होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिका और ईरान के बीच नियंत्रण को लेकर दावे तेज हो गए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अमेरिका ने इस अहम समुद्री रास्ते पर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया है तो वहीं, ईरान का दावा है कि होर्मुज अब भी उसके नियंत्रण में है.हालांकि दोनों देशों के दावों से अलग, समुद्र में जहाजों की आवाजाही के ताजा आंकड़े एक अलग तस्वीर बयां कर रहा है.ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि होर्मुज पर किसका नियंत्रण है? अहम सवाल ये है कि क्या इस बेहद अहम समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही सुरक्षित और सामान्य हो पाई है या नहीं?होर्मुज से फिलहाल कितने जहाज रोज गुजर रहेहोर्मुज में अभी जहाजों की आवाजाही बेहद कम है.केप्लर के ताजा आंकड़ों के मुताबिक मंगलवार को इस जलडमरूमध्य से सिर्फ 6 कमोडिटी जहाज गुजरे. इससे एक दिन पहले यह संख्या 9 थी, जबकि पिछले 10 दिनों का औसत करीब 11 जहाज रोज रहा है.जानकारी के लिए बता दें कि युद्ध से पहले सामान्य दिनों में होर्मुज से करीब 130 से 140 जहाज़ हर दिन गुजरते थे. यानी फिलहाल रोजाना होने वाली आवाजाही सामान्य स्तर की सिर्फ करीब 4 से 5 फीसदी रह गई है.मंगलवार को गुजरे थे 6 जहाजकेप्लर के मुताबिक मंगलवार को दर्ज किए गए 6 कमोडिटी जहाज़ों में एक बहुत बड़ा कच्चा तेल टैंकर यानी वीएलसीसी ओमान की तरफ से होर्मुज में दाखिल हुआ. इसके अलावा दो अन्य टैंकर अंदर गए, जबकि तीन जहाज़ जलडमरूमध्य से बाहर निकले.यह आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि अमेरिका लगातार कह रहा है कि उसने होर्मुज़ पर पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया है. अगर जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही सुरक्षित हो गई होती, तो जहाज़ों की संख्या भी धीरे-धीरे युद्ध से पहले के स्तर के करीब पहुंचनी चाहिए थी. लेकिन अभी ऐसा नहीं हुआ है.ये भी पढ़ें: रील, तस्वीर और सोशल मीडिया…पाकिस्तान में महिला क्रिएटर्स क्यों बन रही हैं निशाना?80 फीसदी से ज्यादा जहाज ओमान की तरफ क्यों जा रहे हैं?केप्लर के आंकड़ों का एक और अहम हिस्सा पिछले दो हफ्तों की आवाजाही से जुड़ा है. इस दौरान होर्मुज़ से हुए 80 फीसदी से ज्यादा लिक्विड-कार्गो ट्रांजिट या तो ओमान की तरफ वाले रास्ते से हुए या फिर ऐसे ट्रांजिट थे जिन्हें डार्क माना गया है.इसका सीधा मतलब यह है कि जहाज ईरान की तरफ वाले रास्ते से बचने की कोशिश कर रहे हैं.हालांकि इसे यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि हर जहाज की आवाजाही पूरी तरह रिकॉर्ड हो रही है. कुछ जहाज अपने ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं, जिससे उनकी लोकेशन सामान्य ट्रैकिंग सिस्टम पर दिखाई नहीं देती. इसे ही डार्क शिपिंग कहा जाता है.इसलिए अभी की सबसे बड़ी तस्वीर यही है कि होर्मुज पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन सामान्य रूप से खुला भी नहीं है. अमेरिका की मौजूदगी से कुछ जहाज ओमान वाले रास्ते से गुजर पा रहे हैं, लेकिन ईरान का खतरा इतना खत्म नहीं हुआ है कि शिपिंग कंपनियां पहले की तरह बड़ी संख्या में जहाज भेजना शुरू कर दें.ट्रंप का दावा कितना सही है और ईरान का कितना नियंत्रण बचा है?डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि अमेरिका ने होर्मुज पर पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया है. लेकिन जहाजों के आंकड़े इस दावे की पूरी पुष्टि नहीं करते.ईरान का प्रभाव पहले की तुलना में कमजोर हुआ है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. केप्लर के मुताबिक पिछले दो हफ्तों में 80 फीसदी से ज्यादा लिक्विड-कार्गो ट्रांजिट ओमान की तरफ वाले रास्ते से हुए या डार्क ट्रांजिट के रूप में दर्ज हुए.अमेरिका की बढ़त कहां दिख रही है?अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी से कुछ जहाज़ ओमान वाले रास्ते से गुजर पा रहे हैं. इससे ईरान के लिए अपनी पसंद के रास्ते पर जहाज़ों को नियंत्रित करना मुश्किल हुआ है.लेकिन सैन्य मौजूदगी और सामान्य शिपिंग एक जैसी बात नहीं हैं. अगर अमेरिका का पूरा नियंत्रण होता, तो 130–140 जहाज़ों की तुलना में सिर्फ 11 जहाज़ों का औसत नहीं रहता.इसलिए फिलहाल सबसे सही तस्वीर यही है: ईरान का प्रभाव कमजोर हुआ है, अमेरिका की पकड़ बढ़ी है, लेकिन होर्मुज़ में सामान्य शिपिंग अभी बहाल नहीं हुई है.ये भी पढ़ें: अमेरिका में कैसे होती है वोटिंग? समझिए, ट्रंप ने क्यों दिया भारत के चुनावी मॉडल का उदाहरणतेल की कीमतों पर दिख रहा जहाजों की आवाजाही का असर होर्मुज में जहाजों की आवाजाही घटने का असर अब तेल की कीमतों पर भी दिखने लगा है. बुधवार (19 अगस्त) को ब्रेंट क्रूड 91.79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. यह 30 जुलाई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. वहीं अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड 85.79 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया.तेल की कीमत सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ रही है कि अभी बाजार में तेल की कमी हो गई है. बड़ी वजह आने वाले दिनों की चिंता है. कारोबारियों को डर है कि अगर होर्मुज़ में तनाव लंबे समय तक बना रहा और तेल टैंकरों की आवाजाही कम रही, तो दुनिया के बाजार में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है.यानी अभी बाजार में वास्तविक कमी से ज्यादा सप्लाई रुकने का डर कीमतों को ऊपर ले जा रहा है.भारत के लिए क्यों अहम है होर्मुज?भारत के लिए होर्मुज की स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारत के तेल आयात बिल पर पड़ सकता है.मसलन, अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 91 डॉलर या उससे ऊपर रहता है, तो भारत को उतनी ही मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने होंगे. इससे देश के आयात खर्च पर दबाव बढ़ सकता है.महंगा कच्चा तेल आगे चलकर ईंधन, ट्रांसपोर्ट और उत्पादन की लागत बढ़ा सकता है. इसका दबाव दूसरी चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता है और महंगाई बढ़ सकता है.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर