Mughal Harem Stories : बादशाह की बेगमों पर भी हावी थीं, हरम की उपपत्नियां; वफादारी की नहीं थी कोई शर्त

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मुगल हरम में बादशाह और उनकी उपपत्नी

Mughal Harem Stories : जो लोग यह समझते हैं कि मुगलों का हरम महज ऐशो-आराम की जगह था, तो उन्हें इसके बारे में विस्तार से पढ़ना चाहिए. इसकी वजह यह है कि मुगल हरम एक तरह से मुगलिया सल्तनत की रुह था. हरम में बादशाह की पसंदीदा औरतें तो होती ही थीं, साथ ही होती थीं मुगलों की परंपराएं, उनके पर्व त्योहार और राजनीति. हरम का संचालन राजा की फेवरेट बेगम करती थीं, जिसका राज हरम पर होता था, लेकिन हरम में एक औरत की भी बहुत चलती थी और वो होती थी राजा की उपपत्नी या जिसे आम बोल की भाषा में कहते हैं रखैल. इन उपत्नियों से राजा शादी तो नहीं करते थे, लेकिन उनकी संतानें, राजा की ही मानी जाती थीं.

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Mughal Harem Stories : मुगल हरम में बादशाह की पत्नियों और मां के अलावा जिस औरत को सबसे अधिक प्राथमिकता मिलती थी, वो थी उनकी उपपत्नी . कई बार बादशाह की नजरें अपनी रखैलों पर इस कदर इनायत होती थीं कि उन्हें पत्नी से भी अधिक महत्व मिल जाता था. रखैल या उपपत्नी की परंपरा कहां से शुरू हुई, इसे समझना बहुत ही आसान है क्योंकि रखैल उन्हीं औरतों को रखा जाता था, जो युद्ध में हारे हुए राज्य की औरतें होती थीं. इन औरतों को दासी के रूप में रखा जाता था और मालिक के साथ उनके शारीरिक संबंध भी होते थे. बादाम चस्म (बादाम जैसी आंखों वाली), नाज़ुक बदन (नाज़ुक शरीर वाली), सुख दैन (आराम देने वाली), कुतूहल (खुश), सिंगार (सुशोभित), पियार (प्रेमी) जैसे नाम इन उपपत्नियों की पहचान होते थे.

मुगल काल में कौन होती थी उपपत्नी और क्या थी उनकी स्थिति?

मुगल काल में हरम में उन औरतों को भी रखा जाता था, जो युद्ध के दौरान बंदी बनाई जाती थीं. साथ ही कुछ महिलाओं को दासी के रूप में खरीदा भी जाता था. ऐसी औरतों के साथ मालिक के शारीरिक संबंध जायज माने जाते थे, हालांकि उनके साथ निकाह की इजाजत नहीं थी. अकबर का हरम काफी बड़ा था और उसके हरम में उसकी पत्नियों के अलावा उसकी रखैलें भी रहती थीं, जिन्हें उपपत्नी कहा जाता था. उपपत्नी और बादशाह के संबंध से जो औलादें पैदा होती थीं, उन्हें मालिक की संतान ही माना जाता था. अकबर की बेटी शक्र-उन-निसा बेगम भी एक उपपत्नी की ही बेटी थी, जिससे अकबर बहुत लाड़ रखते थे.

मुगलों में उपत्नी की परंपरा बहुत आम थी और उनके परिवार में इसे लेकर कोई विरोध भी नहीं था. किशोरी शरण लाल अपनी किताब The Mughal Harem में लिखते हैं कि बाबर की दो प्रमुख उपपत्नियां गुलनार अघाचा और नरगुल अघाचा थीं. हालांकि वे अघाचा (कनीज या उपपत्नी के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द)थीं, फिर भी वे शाही घराने की मान्यता प्राप्त महिलाएं बन गईं. गुलबदन बेगम (बाबर की बेटी) ने कई बार उनका उल्लेख उत्सवों और पारिवारिक समारोहों में भाग लेते हुए किया है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि बादशाह जिस भी औरत से ज्यादा प्रेम करता था, हरम में उसका महत्व उतना होता था. इसके लिए उसका पत्नी होना जरूरी नहीं था.

क्या उपपत्नी का बादशाह के प्रति वफादार होना जरूरी था?

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मुगल हरम की कहानियां

मुगलकाल में उपपत्नियों का महत्व कभी ज्यादा रहा और कभी कम, लेकिन एक बात हमेशा कायम रही कि पत्नियों और उपपत्नियों के बीच एक खास फर्क होता था. पत्नियों का यह धर्म था कि चाहे उनकी भूमिका अहम हो या गौण उन्हें बादशाह के प्रति वफादार रहना जरूरी था. वहीं यह बात उपत्नियों पर लागू नहीं थी. उपत्नियां बादशाह की पसंदीदा भी हों, तब भी उनसे यह अपेक्षा नहीं की जाती थी कि वे बादशाह के प्रति वफादार रहेंगी ही. किशोर शरण लाल लिखते हैं कि अकबर की कुछ धाय (उदाहरण के लिए भावल अनगा) हुमायूं की उपपत्नियां थीं. अकबर की भी कई उपपत्नी थीं. जहांगीर बिना किसी हिचकिचाहट के लिखते हैं, मेरे जन्म के तीन महीने बाद, मेरी बहन शाहजादा खानम, शाही उपपत्नियों में से एक (कनीजान) से पैदा हुई थी.

अकबर के बेटे मुराद और दानियाल की माताएं भी उपपत्नियां थीं, जबकि उपपत्नी बीबी दौलत
शाद, राजकुमारी शक्र-उन-निसा बेगम की मां थीं. शक्र-उन-निसा बेगम जहांगीर के शासनकाल के दौरान जीवित थीं और मुगल हरम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं. अराम बानू बेगम, जिनकी मृत्यु अविवाहित अवस्था में हुई, अकबर की एक और बेटी थीं जो एक उपपत्नी से पैदा हुई थीं. जहांगीर की भी अपनी पत्नियों के अलावा कई उपपत्नियां थीं. उसके दो बेटे जहांदार और शहरयार 1605 में एक महीने के भीतर उपपत्नियों से पैदा हुए थे. मुगल सम्राटों की रखैलों का नाम उनके जन्मस्थान या उन शहरों के नाम पर रखा जाता था जहां उन्हें हरम में शामिल किया गया था. इसी वजह से मुगलकाल में कई उपत्नियों के नाम अकबराबादी, फतेहपुरी, औरंगाबादी, जैनाबादी और उदयपुरी आदि नामों वाली महिलाएं हैं.

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मुगलों बादशाहों की उपत्नियां क्यों होती थीं अनगिनत, पत्नी सिर्फ 4

मुगल हरम में हजारों महिला रहती थीं, जिनके साथ बादशाह का शारीरिक संबंध होता था, लेकिन एक बादशाह एक वक्त में चार पत्नियों के अलावा पांचवीं से निकाह नहीं कर सकता था. इसकी वजह यह थी कि कुरान और इस्लामिक परंपरा उन्हें ऐसा करने से रोकती थीं. एक मुगल बादशाह कितनी शादियां कर सकता है, इसके लेकर मुगल काल में राजा, दरबारियों और उलेमाओं के बीच काफी चर्चा भी हुई. किशोरी शरण लाल लिखते हैं कि चार पत्नियों का कांस्पेट इसलिए है क्योंकि अगर कोई रानी गर्भवती हो जाए, तो राजा के सुख में किसी तरह की बाधा ना आए और इसकी वजह से गणना के आधार पर चार पत्नियों की इजाजत है. इस सटीक गिनती के अनुसार ना तो तीन और ना ही पांच शादियों की इजाजत दी जा सकती है. हां, मुताह निकाह के जरिए बादशाह कई महिलाओं के साथ संबंध बनाते थे, जो उनकी उपपत्नी होती थी.

क्या मुगलों के पास हरम होते थे?

हां, मुगलों के पास हरम होते थे. इस हरम में उसकी मां, पत्नी, उपत्नी, दासियां और राजा की फेवरेट औरतें रहती थीं.

क्या मुगल अपनी बेटियों से शादी करते थे?

नहीं किसी भी मुगल शासक ने अपनी बेटी से निकाह नहीं किया. इतिहास में इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं.

क्या शाहजहां ने अपनी बेटी से शादी की थी?

ऐसी अफवाह है कि शाहजहां ने अपनी बेटी से शादी की थी. दरअसल मुमताज महल की मौत के बाद शाहजहां गहरे शोक में था, उसकी बेटी जहांआरा ने अपने पिता की बहुत देखभाल की और आजीवन अविवाहित रहीं, जिसकी वजह से यह अफवाह चलती है कि उसने अपनी बेटी से निकाह किया था. इस बात के कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं.

राजपूतों ने अपनी बेटियों की शादी मुगलों से क्यों की?

राजपूतों ने अपनी बेटियों की शादी मुगलों से इसलिए की, ताकि उन्हें राजनीतिक फायदा मिल सके.

क्या किसी मुगल ने अपनी मां से शादी की थी?

नहीं, किसी मुगल ने अपनी मां से शादी नहीं की थी. यह बातें कोरी बकवास हैं.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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Frequently Asked Questions

हां, मुगलों के पास हरम होते थे. इस हरम में उसकी मां, पत्नी, उपत्नी, दासियां और राजा की फेवरेट औरतें रहती थीं.