कहानी : आरंभ

By Prabhat Khabar Digital Desk
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-ध्रुव गुप्त-

रामेश्वर बाबू चालीस साल बाद जब अपने पैतृक मकान के आगे रिक्शे से अकेले उतरे तो उन्हें अपना घर पहचान में नहीं आ रहा था. पैंतालीस साल पहले नौकरी के सिलसिले में उन्होंने घर छोड़ा था. मां-बाप के जीते जी कुछ सालों तक आना-जाना लगा रहा.उनके गुजर जाने के बाद कभी लौटकर घर आने की इच्छा नहीं हुई. इस छोटे-से शहर में दो कमरों का छोटा-सा घर था उनका. उन्होंने ईश्वर का आभार प्रकट किया कि ढेर सारी जरूरतों के बीच भी उन्हें अपना पैतृक घर बेचने का कभी ख्याल भी नहीं आया.

देखभाल के अभाव में घर की दीवारों का प्लास्टर उखड़ गया था.उनपर काई जम आई थी.दरवाजे और खिड़कियों पर पीपल उग आए थे.सामने बड़ा सा सहन और पीपल का पेड़ था.पीपल बूढ़ा हो गया था.सहन मुहल्ले का कूड़ादान बन चुका था. अगले दो-चार दिनों में उन्होंने घर की सफाई और जरूरी मरम्मत करा ली. व्यवस्थित हो गए तो कुछ दिनों तक पुराने परिचितों और नातेदारों का आना लगा रहा, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी. लंबे समय तक घर से दूर रहने के कारण यहां के लोगों से उनका संपर्क टूट चुका था. कस्बे की नयी पीढ़ी के लिए वे अजूबा थे. पुरानी पीढ़ी के लिए घुसपैठिया.

कहानी : आरंभ

बारह साल पहले वे सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे. पटना में अपना छोटा-सा मकान बनवा लिया था. रिटायर होने के पहले उनके दो बेटे नौकरी पर लग गए थे. शादी के बाद दोनों बीवी-बच्चों के साथ घर छोड़कर जा चुके थे. कुछ साल से उनका घर आना-जाना बंद था. उनकी पत्नी को जीते जी दो बेटों के मां-बाप से मुंह फेर लेने का मलाल रहा. मगर खुद रामेश्वर बाबू को उनका यह रवैया अजीब नहीं लगा था. दोनों की कम आय वाली नौकरी थी. बढ़ते परिवार की जिम्मेदारियों और उनसे जुड़े तनाव धीरे-धीरे लोगों को अपनी जड़ों से काट ही देते हैं. वे खुद इस स्थिति के भुक्तभोगी रह चुके थे. इसीलिए उन्होंने बेटों से कभी कोई उम्मीद लगाईं ही नहीं थी.

रिटायरमेंट के पांचवें साल पत्नी गुजरी. तब उन्होंने बहुत अकेला महसूस किया था. महीनों तक गुमसुम रहे थे. पत्नी सीधी-सादी घरेलू औरत थी.कम बोलती थी और हमेशा व्यस्त रहती थी.वे खुद पारिवारिक मामलों में लापरवाह थे.पत्नी ने घर का सारा दायित्व अपने ऊपर ले रखा था.घर-परिवार के कामकाज में वह इस कदर डूब गई थी कि रामेश्वर बाबू से उसकी मुलाक़ात रात में बिस्तर पर ही होती थी.बिस्तर पर आते ही थकान के कारण गहरी नींद सो जाती थी.रामेश्वर बाबू की बड़ी इच्छा हुआ करती थी कि सोने से पहले पत्नी के साथ अपने सुख-दुख बांटते, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.बावजूद इसके उन्हें पत्नी पर कभी गुस्सा नहीं आया.उनकी गृहस्थी खड़ी करने और विपरीत परिस्थितियों में भी उसे चलाने की जद्दोजहद में उसकी तमाम कोमल भावनाएं मर चुकी थीं.संवादहीनता में ही दाम्पत्य के चालीस साल बीत गए.आज जीवन के इन आखिरी वर्षों में जब पत्नी की जरूरत उन्हें सबसे ज्यादा थी, वे अकेले हो चुके थे.

पत्नी के बाद उन्होंने सारा ध्यान छोटे बेटे पर लगा दिया.वह बहुत भोला-भाला था.शायद इसीलिए पत्नी उसे सबसे ज्यादा प्यार करती थी.पढ़ाई में वह बहुत कमजोर था और जैसे-तैसे बी.ए पास कर सका था.रामेश्वर बाबू ने उसकी नौकरी के लिए बहुत कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली.एक जगह पचास हजार की रिश्वत देकर धोखा भी खा गए.थक-हारकर उन्होंने प्रोविडेंट फंड के बचे पैसों से उसके लिए इलेक्ट्रॉनिक की एक दुकान खोल दी.दुकान चल निकली तो उसका ब्याह भी कर दिया.

रामेश्वर बाबू को कॉलेज के जमाने से पढ़ने का शौक था.कविताएं भी लिखते थे.नौकरी और पारिवारिक दायित्वों की आपाधापी में कविताई धीरे-धीरे छूट गई.पढ़ना स्थगित हो गया.छोटे बेटे की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद उन्होंने पढ़ाई फिर से शुरू कर दी.खाना-पीना बनाने के अलावा अपने सारे काम वे खुद करते थे.कमरे से बाहर कम ही निकलते थे.बेटे की गृहस्थी में हस्तक्षेप नहीं करते थे और चाहते थे कि दूसरे भी उनके जीवन में हस्तक्षेप नहीं करें.अपने एकांत में धीरे-धीरे परिवार के लिए वे कितने अप्रासंगिक और गैरजरूरी हो गए, इसका एहसास एक दिन उन्हें अचानक हुआ.सुबह टहलने के लिए बाहर निकल रहे थे कि बेटे के कमरे से बहू की एक बात सुनाई दे गई.मतलब यह था कि रामेश्वर बाबू को बैठे-बैठे हराम की खाने की आदत हो गई है.जवाब में बेटे ने कहा कि वह चाहते हुए भी बूढ़े को घर से नहीं निकाल सकता क्योंकि उसने घर अपने ही नाम से बना रखा है.

उस दिन पहली बार उन्हें अपना घर पराया लगा.वह घर जिसकी बुनियाद उन्होंने अपने हाथों से रखी थी और जिसकी एक-एक ईंट में उनका खून-पसीना शामिल था.वह घर जिसका सपना उनकी पत्नी ने ब्याह के पहले दिन से ही देखना शुरू कर दिया था.घर की दीवारें उन्हें काट खाने को दौड़ने लगी थीं.अगली सुबह एक बैग में अपने जरुरी सामान और झोले में किताबें लेकर किसी को बताए बगैर वे घर से निकल गए.बहू ने उन्हें जाते देखा, लेकिन पूछा कुछ नहीं.

अपने पैतृक घर में उन्हें कुछ दिनों तक अटपटा लगता रहा.फिर अकेले और बगैर किसी उम्मीद के जीने की आदत पड़ गई.सुबह दोनों जून का खाना वे एक बार बना लेते.दिन में खाने के बाद कोई किताब लेकर बैठ जाते.शाम को हाथ में छड़ी लिए कस्बे के बाहर तालाब की ओर निकल जाते.मछलियों को दाना खिलाते.डूबते सूरज और अपने घोंसलों की ओर लौटते पक्षियों को देर तक निहारते.अंधेरा ढल जाने के बाद घर लौटते और दिन का बचा खाना खाकर लेट जाते.बिजली यहां नहीं के बराबर रहती थी, सो रात में चाहते हुए भी पढ़ाई नहीं हो पाती.

रामेश्वर बाबू के आत्मनिर्वासन का यह छठा महीना था.एक शाम हमेशा की तरह पैदल तालाब की ओर जा रहे थे.दूसरी तरफ से रिक्शे से साठ-पैसठ साल की एक औरत आ रही थी.रामेश्वर बाबू ने सरसरी निगाह से उसे देखा तो पाया कि वह लगातार उन्हें घूर रही थी.रिक्शा आगे बढ़ जाने के बाद भी मुड़कर पीछे देख रही थी.चेहरा उन्हें जाना-पहचाना लगा.सहसा उनके दिमाग में कौंधा - सीता !' पैंतालीस साल का लंबा समय आदमी की देह और चेहरे पर जितने भी दाग-धब्बे छोड़ जाएं, आंखें और भंगिमाएं नहीं बदलतीं.हां, वह सीता ही थी.

कुछ दूर आगे जाकर रिक्शा रुक गया.वह रिक्शे से उतरकर इधर ही चली आ रही थी.पास आने के बाद उसने कहा - 'मुझे नहीं पहचाना आपने ? मैं सीता हूं.'

रामेश्वर बाबू उसे एकटक देख रहे थे.वक्त ने सब कुछ बदल दिया था उसका.खूबसूरत चेहरे पर झुर्रियां उग आई थीं.बड़ी-बड़ी आंखों के नीचे काले धब्बे पड़ गए थे.बाल आधे से ज्यादा सफेद हो चुके थे.आंखों पर मोटा चश्मा था.इतना ही कह सके - 'मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूं ?'

'मैंने सुना था कि आप रिटायरमेंट के बाद पटने में बस गए हैं.यहां कैसे ? कब तक रहना है यहां ?'

'छह महीनों से यहीं रह रहा हूं.बाकी का जीवन यहीं बिताने का निश्चय करके आया हूं.'

'आपकी पत्नी ? बच्चे? आपके तो तीन बेटे हैं न ?'

'पत्नी गुजर गई.दो बेटे मुझे छोड़कर चले गए.तीसरे को छोड़कर मैं चला आया.अब अकेला हूं. हां, तुमने अपने बारे में कुछ बताया नहीं.दुर्भाग्य से तुम्हारे बारे में मुझे कोई खबर नहीं मिल सकी.'

कुछ पलों तक चुप रहने के बाद वह बोली - 'आप घर पर ही हैं न ? मैं कल आपसे मिलने आऊंगी.'

वह बहुत उदास लग रही थी.रामेश्वर बाबू ने कुछ ज्यादा पूछना मुनासिब नहीं समझा.कहा - 'मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.'

सीता रिक्शे पर बैठ गई.वे उसे जाते हुए देखते रहे.उनका मन भींग आया था. तालाब तक जाना याद नहीं रहा.भारी क़दमों से घर लौट आए.

घर लौटकर बिस्तर पर पड़े तो स्मृतियों के बवंडर उठ रहे थे.सीता का पैंतालीस साल पुराना चेहरा याद आया.वह कॉलेज में उनसे दो साल जूनियर थी. वे फर्स्ट ईयर में थे तो उसने इंटर में दाखिला लिया था. गोरी, सुंदर, बड़ी-बड़ी आंखों और लंबे बालों वाली छुईमुई-सी लड़की. बेहद शर्मीली और आत्मकेंद्रित. हमेशा आंखें नीची करके चलती थी.युवा रामेश्वर उस जमाने में कविताएं लिखा करता था.उसकी कविताओं के केंद्र पर सीता कब अपना कब्ज़ा जमा बैठी, कुछ पता ही न चला उसे.

सीता को देखने के बाद उसकी दिनचर्या बदल गई.अपने व्यक्तित्व और साज-सज्जा के प्रति जागरुक रहने लगा.कॉलेज जाते समय बिना इस्तिरी के कपडे अब नहीं पहनता.बालों का डिजाइन बदल लिया.आधा घंटा पहले से कॉलेज मोड़ पर पान की दुकान पर उसका इंतजार करता.वह आगे बढ़ जाती तो उसके पीछे चल देता.महीनों बीत गए, मगर लड़की ने एक बार भी मुड़कर उसे नहीं देखा.कई दफा उसके बगल से भी गुजरा, मगर उसकी आंखें थीं कि उठती ही नहीं थीं.

सीता से उसकी पहली भेंट अकस्मात हुई. एक शाम वह हमेशा की तरह निरुद्देश्य भटक रहा था सड़कों पर.उसे एक मित्र मिला जो पटना यूनिवर्सिटी का छात्र था.वह रामेश्वर को अपने एक पुराने और रिटायर्ड शिक्षक के यहां ले गया.उसे आश्चर्य हुआ कि वह घर सीता का था.मास्टर साहब बीमार थे.घर के बरामदे में लेटे थे.बगल में दो-तीन कुर्सियां पड़ी थीं.बिजली गुम थी.वह मास्टर साहब को प्रणाम कर एक कुर्सी पर बैठ गया.मित्र ने उसका परिचय कॉलेज के मेधावी और होनहार छात्र के रूप में कराया.मास्टर साहब ने उससे इतिहास, सामान्य ज्ञान और फिल्मों से सम्बंधित कुछ सवाल किए जिनका एकदम सही-सही जवाब उसने दे दिया.

रामेश्वर की कुर्सी दरवाजे के सामने लगी थी.उसके वहां बैठने के साथ ही दरवाजे के पीछे आकर सीता खड़ी हो गई थी, मास्टर साहब मित्र से बातें कर रहे थे.रामेश्वर का ध्यान दरवाजे के पीछे था.सीता ने सबको चाय दी.चाय देते समय उसकी उंगलियों का स्पर्श रामेश्वर को रोमांचित कर गया.लौटते समय मास्टर साहब ने उसे कभी-कभी आते रहने को कहा.

उसके बाद उसका सीता के घर जाने का सिलसिला शुरू हो गया.पहले सप्ताह में एक बार, फिर दो बार और उसके बाद लगभग हर रोज.वह मास्टर साहब का अच्छा श्रोता साबित हुआ था.जबतक वह मौजूद रहता, सीता लगातार दरवाजे के पास खड़ी रहती.मास्टर साहब के कहने पर उसने सीता को अंग्रेजी और हिंदी की मुश्किल कविताएं समझानी शुरू कर दी.परिचय बढ़ा तो सीता को पढ़ने के लिए वह अपनी कविताएं देने लगा.

इस निकट संपर्क के बावजूद कॉलेज में सीता का पीछा करने का उसका सिलसिला बदस्तूर जारी रहा.फर्क इतना ही पड़ा कि उसकी मेहनत अब अलक्षित नहीं रह गई.सीता उसे देखती तो मुस्कुरा देती.नतीजतन रामेश्वर की कविताई परवान चढ़ने लगी.पहले वह रात में सीता के सपने देखता था, अब दिन में भी देखने लगा.सीता उसे लेकर क्या सोचती थी ? उसे कुछ-कुछ अनुमान जरूर था, मगर यकीन नहीं था.

एक बार किसी मित्र के यहां वह तंत्र-मंत्र की कोई पुस्तक पलट रहा था.उसका ध्यान वशीकरण मंत्र वाले अध्याय पर अटक गया.लिखा था कि चुटकी भर सिंदूर और गोबर का मिश्रण एक मंत्र-विशेष से सिद्ध कर यदि किसी स्त्री के माथे पर डाल दिया जाय तो वह अड़तालीस घंटे में मन्त्र सिद्ध करने वाले आदमी के पीछे चल देगी. रामेश्वर ने उस रात वही किया और अगली शाम मंत्रसिद्ध मिश्रण की पुड़िया लेकर पहुंच गया सीता के घर. हमेशा की तरह उस शाम भी बिजली गुम थी. उसने सीता से एक ग्लास पानी मांगा. वह पानी देकर मुड़ी कि उसने पूरी पुड़िया उसके माथे पर उलट दी.

रामेश्वर बेसब्री से मंत्र के प्रभाव का इंतजार करने लगा. इंतजार में देखते-देखते डेढ़ साल बीत गए.सीता ने न अपना प्यार प्रकट किया और न चलकर उसके पीछे आयी. उसके चक्कर में एक बार जमकर पिटाई जरूर हो गई बेचारे की.हुआ यह कि एक दिन कॉलेज के तीन गुंडा किस्म के लड़कों ने रास्ते में घेरकर सीता को कुछ अश्लील शब्द कहे.रामेश्वर को यह बर्दाश्त नहीं हुआ.बगैर आगे-पीछे सोचे वह गुंडों पर टूट पड़ा.तीनों ने मिलकर उसकी इस बुरी तरह पिटाई कर डाली कि उसकी नाक और मुंह से खून बहने लगा.वह सीता के सामने ही अपमानित हुआ था.इस घटना के बाद वह सप्ताह भर कॉलेज नहीं गया.सीता के घर भी नहीं.

घटना के आठवें दिन उसके घर पहुंचा तो मास्टर साहब कहीं निकले हुए थे.दरवाजे के पीछे से सीता ने पूछा - 'आप इतने दिनों तक क्यों नहीं आए ? बाबूजी रोज पूछते थे.'

'क्यों ?'

उस दिन बदमाशों ने आपको बहुत मारा था न.मेरे कारण.'

रामेश्वर को लगा कि वह पहली बार अकेली मिली है.यह अवसर है उसके लिए.आज अगर उसे अपने दिल की बात नहीं कह पाया तो शायद कभी न कह पाए.हिम्मत बटोर कर उसने कहा - 'मैं तुमसे कुछ कहूं ?'

'कहिए.'

'मैं तुमसे प्यार करता हूं.'

वह चुप रही.

रामेश्वर ने कहा - 'मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं सकता.'

सीता ने अब भी कुछ नहीं कहा.

रामेश्वर को इतना कुछ कह लेने के बाद पसीना छूटने लगा.वह थोड़ा डर भी गया था.पता नहीं सीता पर उसकी बातों की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी.शायद वह मास्टर साहब को यह बात बता दे.घबड़ाहट में वह उठा और बगैर कुछ कहे चल पड़ा.सीता ने उसे टोका नहीं.

उस शाम के बाद उसका सीता के घर जाने का सिलसिला बंद हो गया.वहां जाने का अब कोई अर्थ नहीं था.उसे जो कहना था, उसने कह दिया था.जवाब अब सीता को देना था.महीनों तक सीता ने उससे कोई बात नहीं की.रास्ते में मिलती तो निगाहें झुकाये गुजर जाती.इस बीच सीता का इंटर का रिजल्ट आ गया.वह फर्स्ट डिवीज़न में पास हुई थी.रामेश्वर उसे बधाई देने नहीं गया.कुछ महीनों बाद वह खुद भी फर्स्ट डिवीजन से बी.ए पास कर गया.सीता ने भी उसे बधाई नहीं दी.दोनों के बीच का ठंढापन और गहरा हो गया.

वह आगे की पढ़ाई के लिए पटना चला गया.कुछ महीनों बाद पता चला कि सीता की शादी उसी शहर में तय हो गई है.उसे सदमा लगा.उस रात उसके आंसू नहीं थमे.उसके प्यार को सीता ने अंतिम तौर पर ठुकरा दिया था.उसने सीता के नाम एक छोटा-सा पत्र लिखा.पत्र के शब्द उसे आज भी याद हैं -'तुम्हारी बेरुखी मेरी समझ में नहीं आई.मैंने तुम्हें भूलने की हर मुमकिन कोशिश की, लेकिन नहीं भूल सका.मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.तुम्हारे बगैर जीने की कल्पना भी मुझे डराती है.अगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह है तो अभी भी सब ख़त्म नहीं हुआ है.तुम्हारी सहमति मिलने पर मैं कोई रास्ता निकाल लूंगा.तुम एक बार अपने मन की बात जरूर लिखो ! तुम कुछ नहीं लिखोगी तो मैं जीवन भर परेशान रहूंगा.'

कहानी : आरंभ

रामेश्वर ने पत्र अपने मित्र के हाथों भिजवा दिया.पत्र का जवाब नहीं आया.कुछ दिनों बाद शादी का निमंत्रण मिला.वह नहीं गया.शादी की रात हॉस्टल का कमरा बंद कर रात भर रोता रहा.

दो साल बाद उसकी भी शादी हुई.फिर नौकरी.फिर बच्चे.जीवन एक बंधे-बंधाए ढर्रे पर चलने लगा.कुछ सालों तक सीता की याद आती रही, लेकिन बाद में उसने कोशिश कर उसकी स्मृतियों पर धूल की मोटी परत डाल दी.

अगले दिन चार बजे शाम को वह आयी. इतने सालों के बाद आज फिर उनका दिल बेतरह धड़क रहा था.अंदर तूफ़ान मचा हुआ था.सीता उनके सामने आकर बैठी तो वे तत्काल कुछ बोल न पाए.उसका मुंह ताकते रहे.

सीता ने कहा - 'आप बूढ़े हो गए हैं.'

रामेश्वर बाबू मुस्कुराए.कहा - 'बूढी तो तुम भी हो गई हो.' फिर कहा - 'तुमने अपने बारे में कुछ नहीं बताया.तुम्हारे पति कहां हैं ? कितने बच्चे हैं तुम्हारे ? तुम किसी स्कूल में पढ़ा रही थी न ?'

'हां, शादी के बाद मैंने ग्रेजुएशन और पी'जी किया.यहां के हाई स्कूल में पढ़ाने लगी.पति भी नौकरी करते थे.रिटायर होने के तीन साल बाद गुजर गए.उन्हें दिल का दौरा पड़ा था.मैं भी रिटायर हो चुकी हूं.'

रामेश्वर बाबू ने उसके पति के गुजर जाने का अफसोस प्रकट किया.कुछ देर खामोश रहने के बाद पूछा - 'बच्चे तो साथ हैं ?'

'बच्चे अब बच्चे कहां रहे ? बेटी का ब्याह बहुत पहले कर दिया था.उसके तीन बच्चे हैं.बेटा सिविल इंजीनियर है.रांची में पोस्टेड है.उसका भी ब्याह हो गया है.उनका आना-जाना कम ही होता है.'

रामेश्वर बाबू ने पूछा - 'तुमने कभी मुझे याद नहीं किया.न सुख में, न दुख में।'

'आपने कभी आकर देखा ? आपको भरोसा नहीं होगा कि घर की नौकरी मैंने आपके लिए की थी.आप तो मेरे घर आते नहीं.सोचा था कि घर के बाहर निकलूंगी तो कभी न कभी आप दिख जाएंगे.मैं घर से स्कूल के रास्ते में तीस बरसों तक आपकी तलाश करती रही.आपने अपने शहर से नाता ही तोड़ लिया था जैसे.'

'सच कहूं तो तुम्हारी बेरुखी से बहुत अपमानित महसूस किया था मैंने.कसम खाई थी कि जिंदगी में फिर नहीं मिलूंगा तुमसे.इसी वजह से अपने शहर आने की इच्छा भी नहीं हुई कभी.'

'तब मेरी उम्र महज अठारह साल थी.आपकी बात सुनकर मैं घबड़ा गई थी.हाथ-पैर कांपने लगे थे मेरे.दो-चार दिनों में संतुलित हुई तो मुझे लगा कि मेरे मन में भी आपके लिए वैसी ही भावनाएं हैं. मैंने आपको अपनी बात कहने का फैसला किया, लेकिन आप लौटकर नहीं आए.आपका पत्र आया था, लेकिन तबतक ब्याह की तैयारियां हो चुकी थीं.मैं साहस नहीं कर सकी.हां, आपमें हिम्मत होती तो आकर मुझे भगा ले जा सकते थे.मैं इनकार नहीं करती.'

रामेश्वर बाबू ने हैरानी से उसे देखते हुए कहा - 'लेकिन मुझे कैसे पता चलता कि तुम भी मुझे प्यार करती थी ?'

सीता ने मुस्कुराते हुए कहा - 'मैं बरसों साये की तरह आपके पीछे घंटों-घंटों खड़ी रही.मेरे पैर दुख जाया करते थे.आपकी समझ में तब भी नहीं आया ?

रामेश्वर बाबू शरमा गए.सोचने पर उन्हें अपनी बेवकूफी का अहसास हुआ.वे सिर्फ अपने मन की सोचते रहे, किसी दूसरे की भावनाओं का एहसास उन्हें नहीं हो सका.बात बदलने के लिए कहा - 'तुम्हें पता है, मैंने तुमपर जादू-टोने का प्रयोग किया था.मेरा जादू नाकाम हो गया.'

'आपका जादू नाकाम गया था. यह कैसे जान लिया आपने ? मैं तब भी आपके सपने देखकर सोती और जागती थी.आपको समझना चाहिए था.'

रामेश्वर बाबू अंदर गए.एक प्लेट में थोड़ी नमकीन और दो कप चाय लेकर लौटे.

'खाना आप खुद बनाते हैं ?'

'बस जैसे-तैसे कुछ बना लेता हूं.कभी तबीयत ठीक न हुई तो व्रत मानकर उपवास कर लेता हूं.'

चाय पीने के बाद उन्होंने कहा - 'मैं अकारण ही इतने साल तुम्हारे प्रति दुर्भावना पाले रहा.कभी तुम्हारी खोज-खबर नहीं ली.छह महीनों से यहां हूं, लेकिन मेरे मन में एक बार भी तुम्हारा ख्याल नहीं आया.मुझे क्षमा कर देना.'

सीता उठकर खड़ी हुई तो रामेश्वर बाबू ने उसका हाथ थाम लिया.वे भावुक हो चले थे.सीता ने कुछ नहीं कहा.उसकी आंखों से दो बूंद आंसू टपक पड़े.

रामेश्वर बाबू ने कहा - 'तुम्हें पता है, तुम अब भी अठारह साल की शर्मीली और बेवक़ूफ़ लड़की हो !'

तीन दिनों बाद रामेश्वर बाबू सीता के घर गए.

उसने कहा - 'मैं तीन दिनों से आपकी प्रतीक्षा कर रही थी.'

'मैंने सोचा कि हमारा रोज मिलना लोगों को शायद पसंद न आए.'

'आप भूल रहे हैं कि हमदोनों बूढ़े हो चुके हैं.'

'तुम ठीक कहती हो.तुमसे मिलकर उम्र का एहसास जाता रहा था.'

सीता ने पूछा - 'आप कविताएं अब भी लिखते हैं ?'

'तुम्हारे बाद कविता छूट गई.'

'मैंने आपकी तमाम कविताएं संभाल कर रखी हुई है.आपसे दुबारा मिलने के बाद उन्हें फिर पढ़ा था.'

रामेश्वर बाबू ने कुछ सोचकर कहा - 'तुम्हारे बिना अपना तीन चौथाई जीवन मैंने व्यर्थ कर दिया.'

सीता ने कहा - 'मुझे भी ऐसा ही लगता है.'

देर तक उनके बीच खामोशी छाई रही. भावनाओं के ज्वार में शब्द अप्रासंगिक हो गए थे शायद.रामेश्वर बाबू ने छड़ी उठाई और चुपचाप बाहर निकल गए.

अगले चार-पांच महीने दोनों के लिए अच्छे बीते.सप्ताह में दो-तीन बार उनकी मुलाकात हो जाती थी.कभी रामेश्वर बाबू सीता के घर जाते.कभी सीता उनके घर आती.घंटों-घंटों वे बातें करते.अपने परिवार के बारे में कम, अपने बारे में ज्यादा.ज्यादा बातें सीता ही करती. उसके पास अनुभवों का खजाना था जैसे.जिंदगी के एक-एक लम्हे का हिसाब उसके पास सुरक्षित था.रामेश्वर बाबू को उसकी बातें सुनकर हैरत होती थी.घटनाओं को जितनी गहराई और जितनी शिद्दत से उसने महसूस किया था, उसकी तुलना में उन्हें अपना जीवन एकदम सपाट लगने लगा.शाम को दोनों टहलने के लिए तालाब तक जाने लगे.साथ सूर्यास्त देखते और साथ घर लौटते.

उनका यह मेल-जोल उनके नातेदारों के बीच आहिस्ता-आहिस्ता चर्चा का विषय बना.एक-दो लोगों ने रहस्योद्घाटन किया कि दोनों के बीच कॉलेज के जमाने से लटपट था. जिंदगी की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद मन की दबी हुई आग फिर से भड़कने लगी है. पुराने लोगों की नजरें उन दोनों पर गड़ने लगी थी.उनका मिलना-जुलना तो कम तो नहीं हुआ, लेकिन तालाब की ओर साथ जाना उन्होंने बंद कर दिया.

एक बार सीता लगभग एक सप्ताह बाद रामेश्वर बाबू के घर आई.बहुत उदास थी.उदासी की वजह पूछने पर उसने कहा - 'तीन दिनों से मेरा बेटा आया है. कल उसने मुझसे सीधा सवाल किया कि आपसे मेरा क्या रिश्ता है. मुझे उससे इस सवाल की उम्मीद नहीं थी.'

'तुमने क्या कहा उससे ?'

'कहा कि आप मेरे कॉलेज के जमाने के दोस्त हैं.नौकरी से रिटायर होकर घर लौटे हैं.हम दोनों एक दूसरे से बातें कर अपना अकेलापन बांटते हैं.उसने कहा कि हमारे बारे में लोग चर्चाएं कर रहे हैं और यह बात उसे अच्छी नहीं लगी है.'

'फिर ?'

'उसने कहा कि मैं आपसे मिलना बंद कर दूं और अपना अकेलापन बांटने के लिए परसों उसके साथ रांची चली चलूं.उसने अपने और मेरे लिए दो टिकट भी बुक करवा लिये हैं.'

कहानी : आरंभ

रामेश्वर बाबू कांप गए.इतिहास एक बार फिर अपने को दुहरा रहा था.पिछले कुछ महीनों में उन्होंने बचे-खुचे जीवन की जितनी भी योजनाएं बनाई थीं, सीता को साथ लेकर बनायी थी.अब उसके बगैर एक बार फिर जीने की कल्पना उन्हें डराने लगी.उन्होंने कातर आंखों से सीता को देखा.

सीता ने कहा - 'हम स्त्रियों के जीवन में किसी मोड़ पर अपनी मर्जी से जीने की इजाजत नहीं है. बचपन में मां-बाप के अनुशासन में जीना होता है और जवानी में पति के. हद तो तब होती है जब बुढ़ापे में बच्चे भी अभिभावक बन बैठते हैं.'

कुछ देर तक दोनों खामोश रहे.

रामेश्वर बाबू बोले - 'तो फैसले की घड़ी आ गई है ?'

'हां.'

कुछ फैसला कर लें ?'

'नहीं, आप नहीं.इस बार फैसला मैं करुंगी.हम जवानी के दिनों की अपनी आखिरी मुलाकात पर लौटें.जहां सब ख़त्म हुआ था, आरंभ बिल्कुल वहीं से करते हैं.उस वक्त आपने कहा था, आप मुझे प्यार करते हैं.मेरा जवाब है, मैं भी आपको प्यार करती हूं.'

'अब हमें क्या करना चाहिए ?'

हमें शादी कर लेनी चाहिए.'

रामेश्वर बाबू ने चौंककर देखा.उन्हें सीता से इस फैसले की उम्मीद नहीं थी.सोचकर बोले - 'लोग हमारा मजाक उड़ाएंगे.मेरा तो अपने बच्चों से नाता टूट चुका है, तुम्हारे बच्चों को एतराज हो सकता है.'

'मुझे परवाह नहीं है.'

ठीक है. शादी भागकर करें ?'

'भागने की आपमें हिम्मत नहीं है.मैं आजमा चुकी हूं.हम कोर्ट में शादी करेंगे.पूरे शहर को रिसेप्शन देंगे.अपने बच्चों को भी आमंत्रित करेंगे.भले वे न आयें.'

'कब करनी है शादी ?'

'कल ही.'

रामेश्वर बाबू ने भावातिरेक में उसके दोनों हाथ पकड़ लिए.दोनों के हाथ कांप रहे थे.धीरे-धीरे पूरी देह कांपने लगी उनकी.आंखें भर आई थीं.एक दूसरे को महसूस करते हुए दोनों देर तक चुपचाप बैठे रहे.उनके जीवन के आखिरी दिनों में ऐसी कोई घड़ी भी आएगी, इसकी कल्पना भी नहीं की थी उन्होंने.

शाम होने चली थी.पश्चिम में आसमान लाल होने लगा था.हवा तेज थी.सामने सहन में पीपल के पेड़ पर पक्षियों का शोर बढ़ने लगा था.

रामेश्वर बाबू ने चारों तरफ नजर डालते हुए कहा - 'मौसम बहुत अच्छा है.'

'तो ?'

'चलो तालाब तक घूम आते हैं.आज डूबता हुआ सूरज ज्यादा लाल लग रहा है. हवा में भी कुछ जादू है आज.'

दोनों एक साथ उठ खड़े हुए.

रामेश्वर बाबू ने अपनी छड़ी फेंक दी.कहा - 'आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो.'

सीता ने अपने मोटे फ्रेम का चश्मा निकालकर पर्स में डाल लिया.कहा - 'यह बात आपको इतने साल बाद समझ में आई है ?'

जब वे तालाब की ओर चले तो घर लौटते पक्षियों का एक झुंड उनके सिर के बिल्कुल ऊपर-ऊपर उड़ रहा था.


संपर्क :
dhruva.n.gupta@gmail.com

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