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Islamic World Crisis: हिज्बुल्लाह सरगना की मौत पर सऊदी अरब, मिस्र ने नहीं जताए शोक, इजरायल से डर या है कोई और राज?

Updated at : 30 Sep 2024 6:55 PM (IST)
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Islamic World Crisis

कहीं शिया और सुन्नी देशों की खेमेबंदी तो नहीं

हिज्बुल्लाह सरगना नसरल्लाह की मौत पर बड़े मुस्लिम देशों की चुप्पी के कारणों का यहां पढ़िए खुलासा…

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Islamic World Crisis: लेबनान के आतंकी संगठन हिज्बुल्लाह के सरगना नसरल्लाह की मौत पर भारत में आंसुओं का सैलाब आया है. जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की आंखें तो भाषण देते वक्त ही गीली हो गई और गला भरभरा गया. दुखी होकर उन्होंने एक दिन के लिए खुद को चुनाव प्रचार से दूर रखने का एलान किया. नसरल्लाह की मौत पर जम्मू-कश्मीर में तो कई जगह छोटी बच्चियों तक ने प्रदर्शन किए. देश के अन्य हिस्सों से भी आक्रोश और संवेदना जताने की खबरें आई.

एक ओर भारत में नसरल्लाह के जाने पर रुदन-क्रंदन चल रहा है, वहीं दूसरी ओर इस्लाम के नाम पर दुनिय़ा भर में झंडा उठाए घूमने वाले मुस्लिम मुल्कों ने चुप्पी साध रखी है. सऊदी अरब और तुर्की जैसे सबसे ताकतवर मुस्लिम देशों ने तो शोक के दो शब्द तक नहीं कहे. मिस्र, सीरिया और जॉर्डन तक ने नसरल्लाह की मौत पर विलाप से परहेज किया है.

संयुक्त अरब अमीरात, कतर और बहरीन जैेसे देशों के भी डिप्लोमैटिक स्टेटमेंट में नसरल्लाह की मौत का कोई जिक्र तक नहीं किया गया है. लेबनान संकट पर इनमें से अधिकतर देशों के औपचारिक बयान जरूर आए हैं, लेकिन इन सभी बयानों का लब्बोलुआब यही है कि वे लेबनान के घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं. लेबनान की संप्रभुता और उसकी सीमाओं का सम्मान होना चाहिए.नसरल्लाह की मौत का जिक्र तक नहीं है.

Islamic World Crisis: कहीं शिया और सुन्नी में तो नहीं बंट गया मुस्लिम उम्मा

जानकारों का मानना है कि इस्लाम के दार्शनिक अधिष्ठान के तहत हर देश की राष्ट्रीयता और उसकी सीमाओं का सम्मान किया जाता है. परंतु, पूरी दुनिया के इस्लामी भााईचारे के तहत आध्यात्मिक आधार पर भी बिना सीमाओं के एक काल्पनिक वैश्विक राष्ट्र की कल्पना की जाती है, जिसे मुस्लिम उम्मा कहा जाता है.

मुस्लिम देशों ने अपना एक संगठन भी बना रखा है, जिसका नाम OIC ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन है, पूरी दुनिया में जहां कहीं भी मुसलमानों के साथ भेदभाव या अत्याचार की बात सामने आती है, वहां के बारे में इस संगठन की तीखी प्रतिक्रिया सामने आती है. 

मान लिया जाय कि  नसरल्लाह आतंकी सरगना था और बड़े मुस्लिम देश उसके साथ खड़ा नहीं दिखना चाहते हैं. लेकिन हमास भी तो आतंकी संगठन है और उसके सरगना की हत्या पर अधिकतर मुस्लिम देशों की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई. परंतु, हिज्बुल्लाह और हमास में एक अंतर है. जहां हिज्बुल्लाह ईरान समर्थित शिया मुसलमानों का संगठन है, वहीं हमास फिलीस्तीन के सुन्नी मुसलमानों का संगठन है.

ईरान को अगर छोड़ दिया जाय तो अधिकतर बड़े मुस्लिम देश सुन्नी शासित हैं. इराक में शिया और सुन्नी आधा-आधा है. इराक में नसरल्लाह की मौत पर शोक भी रखा गया है. लेबनान में भी शिया और सुन्नी लगभग बराबर की संख्या में हैं. लेकिन यहां की सत्ता पर शियाओं के कब्जे के कारण सुन्नी मुस्लिम देशों की लेबनान से कम सहानुभूति है.

सीरिया में तो नसरल्लाह की मौत पर सरकार की ओर से शोक रखे जाने के बावजूद कई शहरों में जश्न मनाया गया है. यह भी गौरतलब है कि खाड़ी देशों और अरब लीग ने 2016 में हिज्बुल्लाह को आतंकी संगठन घोषित कर प्रतिबंधित लगा दिया था. 

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Mukesh Balyogi

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By Mukesh Balyogi

Mukesh Balyogi is a contributor at Prabhat Khabar.

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