सोनम, मुस्कान और सिया: क्या कहती हैं ये चर्चित हत्याएं?
Siya Goel, Muskan Rastogi, Sonam Raghuvanshi
Ketan Agrawal Murder Case : प्यार, विश्वास और साथ निभाने के वादों के बीच आखिर ऐसी कौन-सी मानसिक और सामाजिक दरारें उभर रही हैं, जो कुछ रिश्तों को हत्या जैसी भयावह घटनाओं तक पहुंचा रही हैं?
Ketan Agarwal Murder : हाल के महीनों में, भारत में हत्या के कई चौंकाने वाले मामले सामने आए हैं, जिनमें महिलाओं पर अपने पति या मंगेतर की हत्या का आरोप है. इन घटनाओं ने लोगों के बीच इस बात पर ज़ोरदार बहस छेड़ दी है कि आखिर कौन सी मनोवैज्ञानिक वजहें लोगों को ऐसे भयानक कदम उठाने के लिए उकसाती हैं.
सबसे ज़्यादा चर्चा में रहे मामलों में से एक इंदौर का राजा रघुवंशी मर्डर केस था, जिसमें नई-नवेली दुल्हन सोनम रघुवंशी पर हनीमून के दौरान अपने पति की हत्या की साज़िश रचने का आरोप लगा था.
एक और मामला जिसने पूरे देश को चौंका दिया, वह मेरठ का चर्चित मुस्कान रस्तोगी “ब्लू ड्रम” मर्डर केस था, जिसमें एक महिला पर अपने प्रेमी की मदद से पति की हत्या करने और लाश को एक ड्रम में छिपाने का आरोप लगा था.
और फिर कल, पुणे में पुलिस ने लोहगढ़ किले के पास एक महिला (सिया) और उसके कथित प्रेमी को उसके मंगेतर (केतन) की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया. जांच करने वालों के मुताबिक, शादी से पहले पीड़ित को रास्ते से हटाने के लिए कथित तौर पर यह हत्या की गई थी.
हालांकि ऐसे कई मामलों में अभी भी जांच और अदालती कार्यवाही चल रही है, लेकिन ये घटनाएं एक अहम सवाल खड़ा करती हैं: आखिर वे कौन सी मनोवैज्ञानिक वजहें हैं जो आज की पीढ़ी की महिलाओं को ऐसी हत्या करने के लिए उकसा सकती हैं?
सामाजिक संरचना में बदलाव
जानेमाने मनोवैज्ञानिक डॉ. पवन बर्नवाल के अनुसार, पहले भारतीय समाज ज्यादा स्थिर और पारंपरिक था. पुरुषों और महिलाओं का कामकाज बटा हुआ था. महिलाओं के जीवन और सामाजिक जिम्मेदारियों पर कई तरह की सीमाए थीं. समय के साथ शिक्षा का फैलाव हुआ और महिलाओं को अधिक अवसर मिलने लगे. हालांकि, शिक्षा और विवेक हमेशा एक ही बात नहीं होते. शिक्षित होना व्यक्ति को सक्षम बना सकता है, लेकिन सही निर्णय लेने की क्षमता कई अन्य सामाजिक और पारिवारिक बातों पर भी निर्भर करती है.
डॉ. बर्नवाल का मानना है कि पहले संयुक्त परिवारों का ढांचा मजबूत था. बच्चे दादा-दादी, चाचा-चाची और अन्य रिश्तेदारों के बीच बड़े होते थे. आज अधिकांश परिवार एकल परिवार बन गए हैं. कामकाजी माता-पिता के कारण बच्चों को पहले जैसी पारिवारिक निकटता नहीं मिल पाती. इससे कई बार सामाजिक व्यवहार, भावनात्मक समझ और रिश्तों को संभालने की क्षमता प्रभावित होती है.
नार्सिसिज्म: व्यक्तित्व में छिपा आत्ममोह
नार्सिसिज्म एक ऐसा व्यक्तित्व गुण है जिसमें व्यक्ति स्वयं को सबसे अधिक महत्व देता है और दूसरों की भावनाओं को कम महत्व देता है. ऐसे लोगों में अक्सर नियंत्रण रखने की प्रवृत्ति, अत्यधिक आत्मकेंद्रित सोच और सामाजिक व्यवहार की कमी दिखाई देती है.
डॉ. बर्नवाल के अनुसार, कई बार ऐसे व्यक्तित्व लक्षण बचपन या युवावस्था में स्पष्ट नहीं दिखते. परिवार भी उन्हें पहचान नहीं पाता. लेकिन जब किसी व्यक्ति की इच्छाएँ और जुनून अत्यधिक बढ़ जाते हैं, तब यह समस्या सामने आती है. कुछ मामलों में यह प्रवृत्ति इतनी गहरी हो सकती है कि व्यक्ति कानून, सामाजिक आलोचना या नैतिक जिम्मेदारियों की भी परवाह नहीं करता.
जब किसी व्यक्ति में सहानुभूति की कमी आ जाती है, तो वह अपने जीवनसाथी को एक इंसान के रूप में नहीं बल्कि अपनी इच्छाओं के रास्ते की बाधा के रूप में देखने लगता है. यही सोच आगे चलकर खतरनाक और आपराधिक व्यवहार का आधार बन सकती है.

‘कैंसल कल्चर’ और आभासी जीवन का प्रभाव
आज के दौर में कुछ लोग अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं को सर्वोपरि मानने लगे हैं. यदि कोई व्यक्ति उनकी सोच या पसंद के अनुरूप नहीं होता, तो उसे जीवन से बाहर कर देने की मानसिकता विकसित हो जाती है. इसे व्यापक रूप से कैंसल कल्चर की प्रवृत्ति के रूप में देखा जा सकता है.
सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया ने भी इस सोच को प्रभावित किया है. कुछ लोग आभासी दुनिया में दिखने वाली विलासितापूर्ण जीवनशैली को वास्तविक जीवन मान बैठते हैं. जब वास्तविक जीवन उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होता, तो उनमें निराशा, असंतोष और रिश्तों के प्रति नकारात्मक भावनाएं पैदा हो सकती हैं. धीरे-धीरे वे व्यावहारिक जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करने की बजाय उन्हें हटाने की कोशिश करने लगते हैं.

त्वरित समाधान की मानसिकता
आधुनिक मनोविज्ञान में इसे इंस्टैंट ग्रैटिफिकेशन कहा जाता है. ऐसे लोग हर समस्या का तत्काल समाधान चाहते हैं. वे रिश्तों में आने वाली कठिनाइयों, तलाक, पारिवारिक विरोध या सामाजिक आलोचना का सामना करने से बचना चाहते हैं.
कई बार वे यह मान बैठते हैं कि किसी व्यक्ति को रास्ते से हटाने से उनकी सभी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी. लेकिन वास्तविकता में ऐसे निर्णय न केवल अपराध की ओर ले जाते हैं, बल्कि कई परिवारों और जीवनों को भी बर्बाद कर देते हैं.
अपराध कथाओं और सोशल मीडिया का प्रभाव
अपराध विज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार अपराध संबंधी खबरें, वेब सीरीज़ और सनसनीखेज सामग्री देखने से कुछ लोगों में यह गलत धारणा बन सकती है कि वे अपराध करके बच सकते हैं.
हालांकि अधिकांश लोग ऐसी सामग्री को केवल मनोरंजन के रूप में देखते हैं, लेकिन जिन व्यक्तियों में पहले से ही चालाकी, हेरफेर या नैतिक कमजोरी की प्रवृत्ति होती है, उनमें यह सामग्री जोखिमपूर्ण सोच को बढ़ावा दे सकती है.
क्या यह केवल महिलाओं का मुद्दा है?
विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यह केवल महिलाओं से जुड़ा मुद्दा नहीं है. भारत और दुनिया भर के आंकड़े बताते हैं कि जीवनसाथी की हत्या के मामलों में पुरुषों की संख्या अभी भी अधिक है. हाल के कुछ चर्चित मामलों में महिला आरोपियों के सामने आने से यह धारणा बन सकती है कि यह महिलाओं से जुड़ी नई प्रवृत्ति है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है.
इस विषय पर मनोवैज्ञानिक डॉ. भूमिका सच्चार बताती हैं कि इन घटनाओं के पीछे पारिवारिक उपेक्षा एक महत्वपूर्ण कारण है, जिसे वे साइलेंट क्राइसिस कहती हैं. परिवार कई बार बच्चों या युवाओं के व्यवहार संबंधी संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. पहचान का दमन, भावनात्मक सहयोग की कमी, पारिवारिक तनाव, गुस्से की समस्या, रिश्तों को संभालने में कठिनाई और इम्पल्सिव व्यवहार जैसे संकेतों को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता.
उनका मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव भी समाज में अपराध की बढ़ती प्रवृत्तियों से जुड़ा हुआ है.
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लेखक के बारे में
By Achal Priyadarshy
अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 31 पुस्तकों के लेखक हैं। उन्होंने अपने अकादमिक और बौद्धिक जीवन में भारत की जनजातीय परंपराओं, ज्ञान प्रणालियों और वैश्विक राजनीति को केंद्र में रखा है। इन्होंने ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI), रांची तथा झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ कार्य किया है। उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक “Tribal Bravehearts” के लिए "शब्द-शिल्पी सम्मान" से सम्मानित किया गया। शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है।
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