हिंदू-मुसलमान के बीच क्यों है दीवार, इतिहास में ऐसा क्या हुआ जो अबतक है हावी?

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Islam In India

Islam In India : बांग्लादेश में 5 अगस्त से हिंसा का दौर जारी है. गुस्सा शेख हसीना की सरकार को लेकर था, लेकिन पीड़ित वहां के हिंदू हो रहे हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदू-मुसलमान के बीच नफरत की यह दीवार मध्ययुग के दौरान ही बननी शुरू हो गई थी. इस आलेख में ऐतिहासिक घटनाओं के जरिए इस बात की पड़ताल करने की कोशिश की गई है कि आखिर क्यों हिंदू-मुसलमान के बीच तमाम भाईचारे के बावजूद एक टीस, एक कसक है.

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Islam In India : भारतीय उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अक्सर हिंदू और मुस्लिम आबादी के बीच हिंसा और तनाव की खबरें सामने आती रहती हैं. मुद्दे कई तरह के होते हैं, जिनका संबंध राजनीति और समाज से रहा है. बांग्लादेश में हिंसा की जो आग जली उसके पीछे वजह आरक्षण था, धर्म से इस विवाद का कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन मंदिर तोड़े गए और हिंदुओं पर अत्याचार हुए. पाकिस्तान में जबरन हिंदू लड़कियों का धर्मांतरण होता है और अपने देश में भी सांप्रदायिक हिंसा ने कई बार समाज को अपने शिंकजे में लिया है. इसकी वजह जानने के लिए उस समय से शुरुआत करते हैं जब भारत में इस्लाम का प्रवेश हुआ था.

भारत में कब हुआ इस्लाम का प्रवेश

सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक प्राचीन देश है, जहां सभ्यता सबसे पहले आई. यहां हिंदू धर्म के लोग निवास करते थे. इतिहास पर नजर डालें तो इस्लाम का प्रवेश भारत में 11वीं -12वीं शताब्दी के बीच हुआ. इससे पहले कुछ मुस्लिम आक्रांता भारत आए, लेकिन वे सिर्फ इस देश पर हमला करने आए थे, इसलिए उनका कोई प्रभाव भारत पर नहीं दिखा. लेकिन मुहम्मद गोरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की. गुलाम वंश की स्थापना के बाद मुस्लिम धर्म और उनकी संस्कृति का प्रसार देश में बढ़ा. कुतुब मीनार का निर्माण भी इसी कालखंड में शुरू हुआ था. इस दौरान फारस से कई मुसलमान भारत आए और यहां बस गए. कहने का आशय यह है कि इसी दौर में इस्लाम का भारत में उदय हुआ और उसका प्रसार होने लगा.

मुस्लिम शासकों ने खुद को मुसलमानों का शासक माना 

डाॅ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष राजेश सिंह कहते हैं कि भारत में इस्लाम का प्रवेश उसी दौर में हुआ, जब इस्लाम का प्रसार शुरू हो गया था. 11वीं-12वीं शताब्दी में इस्लाम भारत आया. इससे पहले जो मुस्लिम शासक भारत आए, जिसमें महमूद गजनवी और मुहम्मद गोरी जैसे लोग भी थे, लेकिन इन लोगों का उद्देश्य यहां से धन लूटना ज्यादा था ना कि यहां शासन करना. लेकिन कुतुबुद्दीन ऐबक जब यहां का शासन बना और दिल्ली सल्तनत की नींव रखी गई, तो इस्लाम का प्रभाव देश में दिखने लगा. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि इतिहास में जो भी मुस्लिम शासक हुए उन्होंने खुद को मुसलमानों का शासक माना, उन्होंने भारत की हिंदू संस्कृति से कुछ नहीं लिया. उन्होंने अपनी चीजों का ही प्रसार किया, इसका परिणाम यह हुआ कि यहां की जनता खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी. उन्हें यह लगने लगा कि उनका धर्म और संस्कृति खतरे में है. परिणाम यह हुआ कि हिंदुओं में असंतोष उत्पन्न हो गया और वे खुद को बचाने की कोशिश करने लगे, जिसका परिणाम भक्ति मूवमेंट के रूप में सामने आया जब हिंदू धर्म का पुर्नरुद्धार हुआ. अकबर और शाहजहां जैसे शासकों को छोड़ दें तो अधिकतर ने खुद को इस्लाम तक सीमित करके रखा. 

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अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम के बीच खिंची दीवार

भारत में जब अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया, तो उन्होंने फूट डालो राज करो की नीति के तहत यहां रह रहे लोगों को बांटने की कोशिश की और इस क्रम में उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच विवाद पैदा किए और उन्हें आपस में लड़ाया. 1905 का बंगाल विभाजन इसका बहुत बड़ा उदाहरण है, जहां धर्म के आधार पर एक राज्य के दो टुकड़े किए गए. राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई को भी उन्होंने बढ़ावा दिया, जिसके परिणामस्वरूप मोहम्मद अली जिन्ना ने अलग पाकिस्तान देश की मांग की, जिसका आधार भी धर्म ही बना. 1947 में जब अंग्रेज भारत से गए तो उन्होंने देश को दो टुकड़ों में बांट दिया और इस बंटवारे की आग में दोनों देश जले, जिसने हिंदू और मुसलमान के बीच नफरत की खाई को इतना बढ़ा दिया कि उसे पाटने में वर्षों लग गए.

1947 का भारत-पाकिस्तान बंटवारा

राजनीतिक विश्लेषक डाॅ धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में बंटवारा एक बहुत बड़ी घटना थी, जिसका प्रभाव इस पूरे क्षेत्र पर पड़ा और यह आज भी दिखता है. अंग्रेजों ने हिंदू और मुसलमान को बांटने की हर संभव कोशिश की और उन्होंने इसके लिए 1905 में धर्म के आधार पर बंगाल का विभाजन कर दिया. मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली भी उन्होंने लाने की कोशिश की थी, जिसका कांग्रेस ने विरोध किया था. बंटवारे की जो स्मृतियां हमारे मस्तिष्क में हैं, उनका प्रभाव इतना गहरा है कि रह-रहकर वह समाज पर हावी हो जाता है. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में मिलियन लोगों की मौत हुई थी और करोड़ों लोग इस ओर से उस ओर विस्थापित हुए थे. उस दौरान उन लोगों ने जो कुछ झेला उसकी स्मृतियां अब भी ताजा हैं और इसका आधार बना था धर्म. इस विस्थापन की वजह से लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर व्यापक प्रभाव पड़ा था. मध्य युग में जो कुछ हुआ उसका उतना असर नहीं था. भारत में हिंदू-मुसलमान अच्छे से रह रहे थे, लेकिन बंटवारे ने व्यापक प्रभाव डाला. एक और अहम बात यह है कि दोनों ही देशों ने इस खाई को पाटने का कोई काम नहीं किया है, बल्कि आतंकवाद और युद्ध जैसी घटनाओं ने इसे और गहरा किया है. 

हिंदू-मुसमान के बीच दीवार धर्म ने नहीं नफरत ने बनाई

मौलाना तहजीब कहते हैं कि इस्लाम में पैगंबर रहमतुल लिल आलमीन पैगंबर मुहम्मद को कहा जाता है, जिसका अर्�� यह है कि अल्लाह ने मानव जाति पर रहमत करने के लिए उन्हें भेजा है. मुहम्मद साहब किसी खास धर्म पर रहमत करने वाले नहीं थे. इस्लाम में अल्पसंख्यकों का ख्याल रखने की बात कही गई है अगर उनपर अत्याचार होता है, जैसा कि बांग्लादेश या पाकिस्तान में हो रहा है, तो उसे यह नहीं कहा जा सकता कि वह धर्म की वजह से हो रहा है. इस अत्याचार के पीछे वह नफरत है, जो कुछ कट्टरपंथियों ने पैदा की है. इसके पीछे उद्देश्य सियासी हो सकता है, वर्चस्व की लड़ाई हो सकती है. इतिहास से अभी तक होता यह रहा है कि जो शासक होता है, वह अपने लोगों को लाभ पहुंचाना चाहता है, इसकी वजह से वह अन्य लोगों की अनदेखी करता है, जिसकी वजह से असुरक्षा की भावना फैलती है. इस्लाम जब भारत आया, तो यहां के लोगों में भी यह असुरक्षा आई होगी. 

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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