शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा ने थामा राजद का हाथ, याद आई चंदा बाबू के 3 बेटों की हत्या
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 27 Oct 2024 3:23 PM
Mohammad Shahabuddin : बाहुबली नेता और एक जमाने में बिहार के अपराध जगत पर राज करने वाले मोहम्मद शहाबुद्दीन और लालू यादव का परिवार एक बार फिर साथ आया है. लालू यादव को शहाबुद्दीन अपना बड़ा भाई मानता था, कुछ समय के लिए दोनों परिवार में दूरी भी बनी थी, लेकिन विधानसभा चुनाव 2025 के पहले दोनों परिवार फिर एकजुट हुआ है. राजनीति के जानकारों का मानना है कि शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को पिता की विरासत संभालने और राजद को चुनाव में मजबूत होने के लिए एक दूसरे की जरूरत है. दोनों परिवारों के साथ आने की वजह और शहाबुद्दीन के खौफ पर केंद्रित विस्तृत आलेख पढ़ें.
Mohammad Shahabuddin : सीवान के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब और बेटे ओसामा ने रविवार को राष्ट्रीय जनता दल की सदस्यता ले ली. इस मौके पर राजद सुप्रीमो लालू यादव और उनके बेटे और राजद नेता तेजस्वी यादव भी मौजूद थे. हेना शहाब सीवान से राजद के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं, उनके पति सीवान से ही राजद के सांसद थे. लोकसभा चुनाव 2024 में टिकट नहीं मिलने पर हेना शहाब ने निर्दलीय चुनाव लड़ा था, हालांकि वे चुनाव हार गई थीं. अब जबकि हेना शहाब और उनके बेटे ओसामा की राजद में वापस हो गई है, उम्मीद जताई जा रही है कि पार्टी इस जिले में मजबूत होगी और एक बार फिर शहाबुद्दीन परिवार का असर यहां दिखेगा. संभावना जताई जा रही है कि ओसामा इस बार विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं.
कौन था शहाबुद्दीन?

शहाबुद्दीन एक बाहुबली नेता था, जिसकी राजद सुप्रीमो लालू यादव के साथ करीबी संबंध थे. शहाबुद्दीन सीवान जिले का रहने वाला था और वह यहां से चार बार सांसद रह चुका था, जबकि जीरादेई विधानसभा सीट से दो बार विधायक भी रहा था. शहाबुद्दीन को सीवान जिले में खौफ का पर्याय माना जाता था, उसपर हत्या, फिराती मांगने और अपहरण के कई मामले दर्ज थे, लेकिन सबसे चर्चित मामला था चंदा बाबू के दो बेटों को जिंदा तेजाब से नहलाकर मारने का केस. इस केस की वजह से शहाबुद्दीन को जेल की सजा हुई थी और तिहाड़ जेल में सजा काटने के दौरान ही शहाबुद्दीन को कोविड हुआ और 53 वर्ष की आयु में एक मई 2021 को शहाबुद्दीन की मौत हो गई. उसपर मात्र 19 वर्ष की आयु में सबसे पहला केस दर्ज हुआ था, मामला मारपीट का था.
शहाबुद्दीन ने चंदा बाबू के तीन बेटों की करवाई थी हत्या
शहाबुद्दीन के आदमी रंगदारी वसूलने का काम करते थे, इसी क्रम में उसके कुछ लोग चंदा बाबू के बेटों की दुकान पर पहुंचे और मारपीट करने लगे. अगल-बगल के लोगों को डराया गया कि वे बीच में ना पड़े. चंदा बाबू का एक बेटा बाथरूम में बंद हो गया और जब उसे निकाला गया,तो उसने एसिड का डिब्बा उठा लिया और सबको डरा दिया. उस वक्त तो गुंडे चले गए लेकिन कुछ देर बाद और लोगों के साथ आए और चंदाबाबू के तीनों बेटों को उठाकर अपने साथ शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले गए, जहां तीनों को पेड़ से बांध दिया गया. तीनों के नाथ थे राजीव, गिरीश और सतीश. गिरीश और सतीश को तेजाब से नहलाया गया और वह भी राजीव की आंखों के सामने. उस वक्त शहाबुद्दीन वहां कुर्सी पर बैठकर अपने लोगों को आदेश दे रहा था. जब सतीश और गिरीश के शरीर पर सिर्फ कंकाल बचे तो शहाबुद्दीन वहां से चला गया. राजीव कई दिनों तक वहीं पेड़ से बंधा रहा. बाद में वह किसी तरह वहां से भागा और अपने घर पहुंचा. घटनाक्रम को जानने के बाद चंदा बाबू ने हिम्मत की और कोर्ट गए, जिसमें उन्हें बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ा. केस के दौरान जब राजीव को गवाही देनी थी तो उसकी हत्या गवाही के कुछ दिन पहले कर दी गई, इसके बाद चंदा बाबू ने कहा था हम तो मर चुके हैं, लेकिन शहाबुद्दीन को छोड़ेंगे नहीं. शहाबुद्दीन को चंदा बाबू ने सुप्रीम कोर्ट से सजा दिलवाई थी, जिसकी सजा वह तिहाड़ जेल में काट रहा था.
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शहाबुद्दीन के बेटे को मिल सकता है विधानसभा चुनाव में टिकट
बिहार में साल 2025 में विधानसभा चुनाव होना है. इस चुनाव में लालू यादव अपनी पार्टी की जीत चाहते हैं, शहाबुद्दीन का साथ भी उन्होंने इसलिए लिया था क्योंकि उसकी मुसलमान वोटर्स पर पकड़ थी. अब जबकि शहाबुद्दीन नहीं है, लेकिन उसका रुतबा वोटर्स पर अब भी कायम है, यही वजह है कि उसे बेटे को आगे करके अपने एमवाई (MY) समीकरण को एक बार फिर पुख्ता करना चाहते हैं. शहाबुद्दीन की मौत के बाद पूरे इलाके में शोक था और स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके यहां चार दिनों तक खाना नहीं बना था क्योंकि शहाबुद्दीन जितना क्रूर डाॅन था, उतना ही अपने लोगों का मसीहा भी था. बस इसी बात का फायदा राजद सुप्रीमो उठाना चाहते हैं. नीतीश और बीजेपी के एक साथ रहने से राजद के लिए सत्ता के गलियारा तक पहुंचना टेढ़ी खीर है, इसलिए वे एक बार फिर शहाबुद्दीन के प्रति सहानुभूति को जगाना चाहते हैं. ओसामा युवा हैं और इनके समर्थन की लालू प्रसाद यादव को ज्यादा जरूरत है, यही वजह है कि लालू और शहाबुद्दीन का परिवार एक बार फिर साथ आया है. शहाबुद्दीन के परिवार से हाथ मिलाने से लालू यादव की छवि को एक बार फिर नुकसान होगा इसमें कोई दो राय नहीं है, क्योंकि शहाबुद्दीन अपराध जगत का सिरमौर था और उसके डर के साए में लोगों ने जीवन जीया है.
कौन है शहाबुद्दीन का बेटा ओसामा?
सीवान के सुल्तान शहाबुद्दीन का बेटा ओसामा अब राजनीति में सक्रिय हो गया है. ओसामा ने राजद की सदस्यता ले ली है. शहाबुद्दीन के तीन संतानों में से एक ओसामा शहाब है, बाकी दो बेटिया हैं. ओसामा की छवि भी बहुत अच्छी नहीं है और मोतिहारी गोलीकांड में वे जेल भी जा चुके हैं. इनकी शिक्षा को लेकर भी कोई पुष्ट जानकारी सामने नहीं आ पाई है. सीवान के लोग पहले से ही इस उम्मीद में थे कि ओसामा शहाबुद्दीन की विरासत संभालेंगे और अब वे सामने आ गए हैं.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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