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Project Tiger 1973: बाघ से पहले भारत का राष्ट्रीय पशु कौन था, फिर क्यों बदला गया राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक?

Updated at : 18 Nov 2025 3:00 PM (IST)
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Project Tiger 1973

Project Tiger 1973

Project Tiger 1973: हम सबने ने बचपन से यही पढ़ा है कि भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ है. लेकिन शायद ही किसी ने आपको बताया होगा कि आजाद भारत का पहला राष्ट्रीय पशु बाघ (बंगाल टाइगर) नहीं था यह दर्जा किसी और ताकतवर और शाही जानवर के पास था और उसे खुद जवाहरलाल नेहरू ने चुना था. सवाल यह भी है कि अगर शेर हमारा पहला राष्ट्रीय पशु था तो आखिर वह पद बाघ(बंगाल टाइगर) को कैसे सौंप दिया गया?

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Project Tiger 1973: राष्ट्रीय प्रतीक सिर्फ गर्व का विषय नहीं होते, वे किसी देश की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और संवेदनशीलता को भी परिभाषित करते हैं. जैसे मोर को राष्ट्रीय पक्षी और कमल को राष्ट्रीय फूल की मान्यता मिली, वैसे ही भारत ने आजादी के बाद एक जानवर को अपनी पहचान के रूप में चुना था, शेर.

कुछ ही वर्षों में परिस्थितियां इस तरह बदलीं कि इसे बदलना पड़ा. 18 नवंबर 1973 में बाघ को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं था, यह भारतीय वन्यजीव इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था. इस बदलाव के पीछे कई राजनीतिक, पर्यावरणीय और संवैधानिक कहानियां छिपी हैं.

शेर- आजाद भारत का पहला राष्ट्रीय पशु, जिसे पंडित नेहरू ने चुना था

जब भारत आजाद हुआ, तब राष्ट्रीय प्रतीकों की पहचान तय करना एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी थी. शेर सदियों से भारतीय सत्ता और शौर्य का प्रतीक रहा है, अशोक स्तंभ के चार सिंह, मुगल दरबारों की शाही परंपराएं, ब्रिटिश शासन के आधिकारिक प्रतीक, हर जगह शेर ही दिखाई देता है. यही कारण था कि 1969 में 9 जुलाई को सरकार ने एशियाई सिंह को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित किया.

कहते हैं कि नेहरू चाहते थे कि राष्ट्रीय पहचान किसी ऐसे जीव के माध्यम से बने जो भारतीय इतिहास, गौरव और ताकत का प्रतिनिधित्व करता हो, शेर इसके लिए आदर्श माना गया. लेकिन यह फैसला स्थायी साबित नहीं हुआ, क्योंकि जल्द ही देश एक बड़े वन्यजीव संकट से जूझने लगा.

इंदिरा गांधी

जब बाघ गायब होने लगा और भारत में मचा वन्यजीव आपातकाल

1970 के दशक की शुरुआत में भारत ने एक डराने वाली सच्चाई का सामना किया. देश में बाघों की संख्या तेजी से खत्म हो रही थी. कभी हजारों में रहने वाले बाघ अब सैकड़ों तक सिमट गए थे. राजाओं की शिकार पार्टियां, ब्रिटिश अफसरों की ट्रॉफी हंटिंग और आजादी के बाद जारी अवैध शिकार ने मिलकर बाघ को लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया.

जंगलों में सन्नाटा बढ़ रहा था और कई इलाकों से आखिरी बाघ की आवाजें हमेशा के लिए खो चुकी थीं।.सरकार ने जब 1972 में बाघों की गिनती करवाई, तो नतीजे चौंकाने वाले थे. बाघ भारत से गायब हो रहे थे और अगर तुरंत कदम न उठाया गया तो यह प्रजाति इतिहास बन सकती थी.

उसी वक्त भारत ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया. बाघ को बचाना देश के पर्यावरणीय अस्तित्व से जुड़ा है. इसके बाद शुरू हुई वह कहानी जिसने भारतीय वन्यजीव संरक्षण का चेहरा ही बदल दिया.

18 नवंबर 1973 – जब शेर से ‘राष्ट्रीय पशु’ का ताज लेकर बाघ बन गया भारत की पहचान

1 अप्रैल 1973 को भारत सरकार ने आधिकारिक घोषणा की. रॉयल बंगाल टाइगर अब भारत का राष्ट्रीय पशु होगा. फैसला 1972 में ही हो चुका था, लेकिन इसकी औपचारिक घोषणा प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के साथ की गई.

यह सिर्फ एक प्रतीक बदलने का फैसला नहीं था. यह भारत का संदेश था कि देश अपने पर्यावरणीय भविष्य के लिए गंभीर है. बाघ को राष्ट्रीय पशु बनाकर भारत ने उसके संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी.

बाघ को चुनने के पीछे कई कारण थे. सबसे पहले—बाघ भारत के 16 राज्यों में पाया जाता था, जबकि शेर सिर्फ एक जगह गुजरात के गिर वन तक सीमित था. एक राष्ट्रीय प्रतीक के लिए यह बहुत जरूरी था कि वह पूरे देश की भूगोल, जैव विविधता और संस्कृति को प्रतिबिंबित करता हो.

दूसरी वजह बाघ का भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों में अटूट स्थान था, शेर की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और गहरा. देवी दुर्गा की सवारी, जंगलों की सबसे बड़ी बिल्ली और भारतीय साहित्य से लेकर लोककथाओं तक बाघ हमेशा शक्ति, साहस और संतुलन का प्रतीक रहा है.

गाय का धार्मिक महत्व बहुत है, फिर भी राष्ट्रीय पशु क्यों नहीं?

यह सवाल कई बार उठता है, गाय को गोमाता माना जाता है, उसकी पूजा की जाती है, फिर सरकार उसे राष्ट्रीय पशु क्यों नहीं घोषित कर सकती? इसके पीछे धार्मिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक कारण हैं.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 246(3) कहता है कि पशुपालन और पशुओं का संरक्षण राज्य सूची का विषय है. केंद्र सीधे किसी पशु को राष्ट्रीय पशु घोषित नहीं कर सकता. हर राज्य की अपनी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां और सांस्कृतिक संदर्भ अलग होते हैं, जिन्हें एक समान कानून से नियंत्रित नहीं किया जा सकता.

इसीलिए कई बार सोशल मीडिया में फैली अफवाहों के बावजूद सरकार ने स्पष्ट कहा कि गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की कोई योजना नहीं है. हिमाचल प्रदेश ने 2015 में गाय को अपना राज्य पशु घोषित कर दिया था और नेपाल में गाय राष्ट्रीय पशु है.

क्या शेर को फिर से राष्ट्रीय पशु बनाने का प्रयास हुआ?

2015 में राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी ने नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ से अनुरोध किया था कि शेर को दोबारा राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए. लेकिन बोर्ड ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया. कारण वही—शेर की सीमित भौगोलिक उपस्थिति और बाघ की देशव्यापी पहचान.

एक समय भारत में बाघ ही बाघ थे,फिर कैसे खत्म होने लगे?

ब्रिटिश काल में एक अंग्रेज अफसर के लिए शौक था. अपने साथियों के साथ जंगलों में जाकर बाघ मारना और उसके साथ फोटो खिंचवाना. यही शौक राजाओं और रजवाड़ों में भी तेजी से फैला. बाघों के शिकार को वीरता का प्रतीक माना जाता था. एक राजा ने तो अपनी शिकार डायरी में लिखा, मैंने अकेले 114 बाघ मारे.”

इसीलिए 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू करना सिर्फ जरूरी नहीं था, बल्कि अनिवार्य था. आज भारत दुनिया के कुल बाघों की आबादी के 75% से अधिक का घर है यह उपलब्धि बताते समय गर्व महसूस होता है कि बाघ को राष्ट्रीय पशु बनाना सिर्फ एक प्रतीक नहीं, बल्कि संरक्षण की जीत है.

शेर इतिहास का प्रतीक है, बाघ भविष्य की जिम्मेदारी

राष्ट्रीय पशु का चुनाव किसी शक्ति प्रदर्शन का विषय नहीं होता. यह प्राकृतिक विरासत की रक्षा, सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरणीय संतुलन का सवाल होता है. शेर भारत के राजसी इतिहास का प्रतीक है और बाघ भारत के संरक्षण भविष्य का.

बाघ को राष्ट्रीय पशु बनाकर भारत ने यह संदेश दिया कि राष्ट्रीय गौरव सिर्फ सिंहासन पर बैठने से नहीं आता, बल्कि उन जीवों की रक्षा से आता है जिन पर हमारी धरती की सांसें टिकी होती हैं.

संदर्भ
बाघ, विरासत और सरोकार, डां समीर कुमार सिन्हा, डां विनीता परमार

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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