्त खिले चेहरें और चमकती आँखें खुद-ब-खुद बयां करती रहती थी. लेकिन जिस तरह अपनी रफ्तार से बहते पानी में उठती-गिरती लहरें उसकी सतह को एक समान नहीं रहने देती ठीक वैसे ही अपनी रफ्तार से चलती ज़िंदगी की गाड़ी को भी उसमें पैदा होने वाले हालात सदा एक से नहीं रहने देते.

घर की खुशगवार दुनिया से साकिब को जो राहत और सुकून भरे लम्हे मिल थे उन्हें उसके कारोबार की गिरती सेहत ने खराब कर दिया था. लाख कोशिश करने के बाद भी वह अपनी दुकान की स्थिति को संभाल नहीं पा रहा था. ग्राहक जैसे उसकी दुकान का रास्ता ही भूल गए थे. पहले जहां एक ही दिन में पांच-पांच हजार की दुकानदारी हो जाती थी वहीं अब बमुश्किल हजार तक पहुंच पाती थी. इसकी भी कई वजह थी. एक तो बाज़ार में उसके आस-पास ही कई ओर कपड़ों की दुकानें खुल गई थी. जिससे प्रतिस्पर्धा का माहौल बना गया था. दूसरा शादी और घर की अन्य व्यस्ताओं के चलते वह दुकान कम ही खोल पाता था. और जब खोलता तो ग्राहकों को न आता देख उसका जी ऊबता. पहले तो उसने सोचा शायद यह उसी की लापरवाही है. इसलिए उसने फज़र की नमाज़ पढ़ने के बाद ही दुकान पर आना और इशा की नमाज़ के बाद घर जाना शुरू किया. उसके इस समझदारी भरे कदम से दुकानदारी पर कुछ तो फर्क पड़ा था लेकिन सिर्फ एक हवा के झोंके की तरह. कुछ दिन तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन वक्त बीतने साथ फिर वही, ग्राहकों का इंतजार. उसकी समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? काफी सोच-विचार करने के बाद उसने कोई दूसरा काम करने की सोची.

पहले तो कई दिनों तक इस विचार को लेकर उसके मन में ही उधेड़-बुन होती रही थी कि वह क्या करे? क्या न करे? यह काम छोड़कर दूसरा काम क्या करे? कहां करे? ओर कैसे करे? जब उसे अपने आस-पास कोई भी काम अपने करने लायक नहीं दिखा तो फिर उसने विदेश जाने की सोची.

उसने यह सब सोच तो लिया था. लेकिन घर से जाना... वह भी दूसरे देश में. इतना आसान नहीं था. वालिद साहब तो किसी तरह मान भी जाएंगे. लेकिन सबिया को कैसे मनाएंगा? फिर इसी सोच-विचार में कई दिन बीत गए. जब उसे इसका थोड़ा सा सिरा हाथ लगा तो उसने अपने विदेश जाकर काम करने के विचार का ज़िक्र पहले तो अपने वालिद साहब के सामने किया. उसकी बात सुनने के बाद वह कुछ देर खामोश रहे, फिर उसकी ओर देखते हुए बोले, “तुम यहीं कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेते?”

“अब्बाजान, अगर यहां कोई दूसरा काम होता तो मैं जरूर करता... कहीं जाने की ज़रुरत ही क्या थी? चाहे कोई भी रोजगार हो जैसे सब ठप हो गए है... कितना भी चलाने की कोशिश करो, चलते ही नहीं.“

बेटे के इस उत्तर से लाजवाब वालिद साहब ने अपनी खामोशी के साथ उसे जाने की इज़ाजत दे दी थी.

अब्बा से इजाज़त मिलने की खुशी से फूले न समाते हुए उसने उसी रात थोड़ी समझदारी और कुछ प्यार भरी बातों के साथ सबिया को भी राज़ी कर लिया था. सबिया राज़ी तो हो गई थी लेकिन उसका मन बुझ गया था. साकिब ने इस ओर कोई ध्यान न दिया. उसे अपने जाने की तैयारी जो करनी थी.

सप्ताह भर के अंदर ही सब तैयारियां पूरी हो गई थी. जाने वाले दिन जब वह दरवाज़े से बाहर निकला तो सबिया दौड़ती हुई दरवाज़े पर आई और चौखट को कसकर पकड़कर खड़ी रह गई थी. अपने शौहर को इस तरह खुद से दूर जाता देखकर उसका चेहरा दुख और उदासी के मिले-जुले भाव से पीला पड़ गया था और इस पर जब उसकी नम आंखों ने बरसना शुरू किया तो उसकी पतली नाक सूखी मिर्च की तरह लाल हो उठी थी.

जाते हुए साकिब ने जब सबिया के रोने की सिसकियाँ सुनी तो जैसे उसके पैर जम गए. वह आगे बढ़ने की बजाय वापस उसकी ओर लौट आया. उसके चेहरे से आँसुओं को पोंछते हुए वह बोला, ‘अगर तुम इस तरह रोओगी तो मैं बिल्कुल भी जा नहीं पाऊंगा. बस कुछ दिनों की ही तो बात है. मैं फिर वापस आ जाऊँगा. तुम मेरा इंतज़ार करना और देखना मैं जल्दी ही लौट आऊंगा.”

अपने में ही गुम सबिया ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया तो साकिब ने उसकी कोमल और नर्म हाथों को आपने हाथों में थाम लिया और उन्हें धीरे से दबाते हुए कहा था, “बताओ, करोगी ना तुम मेरा इंतज़ार?”

प्यार और चाहत में डूबे उसके इन शब्दों को सुनकर सबिया ने अपनी झुकी पलकों को उठाया और धीरे से ‘हाँ’ में अपना सिर हिला दिया. खुशी से साकिब ने उसे अपनी बांहों में भर लिया था और उसके माथे को चूमकर विदा हो गया.

साकिब चला गया था. और सबिया अकेली रह गई थी. पर समय कभी अपनी रफ्तार नहीं भूलता. दिन बीता. रात आई. और जो रात बीती तो दिन आ गया. साकिब चला गया था. लेकिन वह अकेला नहीं गया. अपने साथ ले गया था, उसकी हँसी, उसका चैन, उसकी नींद और सुकून. और वह सबकुछ जो एक शादी-शुदा औरत की ज़िंदगी होती है. पहले जहां वह हर वक्त सजी-धजी बाग में किसी तितली की तरह पूरे घर में उड़ती फिरती थी वहीं अब किसी बेजान छाया की तरह बिस्तर पर पड़ी रहती थी. होठों ने मानो हंसना ही छोड़ दिया था. आंखों से नींदे रूठ गई थी और उन्होंने अपनी मुस्कुराती थिरकन को बंद कर दिया था. सजना संवरना तो जैसे वह भूल ही गई थी. साकिब के जाने के बाद वह बेजार और तन्हा हो गई थी. इतनी कि उसे एक दिन एक साल के बराबर लगता. वह खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करती. लेकिन करने के लिए कोई काम भी तो नहीं था. बस सारा दिन बिस्तर पर पड़ी रहती और साकिब को याद कर-करके रोती रहती. साकिब के चले जाने के बाद उसकी दिनचर्या कुछ इस प्रकार हो गई थी-

वह सुबह उठकर नमाज़ पढ़ती. फिर कुरान की तिलावत और जब ससुर आते तो उनके लिए नाश्ता बनाकर बैठकखाने में पहुँचा देती. इसके बाद फिर बिस्तर. दोपहर को उठती ज़ोहर की नमाज़ पढ़ती. खाना बनाती, दो चार कौर खुद खाती और फिर ससुर साहब के लिए दस्तरखान लगा देती. इसके बाद फिर बिस्तर. शाम में उठती तो असर की नमाज़ पढ़ती, फिर कुरान की तिलावत और मगरिब की नमाज़ के बाद खाना. खाना बनाने, खाने और खिलाने में इशा का वक्त हो जाता. इशा की नमाज़ पढ़कर फिर बिस्तर. बिस्तर ही मानो अब उसके लिए सबकुछ था. वही अब उसकी तंहाई और अकेलेपन का साझी था. वह सब बातें, सारे सपनें और अपने तमाम आँसू बिस्तर को सुपुर्द कर देती थी. साकिब के जाने के बाद अब वही उसके सपनों और अरमानों का राजदार था. वह उसी पर लेटकर अपने बीते दिनों की सुहावनी यादों में खो जाती और जब होश आता तो आने वाले कल के सपने बुनने लगती. अब उसके सभी अंदरुनी ख्यालात और जिस्मानी जरूरियात का अहम हिस्सा था बिस्तर.

जाने के कोई महीने भर बाद साकिब का पहला खत आया था. खत में उसने अपनी यात्रा का वर्णन और नए देश के बारे में लिखा था. उसने अपने काम और नए लोगों से हुई कुछके मुलाकातों के बारे में भी बताया था. इसके बाद खत को खत्म करते हुए उसने खासतौर से सबिया को संबोधित करते हुए लिखा था, “यहां खुश रहने और अच्छी ज़िंदगी जीने के तमाम साधन मौजूद है. लेकिन तुम नहीं हो ना इसलिए कुछ भी अच्छा नहीं लगता. बार बार तुम्हारी सूरत याद आती है. काम में लगा रहता हूँ तो वक्त कट जाता है लेकिन जैसे अकेला होता हूँ तो तुम्हारी यादें मुझे घेर लेती है. उस वक्त में सबसे ज्यादा उदास रहता हूँ. तुम्हारी यादों के सहारे तंहा रातें गुज़ार लेता हूँ. लेकिन तुम बिल्कुल भी उदास मत होना और मेरा इंतज़ार करना. मैं जल्दी ही लौट आऊंगा... मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ.” सबिया ने जब यह पढ़ा तो वह ऐसे खुश हुई जैसे किसी अंधारमय गुफा में चलते हुए व्यक्ति को कहीं दूर टिमटिमाता हुआ चिराग दिख जाए. सबिया ने खत को कई बार पढ़ा और हर बार पढ़ने के बाद उसको चूमा. वह उसे पढ़कर ऐसे हँसती, झूमती, इधर-उधर मटकती घूमती जैसे उस एक पेज के उस खत में ही उसकी ज़िंदगी का सारा आनंद समा गया हो.

इसके बाद सबिया ने भी उसे एक खत लिखा था. उसमें उसने उसकी यादों, खुद की तन्हाई और उसकी गैर-मौजूदगी में अपने उदास दिनों के बारे में लिखा था. महीना बाद फिर साकिब का खत और उसने फिर अपने काम, नए शहर और उसके द्वारा पूछी गई कई बातों का जवाब दिया था. इस तरह खत का एक सिलसिला शुरु हो गया. लेकिन जब साकिब का छठा खत आया तो सबिया अस्पताल में थी. उसने एक बेटे को जन्म दिया था. जिसका नाम उसने साकिब के नाम पर आकिब रखा था.

कहानी : तीस साल

इस बार खत में उसने आकिब के होने और उस वक्त साकिब की कमी को बड़ी शिद्दत से महसूस करने के बारे लिखा था. अब उसे उसके खत का इंतज़ार था. दिन-रात अपनी रफ्तार से गुजरने लगे और सप्ताह-महीनों बदलने लगे. दो महीने गुज़रने के बाद भी जब उधर से कोई जवाब नहीं आया तो उसने एक खत ओर लिखा. और फिर वही इंतज़ार. लेकिन इस बार भी उसका कोई जवाबी खत नहीं आया. और इसके बाद फिर कभी भी नहीं. जैसे उसने उसकी यादों से अपना पीछा छुड़ा लिया था या वह उसे लिखना ही भूल गया था. या शायद सबिया के खत उस तक पहुँचते ही नहीं थे. इस तरह उनके खतों का सिलसिला बंद हो गया था.

वक्त बीतता और सप्ताह और महीनों में तब्दील हो जाता. महीने बढ़कर साल में बदल जाते और साल बढ़कर दो से तीन और तीन से चार में. इस दौरान अगर कोई सबिया से साकिब के बारे में बात करता या उसके आने के बारे में पूछता तो वह सिर्फ यहीं जवाबी देती, “वह जल्दी ही लौट आएगा.” लेकिन दिन हवा की मानिन्द उड़ रहे थे और इन्हीं के साथ बढ़ रही थी घर चलाने की तंगी भी.

अभी तक वह गहने, कपड़े, गैरज़रूरी चीज़े बेचकर और मायके से मिली मद्द से किसी तरह घर चलाती रही थी. लेकिन जब आकिब को स्कूल में दाखिल कराया गया तो खर्चों में बढ़ोतरी का होना लाज़िमी था. उसे वह इस तरह तो बिल्कुल भी पूरा नहीं कर सकती थी. इसलिए उसने दहेज में मिली सिलाई मशीन को बाहर निकलवाया. जो अभी तक घर के अंदर वाले कमरे में रखी धूल फांक रही थी. उसने उसे झांडा-पोंछा और आस-पड़ोस की महिलाओं के कपड़े सीलने शुरु कर दिए.

उसने अब बिस्तर छोड़ दिया था. बिस्तर की जगह सिलाई मशीन ने ले ली थी. अब वही उसके सुख दुःख की साथी थी. हर एक बात की. उसके बुदबुदाने या बड़बड़ाने की. हताश होने या निराशा में डूबकर रोने की. बीती बातों की यादों में खो जाने या फिर उसके न आने से उपजी गमगीन पीड़ा की. वह सिलाई मशीन ही अब उसके लिए सबकुछ थी.

पाँच से छः साल बीते. आस-पड़ोस के लोग, नाते रिश्तेदार, सबिया की ननदें और उसके मायके वाले सब बार-बार साकिब के बारे में पूछती तो हर एक को वह एक ही जवाब देती, “वह जल्दी ही लौट आएगा.” उसके जवाब को सुनकर लोगों को जब तसल्ली नहीं तो वह फिर पूछते, “आखिर कब तक आएगा...? इतने दिन हो गए... सात साल कोई कम होते है... कमाने खाने के लिए... बस बहुत हुआ... अब अपने बच्चों में आ जाए....”

यह सुनकर सबिया चुप हो जाती और घर के अंदर जाकर रोने लगती. इसी दौरान आकिब के दादा का इंतकाल भी हो गया. साकिब जब अपने बाप के ज़नाजे में शरीक होने या इसके कई महीनों बाद तक भी नहीं आया तो फिर लोगों ने अटकलें लगाना शुरू कर दी कि अब वह शायद कभी नहीं आएगा. अगर उसे आने होता तो अब तक आ जाता. वह खुद से बाते करते, “चलो माना कि काम की वजह से वह पहले नहीं आ पाया था. पर अब कम से कम उसे अपनी बाप की मैय्यत पर तो आना ही चाहिए था. साला ऐसा भी क्या काम जो न जीतो का पता लेने दे और न मरो को ही देखने दे.”

लोग चाहे कुछ भी कहते रहे हो लेकिन सबिया को पूरा यकीन था कि वह जरूर आएगा. उसने उससे वादा जो किया था और इंतज़ार करने के लिए भी कहा था. वह उसका इंतज़ार करेगी. चाहे यह इंतज़ार उसकी आखिरी सांस तक ही क्यों न हो?

इंसान चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न करे, लेकिन वह चाह कर भी अपने मुताबिक जीवन नहीं जी सकता. उसे समाज में रहना है तो समाज के नियम को भी मानना पड़ेगा. ये बातें दबी नहीं थी. रह-रह कर इधर से उधर निकल ही आती. लोग उसकी दूसरी शादी की चर्चा करने लगे थे. उसके मायके और कुछ करीबी रिश्तेदारों द्वारा भी उसे दूसरी शादी के लिए कहा जाने लगा. पहले तो सबिया उनकी इस तरह की बातों को अनसुना करती रही. लेकिन जब उन्होंने उस पर अधिक दबाव बनाया तो उसने साफ इनकार कर दिया. उसने गुस्से में चीखते हुए कहा, सवह मर जाएगी. लेकिन दूसरी शादी नहीं करेगी. चाहे कुछ भी हो जाएं. शौहर न सही उसके पास उसका खुद का बेटा तो है. वह उसी के सहारे अपनी ज़िंदगी गुज़ार लेगी. और हो न हो आज नहीं तो कल साकिब भी लौट आएगा. उसे इंतज़ार करने के लिए कहा गया और वह वहीं करेगी... अपनी आखिरी सांस... उसका इंतज़ार.” उसका इस तरह दृढ़तापूर्वक दिया गया जवाब सुनकर सब सहम गए थे और फिर किसी ने उससे शादी के बारे में दोबारा बात नहीं की थी.

सबिया की सारी उम्मीदें अब अपने मासूम बेटे पर आ टिकी थी. उसकी ज़रूरतों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए वह दिन रात सिलाई में लगी रहती. उसने दिन देखा न रात. देखा तो बस अपना बेटा. वही जो अब उसके जीने का एकमात्र सहारा था. रमज़ान के बाद ईद से एक रात पहले चाँद रात को जब हर कोई अपने और अपनों के लिए खरीदारी करता. नए कपड़े सिलाता. नए जूते खरीदता और अपने परिवार में ईद की खुशियां मनाता तब सबिया बिना किसी प्रकार की रोशनी के बस एक छोटे से दिए के भरोसे पूरी पूरी रात कपड़े सिलने में बीता देती थी. वह काम की इतनी पक्की हो गई थी कि जिस समय जो कोई भी उसे कपड़ों के लिए कह देती वह उसी वक्त उसके कपड़े तैयार करके देती. यह कोई नहीं जानता था कि वह इतनी मेहनत क्यों करती है? अपनी ज़रूरत के लिए या फिर अपने दिल पर रखे यादों के उस पहाड़ को पिघालने के लिए जो अब उसके लिए किसी नासूर से कम नहीं था.

क्या चीज़ हैं यादे भी. दिलों में बसने वाली सबसे प्यारी चीज़. अगर किसी से प्यार हो तो यहीं यादें हर स्थिति में चाहे वह कितनी भी दुख भरी या असहनीय क्यों न हो स्वर्गीय सुख का एहसास कराती है. लेकिन जब अपना कोई प्रिय दूर जाता है तो यहीं यादें सुखी जीवन को भी नरक में तब्दील कर देती है. उस स्थिति में इंसान न तो जी पाता है और न ही मर पाता है. भौतिक रूप से वह जिंदा तो रहता है लेकिन प्राकृतिक रूप से उसके सपनें, खुशियां, आकांक्षाएं मर जाती है. मर जाती है जीने की सभी इच्छाएं. और इन सबका मर जाना, इंसान के वजूद के मर जाने के बराबर होता है.

छः से सात साल हुए. सात से आठ और इसी तरह दस. स्टेशन पर खड़ी ट्रेन जैसे किसी मुसाफिर का इंतज़ार नहीं करती ठीक उसी तरह वक्त और उम्र भी किसी का इंतज़ार नहीं करती. वह तो अपनी उसी रफ्तार से चलती जाती है. सूरज ढलता और उगता. चाँद सितारें भी चमकतें और बादल भी बरसते. समय भी अपनी रफ्तार से बीत रहा था. दस से पंद्रह साल हुए और पंद्रह से बीस. लेकिन इस दौरान सबिया ने एक बार भी न तो कभी उसके लौटने की उम्मीद छोड़ी और न ही हिम्मत हारी. वह भी उसी तरह अपनी जिंदगी जीती रही जैसे सभी जीते है. भ्रम में. एक उम्मीद और इंतज़ार के सहारे. उसके वे आख़िरी शब्द जो उसने उसकी ओर से मुँह फेरने से पहले कहे थे, आज भी उसके कानों में खटकते रहते हैं. वह अब भी उन्हें ऐसे ही सुनती है जैसे साकिब खुद उसके पास खड़ा कह रहा हो, “बताओ... करोगी ना तुम मेरा इंतज़ार....”

आकिब अब एक पढ़ा लिखा और मजबूत नौजवान बन चुका था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने किसी के यहां नौकरी करने के बजाय अपने वालिद की बंद पड़ी दुकान को ही दोबारा शुरू करने का इरादा किया. इसके लिए उसने कुछ पैसे अपने वालिदा से लिए और कुछ इधर–उधर से लेकर अपना कारोबार शुरू कर दिया. उसकी मेहनत और लगन से कारोबार चल निकला. वह हर रोज़ बाज़ार में होने वाली गतिविधियों को शाम को आकर अपनी अम्मी को सुनाता और उसे होने वाले मुनाफे के बारे में भी बताता. उसकी तरक्की के साथ घर के हालात भी सुधरने लगे थे. घर का सारा बोझ आकिब ने अपने कंधों पर उठा लिया था. लेकिन फिर भी सबिया ने सिलाई करना नहीं छोड़ा था. पर जब एक रोज़ आकिब ने इस उम्र में भी उनके काम करने पर एतराज़ किया तो बेटे की खुशी के लिए उसने उस मशीन को फिर से अंदर वाले कमरे में रखवा दिया था.

तीस साल बीत गए. आकिब पूरी तरह जवान हो गया. और सबिया बूढ़ी. उसके चेहरे की रंगत जो कभी किसी के दिल का सुकून और प्यार का केंद्र हुआ करती थी, खत्म हो गई थी. उसके काले लंबे बाल जो कभी किसी को हर वक्त अपनी गिरफ्त में रखते थे अब सफेद हो गए थे. पिछले कुछ साले से आकिब के लिए अब एक के बाद एक रिश्ते आ रहे थे. लेकिन सबिया उन सबको यह कहकर लौटा देती कि उसकी शादी तभी होगी जब उसके वालिद साहब लौट आयेंगे.

वालिद साहब. अगर उन्हें आना होता तो अब तक कभी के आ जाते. जो शख्स अपने बाप की मैय्यत पर नहीं आया और जिसने इतने साल बीतने के बाद भी अपने बीवी की खैरियत तक नहीं मालूम की वह अब क्या आएगा? मोहतरमा आप उन्हें तो भूल ही जाइये..., रिश्ता ठुकरा देने के बाद बेटियों के बाप उसे इस तरह सलाहएं देते हुए लौटते.

“भूल जाइये... ऐसे कैसे भूल जाएं...? आज नहीं तो कल, वह जरूर लौटकर आएगा. अल्लाह के घर से मुझे पूरी उम्मीद. फिर उन्होंने वादा भी तो किया था कि वह जरुर लौट आएगा... जहां इतने दिन इंतज़ार किया है थोड़ा ओर सही,” सबिया अपने आप से बुदबुदाती.

पिछले तीन-चार सालों से यही सब चल रहा था. न जाने वह कितने रिश्ते वालों को ठुकरा चुकी थी. कितने रिश्ते मना कर चुकी थी. अब तो लोग उससे नाराज़ रहने लगे थें. वह जो आकिब के सफल कारोबार ओर उसके सुंदर स्वस्थ शरीर के प्रशंसक थे और उसे अपना दामाद बनाने के लिए इच्छुक थे अब सबिया के मरने की दुआ मांगने लगे थे.

वह सितारों भरी एक सुहावनी रात थी. सबिया बैठखाने के पीछे आँगने में चरपाई पर लेटी है. वह लगातार आसमान में छिलमिलाते सितारों को देख रही है और याद कर रही है उन बीतों दिनों को जो उसने इस घर में बिताये हैं. तीस साल... तन्हाई, दुःख, तकलीफ और काँटों भरा एक लंबा सफर! उसने कैसे एक ऐसे शख्स के इंतज़ार में बीता दिया जो आने का वादा करके ही भूल गया था. इससे भी ज्यादा उसे अपनी शादी के बाद के दिन याद आए. वह दिन जो एक हसीन सपने की तरह थे. सुहावने, प्यारे और खुशियों भरे दिन. उनकी अवधि तो कम थी लेकिन वह उसकी ज़िंदगी के सबसे हसीन और यादगार दिन थे. उनसे पहले न तो उसने ऐसे दिन बिताये थे और न ही अब उसे ऐसे दिनों के वापस आने की आशा थी. चाहे साकिब भी लौटकर क्यों न आ जाए. ओह, साकिब. उसकी याद आते ही उसने अपनी आंखें बंद कर ली और नम आंखों से निकले दो पवित्र मोती जो उसके सब्र और इम्तिहान की निशानी थे उसके गालों को छूते हुए, कान की लौ को चूमकर तकिये में समा गए. न जाने कितने देर तक वह ऐसे ही आंखें बंद किए लेटी रही. ओर उस बीतते समय के हर पल में साकिब के साथ बिताएं उन दिनों की एक-एक याद ताज़ा होती गई. यादों का नश्तर जब बार-बार उसके मुरझाएं दिल में चुभने लगा और वह उसके जख्मों को फिर से हरा करने लगा तो उसने एक करवट बदली. पर चैन न मिला. दूसरी करवट बदली. फिर भी कुछ फर्क न पड़ा. जब यादों का वह तूफानी सैलाब उनके वश से बाहर हो गया तो वह वहां से उठी और अपने उसी बिस्तर पर जाकर लेट गई जिस पर न जाने कितनी रातें उसने साकिब के साथ बिताई थी. वह रातें जिनका फल आज आकिब के रूप में उसके सामने मौजूद है.

एक छोटा सा कस्बा जो पहले नगर में तब्दील होना शुरू हुआ था अब बीते तीस सालों में वह एक अच्छा खासा शहर बन चुका था. जिसकी आबादी हज़ारों से लाखों में हो गई थी और घर सैकड़ों से हजारों में बदल चुके थे. पहले जो सड़के टूटी-फूटी और धूल भरी होती थी वह अब पक्की और साफ-सुथरी बन चुकी थी. खेल के खाली मैदान जो कभी कस्बे के आस पास हुआ करते थे अब अपने स्थान से कई किमी दूर खिसक गए थें. अब उन स्थान पर फैक्ट्रियां, स्कूल, कॉलेज, मस्जिद, मंदिर और चर्चा उग आए थें. सड़कों पर जगह-जगह स्ट्रीट लाईटें लगी हुई थी. जो रात में भी खामोश शहर को दूर तक रोशन किए थी. इसी रात में जब पूरा शहर नींद की गोद में जा चुका था एक बुजुर्ग अपने साथ एक औरत और दो जवान बच्चों को लेकर जिनमें एक लड़का और दूसरी लड़की थी अपने घर को तलाश रहा था. वह इधर-उधर गलियों के चक्कर काटता और फिर वहीं आकर खड़ा हो जाता, जहां से चलता. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह किधर जाएं. इधर-उधर गलियों में जाता, मकानों को गौर से देखता और फिर लौट आता. कई बार सोचा कि किसी का दरवाज़ा ही खटखटा दें. लेकिन इतनी रात को वह किसका दरवाज़े खटखटाएं... अब तो लोग उसे पहचान भी नहीं पाएंगे....

उन तीनों को साथ लिए वह गलियों में भटक रहा है. ढूंढ रहा है वह घर जिसे वह तीस साल पहले छोड़कर गया था. रास्तों में चलते हुए वह घरों की दिवारों को हाथ से छूकर देख रहा है कि शायद कहीं यहीं उसका घर हो या इससे उसे अपने घर का पता चल जाएं. ऐसे ही चलते हुए वह उस गली में जा पहुँचा जहां आकिब का घर था. घर का दरवाज़ा खुला हुआ था और आकिब आँगन में बिछी उसी चारपाई पर लेटा हुआ है जिस पर इशा की नमाज़ के बाद उसकी वालिदा लेटी हुई थी. गर्मी और मच्छरों के काटने से उसने करवट बदली तो उसे घर के सामने कोई टहलता हुआ नज़र आया. पहले तो कुछ देर वह ऐसे ही लेटा हुआ उसे देखता रहा. लेकिन जब कई बार उसने उसे अपने दरवाज़े के सामने खड़ा देखा और वह उसे अंदर घुसने की कोशिश करता नज़र आया तो वह उठकर खड़ा हो गया. उसने सोचा कि कहीं चोर न हो. वह उठा और चप्पल पहनकर बाहर आ गया. आते ही उसने उससे पूछा, “कौन हो तुम... और यहां मेरे घर के दरवाज़े पर क्या ताकझांक कर रहे हो?”

“वो... वो... मैं यहां अपना घर ढूँढ रहा हूं.”

“तुम्हारा घर? यहां कहां से आया? यह तो मेरा घर है और वैसे भी इतना रात में कोई किसी का घर नहीं ढूंढ्‌ता? अगर ढूँढता है तो बस चोर?”

“चोर?”

“हाँ चोर.”

“भाई मैं बूढ़ा आदमी क्या आपको चोर लगता हूँ. जबकि मेरे साथ मेरी औरत और बच्चे भी है.”

“यही तो चोरी और ठगने का सबसे बढ़िया तरीका. मैं अभी पुलिस को बुलाता हूं.”

“पुलिस को... रुको भाई, पुलिस को मत बुलाओ... हम अभी यहां से चले जाते हैं.”

“ऐसे कैसे चले जाते हैं? आधी रात को तुम मेरे घर में ताकझांक कर रहे थे. इसकी खबर तो मैं पुलिस को जरूर दूंगा.”

“नहीं भाई... हम लोग चले जाते. हम रास्ता भूल गए थे.”

“तुम्हें जो भी कहना है पुलिस के सामने कहना. मैं अभी पुलिस को बुलाता हू.”

उनकी बातें सुनकर आस-पड़ोस के लोग भी जाग गए. क्या माज़रा है जानने के लिए वह सब आकिब के घर बाहर जमा होने लगे जहां वह उस बूढ़े व्यक्ति को बेवजह घर में ताकझांक करने के ज़ुर्म में पुलिस में देने के लिए कह रहा था. जबकि बूढ़ा आदमी लगातार जाने देने की मिन्नतें कर रहा था. बाहर हो रहे शोर की आवाज़ सुनकर सबिया की आंख खुल गई. वह भी मामले को जानने के लिए बाहर चली आई. हल्के नींद के नशे और सिर पर रखे आँचल में से झाँकते हुए जब उसने सामने देखा तो वह देखते ही पहचान गई. उसने लगभग चीखते हुए कहा, “आकिब... ये तू क्या कर रहा है... अरे ये तो तेरा बाप है... साकिब... साकिब जिसके इंतज़ार में मैं आज तक ज़िंदा हूं...?”

इतना कहकर वह दौड़ती हुई नीचे आई और साकिब से लिपट गई. खुशी से निकले आँसूओं को बहाते हुए वह बहुत देर तक उससे लिपटी रही. इसी हालत में जब उसने लोगो की भीड़ में एक अधेड़ उम्र की बुर्के में लिपटी औरत और दो बच्चों को देखा तो उसे साकिब से पूछा, “ये कौन है...?”

“ये मेरी बीवी और बच्चे हैं....”

“क्या...?”

“हाँ....”

साकिब का जवाब सुनकर सबिया उसी की बांहों में लुढ़क गई. और ऐसी लुढ़की की उसने फिर आंखें नही खोली. सिवाय कब्र के.

संपर्क मोबाइल नं.- 7065710789.

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