Vibhajan Vibhishika Divas : कुर्सी–टेबल और घड़ी का भी हुआ था बंटवारा, भारत ने पाकिस्तान को दिया था 75 करोड़ रुपया

Edited by Rajneesh Anand
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भारत-पाक विभाजन

Story Of Partition Of India : 425 मेजें, 85 कुर्सियां, हैट टांगने के 50 स्टैंड, 130 किताब रखने की आलमारी, 4 तिजोरी, 20 टेबल लैंप और ना जाने क्या–क्या! अंग्रेजों ने जब माउंटबेटन प्लान के तहत भारत के विभाजन की रूपरेखा बनाई तो लगभग 35 करोड़ की आबादी वाले इस देश की हर चीज का बंटवारा हुआ. इसी बंटवारे का परिणाम था, पाकिस्तान को मिलने वाला 75 करोड़ रुपया.

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Story of partition of India: 14 अगस्त यानी विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस. यह दिन हमें हमेशा याद दिलाता है कि आज ही देश के दो टुकड़े हुए थे और सिर्फ जमीन ही नहीं बंटी, हर चीज का बंटवारा हो गया था. क्या आप जानते हैं कि जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो भारत सरकार ने 75 करोड़ रुपए पाकिस्तान को दिए थे? अगर नहीं तो जानिए कि आज पाकिस्तान अगर अपने दम पर खड़ा है, तो उसके निर्माण में भारत की कितनी बड़ी भूमिका है. आखिर भारत सरकार ने पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपए क्यों दिए थे और क्या वजह थी कि महात्मा गांधी को इसमें दखल देना पड़ा था? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें आजादी से पहले के दौर में जाना होगा.

लॉर्ड रेडक्लिफ ने भारत को बांटने के लिए खींची थी लाइन

ब्रिटिश संसद ने जब भारत की आजादी के लिए अपनी सहमति दे दी और भारत को दो हिस्सों में बांटकर आजाद करने का फैसला किया, तो लॉर्ड रेडक्लिफ को भारत भेजा गया, दोनों देशों की सीमाएं तय करने के लिए. लॉर्ड रेडक्लिफ भारत कभी आए नहीं थे, इसलिए उनके लिए यह काम कठिन था, लेकिन उन्होंने यह का किया और भारत को दो हिस्सों में बांटा. लेकिन पाकिस्तान जो बना वह भारत के दो हिस्सों में स्थित था.

कुर्सी–टेबल और घड़ी का भी हुआ बंटवारा

जब भारत का बंटवारा दो देशों के रूप में हुआ, तो यहां की कुर्सी, मेज, पुस्तक, घड़ी, टेबल लैंप, पेपर, आलमारी और खजाने में बंद पैसों का भी बंटवारा हुआ था. इसके लिए दोनों देशों की तरफ से एक-एक नुमाइंदे भी रखे गए थे, जिनमें से एक हिंदू था और दूसरा मुसलमान. इसकी वजह साफ थी क्योंकि दोनों देशों का बंटवारा ही धर्म के आधार पर हुआ था. हिंदू नुमाइंदा भारत का था जिनका नाम एचएम पटेल और पाकिस्तान के नुमाइंदे का नाम था चौधरी मुहम्मद अली. इन दोनों सरकारी अधिकारियों ने मिलकर भारत की संपत्ति का बंटवारा किया था.

भारत को 80 और पाकिस्तान को मिली 20 फीसदी हिस्सेदारी

pandit Nehru
पंडित नेहरू भारत के विभाजन को सहमति देते हुए

भारत की संपत्ति के बंटवारे के लिए महज 73 दिन का समय मिला था, लेकिन इन दोनों ने उसे पूरा किया, कहना ना होगा कि सबसे अधिक विवाद जिस चीज को लेकर हुआ, वह था खजाने का पैसा. बहस इतनी अधिक हुई कि दोनों नुमाइंदे को सरकार पटेल के घर पर एक कमरे में बंद कर दिया था कि जबतक निपटारा ना हो जाए, दोनों वहीं रहें. अंतत: यह तय हुआ कि खजाने में जो रकम है उसका 17.5 प्रतिशत पाकिस्तान को मिलेगा और साथ ही प्रशासन तंत्र की चल-अचल संपत्ति का 80 प्रतिशत भारत के पास और 20 प्रतिशत पाकिस्तान के खाते में जाने वाला था. 

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पाकिस्तान के खाते में आए 75 करोड़ रुपए

बंटवारे के वक्त भारत सरकार के पास 400 करोड़ रुपए थे, जिसमें से 75 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देने थे. विभाजन परिषद के निर्णय के अनुसार यह तय हुआ था. उस वक्त दोनों देशों की मुद्रा एक ही थी और उसे एक वर्ष तक साझा किया गया था. भारत ने अग्रिम भुगतान के तौर पर पाकिस्तान को 20 करोड़ दे दिए थे और 55 करोड़ रुपए और देना शेष था. लेकिन आजादी के महज कुछ ही महीनों बाद पाकिस्तान ने भारत पर सैनिक कार्रवाई कर दी, जिसकी वजह कश्मीर था. पाकिस्तान के इस रवैए के बाद भारत सरकार ने 55 करोड़ रुपए देने के फैसले पर विचार किया. भारत ने स्पष्ट घोषणा की कि जबतक कश्मीर से पाकिस्तान अपने घुसपैठियों को नहीं निकालेगा उसे 55 करोड़ रुपए नहीं दिए जाएंगे, क्योंकि पाकिस्तान उन रुपयों का प्रयोग भारत के खिलाफ करने के फिराक में था. लेकिन महात्मा गांधी ने भारत सरकार के इस रुख का विरोध किया और कहा कि जो वादा भारत ने किया है, उसे वो निभाना चाहिए. भारत को अविलंब पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने चाहिए. इसके लिए उन्होंने अनशन भी किया था, हालांकि कहा तो यह भी जाता है कि महात्मा गांधी का यह अनशन उस वक्त देश में फैले सांप्रदायिक दंगे को रोकना था, ना कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए. महात्मा की जिद पर भारत सरकार ने अंतत: 15 जनवरी 1948 को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने का फैसला किया और जनवरी के अंत तक उसे वह राशि सौंप दी गई.

Story Of Partition Of India
भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान लाखों लोग अपनेा घर-बार छोड़कर गए.

शराब की कंपनियों का नहीं हुआ बंटवारा

भारत के पास उस वक्त जितनी संपत्ति थी उसका बंटवारा किया गया था, सिर्फ शराब कंपनियों का विभाजन नहीं हुआ था. पाकिस्तान एक इस्लामिक देश था, इसलिए उनके लिए शराब हराम था, लेकिन इन कंपनियों के बदले पाकिस्तान को मुआवजा दिया गया था, जिसे लेने से पाकिस्तान ने मना नहीं किया था. जबकि अन्य सभी चीजों के बंटवारे में खूब मारामारी हुई थी.

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FAQ : भारत-पाकिस्तान विभाजन की रेखा किसने खींची थी?

लॉर्ड रेडक्लिफ ने भारत-पाकिस्तान विभाजन की रेखा खिंची थी.

भारत-पाकिस्तान विभाजन में किस चीज का नहीं हुआ था बंटवारा?

एक बिगुल का बंटवारा नहीं हुआ था, उसे लॉर्ड माउंटबेटन निशानी के तौर पर अपने साथ लेकर गए थे.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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