ओला, उबर, रैपिडो चलाने वालों का गुस्सा फूटा, एग्रीगेटर कंपनियां कैसे कर रही हैं शोषण?

Updated at : 07 Feb 2026 2:24 PM (IST)
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Ola, Uber strike

स्ट्राइक पर हैं ओला, उबर और रैपिडो के ड्राइवर

Ola Uber strike : ओला, उबर और रैपिडो जैसी एग्रीगेटर कंपनियों के जरिए राइड लेने वाले और आम आदमी को सुविधा देने वाले ड्राइवर 7 फरवरी को राइड नहीं ले रहे हैं और इसकी वजह यह है कि उन्होंने यह आरोप लगाया है कि उन्हें एल्गोरिदम के जरिए राइड बुक कराने वाली कंपनियां अपना फायदा देख रही हैं और उन्हें गरीबी में धकेल रही हैं.

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Ola Uber strike : ट्रांसपोर्टेशन के लिए मेट्रो शहर से लेकर टियर 2 और टियर–3 की शहरों में भी आम लोग उबर, ओला और रैपिडो पर निर्भर से हो गए हैं. मोबाइल में इंस्टाॅल इनके एप के जरिए पूरे परिवार को साथ जाना हो, तो या फिर अकेले दुपहिया में कहीं जाना हो, तब भी आम आदमी इन एप पर भरोसा कर रहा है. आज इन एप के जरिए आम आदमी के लिए यात्रा आसान बनाने वाले ड्राइवर हड़ताल पर हैं, तो हर आने–जाने वाला इंसान यह सोच रहा है कि आखिर इन ड्राइवर्स को परेशानी क्या है? आखिर वे क्यों कह रहे हैं कि वे शोषण के शिकार बन रहे हैं. आइए समझते है.

ओला–उबर के ड्राइवर्स का कैसे हो रहा है शोषण?

ओला, उबर और रैपिडो जैसी एग्रीगेटर कंपनियां, डाइवर्स को राइड तो उपलब्ध कराती हैं, लेकिन उसके एवज में वे मोटा कमीशन वसूल करती हैं. साथ ही जीएसटी की काटा जाता, परिणाम यह होता है कि ड्राइवर के पास काफी कम पैसा बचता है, जबकि ड्राइवर के पास कई खर्चे होते हैं.

यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि ओला, उबर के ड्राइवर राइड का किराया तय नहीं कर सकते हैं, यह विकल्प सिर्फ राइड उपलब्ध कराने वाली कंपनी के पास है. इसी वजह से गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर अपने शोषण की बात कर रहे हैं और कह रहे हैं कि उनकी कमाई होती ही नहीं है. समय के साथ उनकी कमाई पर ग्रहण लगता जा रहा है.

एक राइड बुकिंग पर कंपनी और ड्राइवर को कैसे मिलता है पैसा?

जब कोई ग्राहक राइड की बुकिंग करता है, तो उसे कंपनी द्वारा एक अनुमानित एक किराया नजर आता है, जिसके आधार पर कोई ग्राहक अपनी राइड की बुकिंग करता है. बहुत संभव है कि जब वह अपने गंतव्य तक पहुंचे , तो वही किराया उसे देना पड़ा, लेकिन कभी–कभार ट्रैफिक की वजह से किराया बढ़ भी जाता है. इसकी वजह यह है कि कंपनियां किराया दूरी और समय के आधार पर तय करती हैं. जब कोई गाड़ी ट्रैफिक में फंसती है, तो दूरी तो नहीं बढ़ती है, लेकिन डिस्टिनेशन तक पहुंचने का किराया बढ़ जाता है, जिसकी वजह से कंपनिया किराया बढ़ाती हैं, जो कैब, बाइक और ऑटो में अलग–अलग होता है.

कंपनियां जो किराया तय करती हैं, उसका 20% से 30% काट लेती हैं, उसके बाद जीएसटी भी कटता है. यानी अगर किराया 200 रुपए तय हुआ है, तो ड्राइवर को 120 से 150 रुपए तक मिलते हैं. अब यहां गौर करने वाली बात यह है कि ड्राइवर को गाड़ी की मेंटनेंस भी करती होती है और पेट्रोल का खर्चा भी देना होता है. इस परिस्थिति में उसके पास अपना गुजारा करने के लिए पैसे बहुत कम बचते हैं.

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क्या है ड्राइवर्स की मांग?

ओला, उबर और रैपिडो के ड्राइवर सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि बेसिक किराया सरकार की ओर से तय किया जाए, ताकि कंपनियां इसके निर्धारण के अधिकार का उपयोग सिर्फ अपने फायदे के लिए ना कर सकें. उनका कहना है कि एप का एल्गोरिदम डिमांड और परिस्थितियों के अनुसार राइड उपलब्ध कराता है और उसकी आधार पर किराया भी तय होता है. अगर डिमांड ज्यादा होगी तो किराया ज्यादा होगा, लेकिन अगर डिमांड कम होगी तो किराया कम होगा. इस तकनीकी गणित में ड्राइवर को हमेशा नुकसान होता है.

इसी वजह से वे यह चाहते हैं कि न्यूनतम किराया और कंपनियों का अधिकतम कमीशन भी निर्धारित कर दिया जाए, ताकि ड्राइवर्स को गरीबी ना झेलनी पड़े. इसके लिए ड्राइवर्स ने परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को पत्र लिखा है. वे यह चाहते हैं कि टैक्सी में प्राइवेट गाड़ियों का इस्तेमाल बंद हो. इसके साथ ही ड्राइवर्स की यह मांग है कि व्हीकल एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025 में जो गाइडलाइंस हैं, उन्हें पूरी तरह लागू किया जाए. अगर डिमांड ज्यादा हो और किराया बढ़ता है तो उसका लाभ ड्राइवर को भी मिले ना कि सिर्फ कंपनियां मेवा खाएं.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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