अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देते हुए, एक बार फिर अमेरिका की चुनाव व्यवस्था में वोटर आईडी नियमों की वकालत की है. इस बार उन्होंने अपने तर्क के लिए भारत का उदाहरण दिया. ट्रंप ने कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में मतदाता की पहचान सुनिश्चित की जाती है, तो अमेरिका में भी वोट डालने की प्रक्रिया को इसी तरह मजबूत किया जाना चाहिए.ट्रंप के इस बयान को लेकर सवाल ये है कि क्या अमेरिका में वोट डालने के लिए आईडी की जरूरत ही नहीं होती? भारत और अमेरिका की चुनाव व्यवस्था में कितना अंतर है? और ट्रंप के प्रस्ताव से क्या बदल सकता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.पहले समझिए, भारत को लेकर ट्रंप ने क्या कहा?18 अगस्त को ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से सवाल किया था कि अमेरिका में बिना वैध फोटो पहचान पत्र के चुनाव कैसे कराए जाते हैं. इसके साथ ट्रंप ने भारत के 2024 लोकसभा चुनाव का उदाहरण दिया.ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा कि भारत में करीब 64.6 करोड़ लोगों ने मतदान किया और एक प्रतिशत से भी कम वोट पोस्टल बैलेट के जरिए पड़े. उन्होंने कहा कि भारत में मतदाताओं की पहचान के लिए वैध फोटो पहचान दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया, इसलिए अमेरिका को भी अपने चुनावों में इसी तरह की व्यवस्था अपनानी चाहिए.हालांकि, यहां भारत की व्यवस्था को थोड़ा विस्तार से समझना जरूरी है. क्योंकि भारत में सिर्फ वोटर आईडी कार्ड दिखाना ही मतदान की पूरी प्रक्रिया नहीं है.ये भी पढ़ें: 50 फीसदी की मांग और 70 फीसदी पर बहस, जानिए जम्मू-कश्मीर में आरक्षण पर क्यों फंसा पेंच?भारत में वोट डालने के लिए क्या हैं जरूरी नियम?भारत में मतदान के लिए सबसे जरूरी शर्त है कि व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में होना चाहिए. इसके बाद मतदान केंद्र पर पहचान साबित करने के लिए ईपीआईसी यानी इलेक्टर फोटो आइडेंटिटी कार्ड का इस्तेमाल किया जाता है.लेकिन अगर किसी मतदाता के पास ईपीआईसी नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह वोट नहीं डाल सकता. चुनाव आयोग ने कई दूसरे फोटो पहचान दस्तावेजों को भी मान्यता दी है. इनमें आधार कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और पैन कार्ड जैसे दस्तावेज शामिल हैं.यानी भारत की व्यवस्था में मतदाता सूची में नाम और पहचान का सत्यापन, दोनों महत्वपूर्ण हैं. यही वह हिस्सा है जिसकी तुलना ट्रंप अमेरिकी व्यवस्था से कर रहे हैं.अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका में ऐसा कोई पहचान सत्यापन होता ही नहीं है?क्या अमेरिका में वोट देने के लिए आईडी नहीं चाहिए?ऐसा कहना सही नहीं होगा. अमेरिका में भी कई राज्यों में मतदान के समय आईडी दिखानी पड़ती है. हालांकि यहां अंतर ये है कि भारत की तरह पूरे देश के लिए एक ही नियम नहीं है.अमेरिका में चुनाव की जिम्मेदारी काफी हद तक राज्यों के पास है. इसलिए एक राज्य में फोटो आईडी अनिवार्य हो सकती है, जबकि दूसरे राज्य में मतदाता की पहचान हस्ताक्षर या दूसरे रिकॉर्ड के जरिए सत्यापित की जा सकती है.नेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ स्टेट लेजिस्लेचर्स के मुताबिक, 36 राज्यों में मतदान केंद्र पर किसी न किसी रूप में पहचान दिखाने की जरूरत होती है. बाकी 14 राज्य और वॉशिंगटन डीसी अलग तरीकों से मतदाता की पहचान सत्यापित करते हैं.इसलिए ट्रंप का कहना है कि जब कुछ राज्यों में सख्त आईडी नियम लागू किए जा सकते हैं, तो पूरे अमेरिका में एक समान नियम क्यों नहीं होना चाहिए?इंफोग्राफिक: एआई की मदद से तैयारक्या है असली विवादवोटर आईडी का मुद्दा अमेरिका में सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का सवाल नहीं है. यह लंबे समय से रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के बीच राजनीतिक बहस का विषय रहा है.रिपब्लिकन नेताओं का तर्क है कि मतदान के समय पहचान की सख्त जांच से चुनाव की सुरक्षा बढ़ेगी और लोगों का चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा मजबूत होगा.जबकि डेमोक्रेट्स और दूसरे आलोचकों का कहना है कि अमेरिका में वोटर की पहचान से जुड़ी धोखाधड़ी बहुत सीमित है. उनका डर है कि अगर नियम बहुत सख्त कर दिए गए, तो ऐसे लोगों के लिए वोट डालना मुश्किल हो सकता है जिनके पास जरूरी दस्तावेज नहीं हैं.यानी एक पक्ष इसे चुनाव की सुरक्षा का मुद्दा मानता है, जबकि दूसरा इसे मतदान के अधिकार तक पहुंच से जोड़ता है.सेव अमेरिका एक्ट के जरिए ट्रंप क्या बदलाव चाहते हैं?ट्रंप चुनाव की सुरक्षा और मतदान के अधिकार तक पहुंच वाले, इस बहस को कानून में बदलना चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने सेव अमेरिका एक्ट (Safeguard American Voter Eligibility Act ) का समर्थन किया है.प्रस्तावित कानून के तहत संघीय चुनावों में मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देने की जरूरत बढ़ाई जाएगी. साथ ही मतदान के दौरान फोटो आईडी से जुड़ी आवश्यकताओं को मजबूत करने का प्रस्ताव है.इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका में अभी गैर-नागरिकों को कानूनी रूप से वोट देने की अनुमति है. अमेरिकी संघीय चुनावों में मतदान का अधिकार नागरिकों के लिए है. ट्रंप का प्रस्ताव मुख्य रूप से इस बात पर जोर देता है कि नागरिकता और पहचान को दस्तावेजों के जरिए और सख्ती से साबित किया जाए. हालांकि यहां पर एक और दूसरा बड़ा मुद्दा जुड़ जाता है, मेल वोटिंग.ये भी पढ़ें: बिहार-झारखंड में डिप्रेशन से बढ़ा बारिश के चेन इफेक्ट का खतरा, जानिए अगले 24 घंटे क्यों हैं अहम?मेल वोटिंग भी ट्रंप के निशाने पर ?अमेरिका में भारत की तुलना में मेल या पोस्टल वोटिंग का इस्तेमाल काफी अलग तरीके से होता है. ट्रंप लंबे समय से मेल बैलेट को लेकर सवाल उठाते रहे हैं.सेव अमेरिका एक्ट में सामान्य परिस्थितियों में मेल बैलेट को सीमित करने और कुछ खास स्थितियों जैसे बीमारी, दिव्यांगता, सैन्य सेवा या यात्रा के दौरान ही इसकी अनुमति देने का प्रस्ताव है.भारत में 2024 के लोकसभा चुनाव में पोस्टल बैलेट का इस्तेमाल कुल मतदान की तुलना में बहुत कम रहा. लेकिन दोनों देशों की चुनाव प्रणाली, पात्रता और मेल वोटिंग के नियम अलग हैं. इसलिए केवल प्रतिशत की तुलना करके दोनों व्यवस्थाओं को पूरी तरह समान मानना सही नहीं होगा.भारत-अमेरिका की तुलना में सबसे बड़ा अंतर क्या है?दोनों देशों में मतदाता की पहचान की जांच होती है, लेकिन तरीका अलग है.भारत में चुनाव आयोग एक राष्ट्रीय चुनाव व्यवस्था के तहत मतदाता सूची और पहचान दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है. अमेरिका में चुनावी नियम काफी हद तक राज्य तय करते हैं. इसलिए पूरे देश में आईडी की एक जैसी अनिवार्यता नहीं है.इसलिए ट्रंप का यह कहना कि अमेरिका में आईडी की कोई व्यवस्था ही नहीं है, पूरी तरह से सही नहीं है. इससे अलग असली बहस ये है कि क्या अमेरिका में सभी राज्यों के लिए एक समान और ज्यादा सख्त संघीय वोटर आईडी व्यवस्था होनी चाहिए और भारत का उदाहरण इसी बहस को राजनीतिक समर्थन देने के लिए ट्रंप के तर्क का अहम हिस्सा है.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर