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प्रकृति को समर्पित ध्रुव गुप्त की सात कविताएं

Updated at : 09 Jun 2018 12:09 PM (IST)
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प्रकृति को समर्पित ध्रुव गुप्त की सात कविताएं

एक / एक छोटी-सी प्रेमकथा पिछली रात मैं बहुत थका था कमरे में गर्मी बहुत थी और बिजली गायब मैंने खिड़की खोल दी और जमीन पर चादर बिछाकर गहरी नींद सो गया आधी रात जब नींद खुली तो आश्चर्य से देखा मैंने खिड़की के रास्ते चलकर चांदनी मेरे बिल्कुल बगल में आकर चुपचाप लेट गई […]

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एक /
एक छोटी-सी प्रेमकथा
पिछली रात मैं बहुत थका था
कमरे में गर्मी बहुत थी
और बिजली गायब
मैंने खिड़की खोल दी और
जमीन पर चादर बिछाकर
गहरी नींद सो गया
आधी रात जब नींद खुली
तो आश्चर्य से देखा मैंने
खिड़की के रास्ते चलकर चांदनी
मेरे बिल्कुल बगल में आकर
चुपचाप लेट गई थी
शांत, सौम्य, शीतल
और थोड़ी-सी उदास
मैंने हाथों से छूकर देखा उसे
और आहिस्ता से पूछा –
कुछ कहना है ?
चांदनी ने कुछ नहीं कहा
वह कुछ और पास खिसक आई मेरे
मैं भावुक था
उसे बांहों में समेट लिया
और धीरे-धीरे हम दोनों सो गए
रात के आखिरी पहर
मैंने आधी नींद में ही उसे टटोला
तो वह जा चुकी थी
मैं घबड़ाया-सा उठ बैठा
बेचैन और पसीने से तर-ब-तर
बाहर तेज हवा चल रही थी
कमरे में सन्नाटा पसरा था
और दूर पूरब दिशा में क्षितिज
तेजी से पीला पड़ने लगा था !
दो /
बेहया के फूल
किसी सड़क के किनारे
कीचड़ भरे गड्ढों में
बेतरतीब झाड़ियों के बीच
अनचाहे ही खिलते जाते हैं
बेहया के फूल
सुबह सूरज की धूप के साथ
अदेखे जगाते हैं बैगनी और
गुलाबी रंगों के तिलिस्म
और शाम होने के पहले
अलक्षित ही मर जाते हैं
ये शायद दुनिया के
सबसे अभागे फूल हैं
जो नहीं चढ़ते किसी देवता पर
नहीं सजते स्त्रियों के जूड़ों में
कोई भी प्रेमी नहीं देता इन्हें
उपहार में प्रेमिका को
मुझे पसंद हैं बनैले गंध वाले
ये स्वाभिमानी
और अपारंपरिक फूल
थोड़े से घरेलू
और बहुत से जंगली
एकदम तुम्हारी तरह
अगले किसी मौसम में
जब तुम मिलोगी
तब बेहया के फूलों का
एक गुच्छा भेट करूंगा तुम्हें !
तीन /

प्यार
कल ही देखी थी मैंने
बगीचे के एक घने पेड़ पर
एक अकेली गिलहरी
बेहद नटखट
चपल और सतर्क
मुझे देखकर
पत्तों के पीछे जा छिपी वह
पत्तों से झांकती
उसकी चंचल आंखों की
मासूम बदमाशियों ने
कौतूहल से भर दिया मुझे
मैंने शैतान गिलहरी को
इशारों में कहा –
प्यार
शरमाई गिलहरी ने
इशारों में ही कहा मुझे –
प्यार
देर तक
गिलहरी की नर्म देह पर
टिकी रह गईं मेरी आंखें
मेरे लहू में टिकी रह गई
देर तक गिलहरी.
चार /
अलक्षित
बाहर मुलायम रात थी
आकाश में उजला चांद था
चांदनी में नहाए
झूमते हुए पेड़ थे
पेड़ पर पंछी थे
पत्तों के बदन पर
सरसराती तेज हवा थी
हहराती नदी थी
किनारे की ठंढी रेत थी
रेत पर रंग-बिरंगे
और चमकीले पत्थर थे
मैं नहीं था वहां
मैं अपने बंद कमरे में
देर रात तक
गुज़रे दिन के हिसाब
और आने वाले कल की
बेहिसाब चिंताओं डूबा रहा
और इस तरह
सुबह होने से ठीक पहले
दुनिया का
वह सबसे खूबसूरत मंज़र
मेरे देखे-जाने बगैर
चुपचाप गुजर गया.
पांच /
कहीं कोई नहीं
रात शहर के कोलाहल से दूर
चांदनी के साये-साये
भटकते हुए एक सुनसान खंडहर में
मुझे लगा
कि अपनी आवारगी में मैं
एकदम अकेला नहीं
कोई तो था ज़रूर जो देर से
मेरा पीछा किए जा रहा था
मैं तनिक सहम कर रुका ही था
कि किसी अदृश्य हाथ ने
मेरे बालों-का स्पर्श कर
बहुत आहिस्ता से पूछा मझसे –
कैसे हो ?
मैंने चौंक कर गर्दन घुमाई
दूर तक कहीं कोई नहीं था
अपने पीछे छोड़कर
एक बेहद शरारती मुस्कान
सांय-सांय करती हवा
तेजी से भागी जा रही थी.
छह /
सांझ
सूरज डूब ही रहा था कल
कि घर के छज्जे पर अकेली बैठी
एक नन्ही मैना ने पूछा –
क्यों जाते हो
अब फिर कब आओगे ?
नन्ही मैना की बात सुनकर
जाने क्यों सहसा
पीला पड़ गया उदास सूरज
कुछ नहीं कहा उसने
और जाकर चुपचाप डूब गया
गांव के पोखर में
सूरज के जाते ही
घरों में पसरने लगा
बेहिसाब धुआं
पेड़ों पर पक्षियों का कलरव
वापस लौटते मवेशियों के पदचाप
नन्हे चिराग़ों ने धीरे-धीरे
संभाल ली
तमाम घरों की ज़िम्मेदारी
और इस तरह उतर आई
थके, अनमने गांव पर
एक और अलसाई रात !
सात /
प्रेमपत्र
सुबह के उनींदे फूलों पर
यह ज़रा-सी हंसी
यह थोड़ी-सी उदासी
चमकते ओस की
चंद पाक़ीज़ा बूँदें
हवा से आहिस्ता उठती
कोई रहस्यमयी गंध
धरती पर दूर तक फैले
कई सारे रंग
और रंगों से झांकते
विरह के कुछ गीले
अबूझ-से शब्द
पता नहीं ये फूल हैं
या अकेली, उदास पृथ्वी के
मासूम से प्रेम पत्र
जिन्हें पढ़कर अभी-अभी
आकाश ने बहाए हैं
कुछ बूंद आंसू !
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