मन के तारों को छेड़ती प्रतिभा कटियार की कविताएं

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date


प्रतिभा कटियार युवा कवयित्री हैं. कविताएं, आलेख, कहानियां आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. 14 साल तक मुख्य धारा की पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों अजीज प्रेमजी फाउंडेशन के साथ जुड़कर काम कर रही हैं. मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कारों और 'खूब कही' व्यंग्य संग्रह का संपादन.संपर्क : अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, 53 ई सी रोड, द्वारका स्टोर के पास, देहरादून, उत्तराखंड, 248001, फ़ोन- 8126948464.


नये ज़माने की नयी इबारतों के बीच
संवेदनाएं बन गयी हैं मैनेजमेंट के कोर्स का चैप्टर
बाज़ार ने हड़प ली है मासूमियत, अल्हड़पन, मातृत्व जैसे शब्दों की नमी
बच्चे जानने लगे हैं कि मदद के बदले मिलते हैं नंबर
लपकने लगे हैं वो ज़रूरतमंदों की मदद की ओर
मदद के लिए नहीं, नंबरों के लिए
बचे रहें ज़रूरतमंद हमेशा
इसका इंतजाम करती है राजनीति
ताकि मददगार ऊंचे करते रहें कॉलर
जयकारे लगते रहें महान और दयालु लोगों के नाम के
और वोट बैंक सुरक्षित रहे
'गरीबी' अब समस्या नहीं इम्तिहानों में आने वाले नंबर हैं
सत्ताओं की झोली भरने वाला वोट है
वाद विवाद, प्रतियोगिता और निबंध का विषय है
कविताओं, कहानियों, उपन्यासों की उष्मा है
फ़िल्मी कहानियों की बासी पड़ चुकी स्क्रिप्ट है
शिक्षा रह गयी है डिग्रियों का ढेर
स्कूल कॉलेज बन चुके हैं कारखाना
ऊंची नौकरी, रुतबा और पैसा कमाने का
वैज्ञानिक डरते हैं काली बिल्लियों के रास्ता काटने से
गणितज्ञ बचाकर रखना चाहते हैं
गणित के डर से बना बाज़ार
अंग्रेजी ने झुका रखा है अन्य भाषाओं का सर
और हिंदी दिखा रही है अकड़ लोक की भाषाओं को
केबीसी ने हड़प लिया है ज्ञान का अर्थ
कि सूचनाओं का संग्रह नहीं होता ज्ञान
और जो होता वो ज्ञान तो जुए के खेल में न होता तब्दील
प्रेम अब बन गया है फैशन
फेसबुक, ट्विटर का प्रोफाइल स्टेट्स
कॉफ़ी हाउस की मुलाकातों का उबाल
फ़िल्मी दृश्यों में एक-दूसरे को खोजते हुए
सेल्फी से ब्रेकअप तक का सफर
दुःख किसी इश्तिहार सा टंगा है फेसबुक वॉल पर
प्रेम उमड़ा पड़ रहा है उबाऊ कविताओं में
रिश्ते दम तोड़ रहे हैं उफनती तस्वीरों के नीचे
मुस्कुराहटों के भीतर पल रहा है गहरा अवसाद
जेल जा रहे हैं देश और समाज के बारे में सोचने वाले
और देशप्रेम के शोर के बीच
सुरक्षा की मांग के लिए मार खा रही हैं लड़कियां
देश और समाज से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं पार्टियों के झंडों के रंग
कश्मीर अब अपनी खूबसूरती की लिए नहीं धारा 370 के लिए जाना जाता है
गांव किसानों की समस्याओं, धान की खुशबू, गेहूं की लहक के लिए नहीं
फ़िल्मी दृश्यों या शादियों की थीम के लिए खंगाले जाते हैं
'सब कुछ ठीक है' के चुन्धियाए हुए दृश्यों के बीच
एक बच्चा मिट्टी पर उकेर रहा है कुछ सपने
कोई युवा अपनी जड़ों की तलाश में लौटता है अपने पुरखों के गांव
कोई स्त्री याद करती है
कुंए पर पानी भरती बुआ और चाचियों के कहकहे
रहट की आवाज़, पुआल के ढेर और ताज़ा बनते गुड़ की खुशबू
--------------
मुझे तेज़ धार वाली कविताएं चाहिए
मुझे तेज़ धार वाली कविताएं चाहिए
जिनके किनारे से गुजरते ही लहूलुहान हो जाये जिस्म
जिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगे
सब कुछ सह लेने वाला सब्र
मुझे ढर्रे पर चलती जिंदगी के गाल पर
थप्पड़ की तरह लगने वाली कविताएं चाहिए
कि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवन
और आखिर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चाल
मुझे बारूद सरीखी कविताएं चाहिए
जो संसद में किसी बम की तरह फूटें
और चीरकर रख दें बहरी सरकारों के
कानों के परदे
मुझे बहुत तेज़ कविताएं चाहिए
सांसों की रफ़्तार से भी तेज़
समय की गति से आगे की कविताएं
हत्यारों के मंसूबों को बेधती कविताएं
और हो चुकी हत्याओं के खिलाफ
गवाह बनती कविताएं
मुझे चाहिए कविताएं जिनसे
ऑक्सीजन का काम लिया जा सके
जिन्हें घर से निकलते वक़्त
सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सके
जिनसे लोकतंत्र को
भीड़तंत्र होने से बचाया जा सके
मुझे चाहिए इतनी पवित्र कविताएं कि
उनके आगे सजदा किया जा सके
रोया जा सके जी भर के
और सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सके
मुझे चूल्हे की आग सी धधकती कविताएं चाहिए
खेतों में बालियों सी लहलहाती कवितायें चाहिए
मुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कविताएं चाहिए
भोली गिलहरी सी फुदकती कविताएं चाहिए
मुझे इस धरती पर मनुष्यता की फसल उगाने वाली कवितायें चाहिए.
-------------------
अपना हक छीन लेने वाली कविताएं चाहिए
मुझे स्थिर तालाब में
एक शरारती बच्चे द्वारा फेंकें गए कंकड़
सरीखी कवितायें चाहिये
जो स्थिरता को भंग कर दें
हाथ से छू जाए तो लहू रिसने लगे
ऐसे सीसे से सने मांझे सी कविताएं चाहिए.
अपने हक के लिए सदियों तक धरने पर बैठने वाली नहीं
उठकर अपना हक छीन लेने वाली कविताएं चाहिए
रोजमर्रा की ऊब भरी जिंदगी से टकराने वाली
रोज नए रास्तों की तलाश करने वाली कवितायें चाहिए
सरहदों पर खिंची सीमाओं को मिटा देने वाली
सत्ताओं को औंधे मुंह गिरा देने वाली कविताएं चाहिए
मुझे बच्चों के बस्तों में छुपाकर रखी गयी कॉमिक्स सी कविताएं चाहिए
बिना पुकारे तुम तक पुकार बनकर पहुंच जाने वाली कविताएं चाहिए
मुझे शरद के कंधे से टिककर
दूर कहीं गुम हो जाने वाले रास्तों को
ताकती कविताएं चाहिए
तुम्हारी याद की तरह
अदरक वाली चाय में घुल जाने वाली कविताएं चाहिए.
------------------------
जब मैं तुम्हें पुकारती हूं
जब मैं तुम्हें पुकारती हूं तो
पल भर को थम जाती है धरती की परिक्रमा
बुलबुल का जोड़ा मुड़कर देखता है
टुकुर टुकर
लीची के पेड़ के पत्तों पर से टपकती बूंदें
थम जाती हैं कुछ देर को
जैसे थम जाती हैं मुलाकात के वक़्त
प्रेमियों की सांसें
जब मैं तुम्हें पुकारती हूं तो
नदियों की कलकल में एक वेग आ जाता है
जंगलों के जुगनुओं की आंखें चमक उठती हैं
सड़क के मुहाने पर फल बेचने वाली बूढ़ी काकी
सहेजती हैं फलों की नमी
जब मैं तुम्हें पुकारती हूं तो
बढ़ जाती हैं बच्चों की शरारतें
गिलहरियों की उछलकूद
ज्यादा गाढ़े हो जाते हैं फूलों के रंग
और मीठी लगने लगती है बिना चीनी वाली चाय
जब मैं तुम्हें पुकारती हूं
चरवाहे के गीत गूंजने लगते हैं फिजाओं में
शहर की टूटी सड़कें भी गुनगुना उठती हैं
प्यार में टूटे दिलों की धडकनों को
मिलता है कुछ पलों को आराम
जब मैं तुम्हें पुकारती हूं
होंठों से नहीं निकलता कोई भी शब्द
फिर भी सुनती है
पूरी कायनात...
---------------------------------
फांस
तुम्हारी याद किसी फांस सी धंस गयी थी
टीसती रहती थी लगातार
टप टप टप...टपकता रहता था कोई दर्द
निकालने की कोशिश में
उसे और भीतर धंसा देती थी
दर्द की लहक बढ़ जाती थी
यह दर्द आदत बन चुका था
इस दर्द से मुक्ति की लगातार कोशिश
असल में फांस को भीतर धकेलने की कोशिश
दर्द को जिन्दा रखने की कोशिश थी
खुद को भी
एक रोज फांस को निकालने के बहाने जब
स्मृतियों की महीन सुई से उसके संग खेल रही थी
वो फांस निकल ही गयी एकदम से
धीरे-धीरे खत्म हो गया दर्द
जीवन भी...
Share Via :
Published Date
Comments (0)
metype

संबंधित खबरें

अन्य खबरें