भारत के किस क्षेत्र पर नेपाल करता है अपना दावा?  क्या सुशीला कार्की के शासन में दोनों देशों के बीच मिटेंगी सारी दूरियां

Edited by Rajneesh Anand
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भारत-नेपाल सीमा विवाद

India Nepal Border Dispute : भारत और नेपाल के संबंध आमतौर पर मैत्रीपूर्ण रहे हैं और दोनों के बीच कोई बड़ा विवाद कभी सामने नहीं आया है. लेकिन जब भी नेपाल में चीन समर्थित सरकार बनती है, सीमा विवाद उभरकर सामने आता है. पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के शासनकाल में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर नेपाल ने अपना दावा किया था, जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया था. नेपाल में जेन जेड विद्रोह के बाद नई सरकार बनी है, उम्मीद है कि इस मसले पर शांति बनेगी और भारत–नेपाल से संबंध और मजबूत बनेंगे. नेपाल में 2026 में चुनाव भी होना है, जिसके बाद यहां स्थिर सरकार आएगी, इसकी उम्मीद की जा सकती है. आइए समझते हैं दोनों देशों के बीच विवाद क्या है?

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India Nepal Border Dispute : सुशीला कार्की के शपथ के साथ ही नेपाल में जेनरेशन जेड यानी युवाओं का आंदोलन थम गया है. सुशीला कार्की ने वहां अंतरिम सरकार की मुखिया के रूप में शपथ ले ली है. नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल, सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल और Gen-Z ग्रुप के सदस्यों ने बैठक के बाद सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री नियुक्त किया. वे नेपाल की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं. उनके पास नेपाल में शांति स्थापित करने के लिए तमाम शक्तियां हैं और अगला चुनाव कराने के लिए उन्हें पूरी व्यवस्था करनी होगी.

नेपाल में अंतरिम सरकार के गठन के साथ ही यह उम्मीद भी बनी है कि भारत और नेपाल के बीच सीमा को लेकर जो भी गलतफहमियां बन गईं हैं, वो जल्द ही मिट जाएंगी और दोनों देशों के बीच जो मैत्रीपूर्ण संबंध हैं, उनमें और मजबूती आएगी.

भारत- नेपाल के बीच सीमा को लेकर क्या हैं गलतफहमियां

भारत ने अगस्त के महीने में चीन के साथ व्यापार के लिए लिपूलेख दर्रा (Lipulekh Pass) को खोलने का निर्णय किया. भारत के इस फैसले का नेपाल ने विरोध किया और यह दावा किया कि यह इलाका नेपाल का है. नेपाल ने भारत के लिपूलेख (Lipulekh) कालापानी(Kalapani) और लिम्पियाधुरा (Limpiyadhura) क्षेत्र पर अपना दावा किया, जो वर्षों से भारत का हिस्सा है. भारत ने नेपाल के दावे को खारिज करते हुए यह कहा कि उनके दावे प्रमाणिक दस्तावेजों और इतिहास पर आधारित नहीं है.

भारत ने 2025 से कैलाश मानसरोवर यात्रा की फिर से शुरुआत की है और इस यात्रा के लिए सरल और सुगम बनाने मार्ग उन्हीं क्षेत्रों से होकर जाता है, जिसपर नेपाल अपना दावा कर रहा है. भारत ने इस क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य किया है और आगे भी करने की योजना है. इस निर्माण को नेपाल गलत बता रहा है.

इससे पहले नेपाल ने 2020 में अपना एक नक्शा संविधान में शामिल किया था, जिसमें उसने लिपूलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल की सीमा में दिखाया था, भारत ने इस नक्शे का पुरजोर विरोध किया था. उस वक्त नेपाल सरकार ने यह कहा था कि प्रमाणिक दस्तावेजों के जरिए बातचीत से इस विवाद को सुलझा लिया जाएगा.

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क्या है नेपाल का दावा

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सुशीला कार्की नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री

नेपाल यह दावा करता है कि काली नदी का उद्गम स्थल लिम्पियाधुरा है, इस लिहाज से 1816 के सुगौली संधि के अनुसार नदी के पूर्वी किनारे के गांव नेपाल में और पश्चिमी किनारे के गांव ब्रिटिश भारत में आएंगे. इसकी वजह यह है कि संधि में लिखा गया था कि नेपाल की पश्चिमी सीमा काली नदी होगी. 1816 में नेपाल और ब्रिटिश इंडिया के बीच एक संधि हुई थी, जिसे सुगौली संधि कहते हैं.

यह संधि 1814 से 1816 के बीच चले एंग्लो–ब्रिटिश युद्ध के बाद हुई थी, क्योंकि युद्ध में नेपाल की हार हुई थी. इस हार के बाद नेपाल स्वतंत्र तो रहा, लेकिन उसे संधि करने पर मजबूर होना पड़ा. यही संधि पहली बार काली (महाकाली) नदी को भारत–नेपाल की पश्चिमी सीमा मानने का आधार बनी.

भारत का दावा

भारत का कहना है कि काली नदी का असली उद्गम कालापानी यानी लिपुलेख दर्रा के निकट है. इस लिहाज से, कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्र भारत के भीतर आते हैं. इन तीनों विवादित क्षेत्रों का प्रशासन भारत ब्रिटिश समय से करता आ रहा है. इसका प्रमाण यह है कि यहां पुलिस, सड़क, वोटर सूची सबकुछ भारत के हैं.

क्या है वर्तमान स्थिति

जिन क्षेत्रों को लेकर विवाद है, उसपर भारत का प्रशासन वर्षों से है. गुंजी (Gunji) गांव जो उत्तराखंड में पड़ता है, उसपर नेपाल अपना दावा कर रहा है और उसे अपने दार्चुला जिले का हिस्सा बताता है. दोनों देशों के बीच विवाद अभी सुलझा नहीं है. इस स्थिति में अब जबकि नेपाल में एक नई अंतरिम सरकार आई है, उम्मीद की जानी चाहिए कि वो भारत के साथ अपने संबंध को मधुर बनाएगी और किसी दूसरी शक्ति से संचालित दावों के बल पर अपने रिश्ते खराब नहीं करेगी.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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