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Election Campaign: कितना बदल गया चुनाव! कभी बैलगाड़ी से होता था प्रचार, अब उड़नखटोले भी पड़ें कम

Updated at : 28 May 2024 10:18 AM (IST)
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election campaign: लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार में अब 2 दिन बचे हैं. पहली लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक चुनाव प्रचार में रिवॉल्यूशन आया है. 1951 से लेकर 2024 में हुए चुनाव में कैंपेनिंग का तरीका कैसे बदला है. चुनावी सभा का प्रचार प्रसार आज पूरी तरह से डिजिटल हो चुका है.

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Election Campaign: भारत में लोकसभा के अब तक 17 चुनाव हो चुके हैं. पहला चुनाव 1951-52 में हुआ था.उसके बाद से अब तक चुनाव प्रचार के ट्रेंड में जमीन-आसमान का फर्क आया है. प्रचार के पारंपरिक तरीकों के साथ अब हाईटेक कल्चर भी ट्रेंड में है. प्रचार आसान हुआ है. टेक्निकल फ्रेंडली बनने में पार्टियों को काफी फायदे भी हुए हैं. पहले अपनी बातें पब्लिक तक पहुंचाने में जहां हफ्तों का समय लगता था, वहीं अब एक सेकेंड भी नहीं लगता. पहले आम चुनाव में बैलगाड़ी से शुरू हुआ चुनाव प्रचार का सफर आज हेलीकॉप्टर तक जा पहुंचा है. कैम्पेनिंग के तरीके चुनाव दर चुनाव बदलते गए. इलेक्शन कैम्पेनिंग के बदलते ट्रेंड पर नजर डालते हैं.

नुक्कड़ सभा और जनसभा होती थी सबसे खास

1951-52 के चुनाव में नुक्कड़ सभाओं से पब्लिक को कन्विंस करने का दौर चला करता है. बड़े नेताओं की जनसभाएं होती हैं. संगठन के स्थानीय नेता भी नुक्कड़ सभाएं किया करते थे. जानकार बताते हैं कि शुरुआती इलेक्शंस में नुक्कड़ सभाओं पर ज्यादा जोर रहा करता था. इसकी दो वजहें थीं. पहली कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पार्टी की नीतियों व एजेंडों को पहुंचाया जा सकता था. दूसरी वजह थी संसाधनों की कमी. संसाधनों की कमी के दौर में नुक्कड़ सभाएं प्रचार का सबसे प्रचलित माध्यम हुआ करती थीं. नुक्कड़ सभाएं लोगों की आमदरफ्त वाले बाजारों में हुआ करती थीं, जहां ग्रामीण इलाके के लोग आते थे. भले ही आज बड़े नेताओं की पहुंच जन-जन तक हो गई है, पर भारत में आजादी के बाद के लोकतांत्रिक दौर में पार्टी कार्यकर्ता ही संगठन की अहम कड़ी हुआ करते थे. ये नुक्कड़ सभाओं व जनसंपर्क के माध्यम से चुनावी कैम्पेन में जान फूंका करते थे. यह क्रम आजाद हिन्दुस्तान के पहले चुनाव से शुरू होकर सत्तर-अस्सी के दौर तक बखूबी चला. इस दौरान नई तकनीकों ने चुनाव प्रचार को आसान जरूर किया, पर नुक्कड़ सभा व जनसंपर्क का तोड़ नहीं निकाल सकीं.

संपन्न पार्टियां ही करती थीं चुनाव प्रचार में वाहनों का प्रयोग

कांग्रेस और जनसंघ जैसी संपन्न पार्टियों ने शुरुआती चुनाव में वाहनों का प्रयोग भी चुनाव प्रचार के लिए बखूबी किया. हालांकि यह उस समय ज्यादा खर्चीला हुआ करता था और यह सीमित भी था. बैलगाड़ियों के माध्यम से भी चुनाव प्रचार हुआ करता था. पोस्टर-बैनर छपवाना भी सभी पार्टियों या कैंडिडेट के बस की बात नहीं थी, क्योंकि इनकी लागत उस समय ज्यादा थी हाथ से लिखे पोस्टर बैनर में वक्त और श्रम दोनों ज्यादा लगता था. बाद के चुनावों में हैंडबिल, पंपलेट, पोस्टर ने चुनावी फिजां में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई. वॉल पेंटिंग के माध्यम से भी चुनाव प्रचार का क्रम अस्सी-नब्बे के दशक तक पूरे परवान पर रहा. बाद में चुनाव आयोग के सख्त निर्देशों ने चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों को तो बदला ही, चुनावी खर्चे पर भी लगाम लगा दी. चुनाव आयोग के फैसलों ने चुनावी शोर को काफी हद तक कम किया.

माइकिंग और पर्चे- पंपलेट का दौर भी अब खत्म हुआ

आज के डिजिटल युग के चुनाव प्रचार के दौर में यंग जेनरेशन ने माइकिंग से प्रचार को तो देखा भी नहीं होगा. जीप के ऊपर बंधे भोंपू से गांव-जवार में माइकिंग की जाती थी- ‘आपके अपने चहेते उम्मीदवार को छाप पर मुहर लगाकर भारी से भारी मतों से विजयी बनाएं.’ इस एनाउंसमेंट के साथ ही जीप के पीछे से पर्चे-पंपलेट उड़ाए जाते थे, जिनसे उम्मीदवार के चुनाव चिह्न लोगों तक आसानी से पहुंच जाते थे.

पहले चुनाव में विदेश के रेडियो स्टेशन से पार्टी विशेष का हुआ था प्रचार

पहले आम चुनाव का एक दिलचस्प वाकया भी बताया जाता है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो 1951-52 के आम चुनाव में एक पार्टी ऐसी है जिसके लिए विदेशी धरती से रेडियो प्रसारण कर प्रचार किया गया था. यह प्रचार एक-दो दिन नहीं बल्कि पूरे इलेक्शन के दौरान 4 महीने तक चला था. बताया जाता है कि रेडियो मास्को के द्वारा एक पार्टी विशेष के लिए प्रचार किया जाता था. साथ ही रेडियो ताशकंद भी ऐसा किया करता था. विदेशी धरती से रेडियो के माध्यम से इस तरह के प्रचार से उक्त पार्टी विशेष को कितना फायदा मिला यह तो नहीं कहा जा सकता, पर यह निर्विवाद तथ्य है कि रेडियो से प्रचार का चलन पहले लोकसभा चुनाव से ही अपने देश में शुरू हो गया था, भले ही यह उस समय सिर्फ एक पार्टी के लिए हुआ था.

ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन देते थे राजनीतिक पार्टियों को टाइम स्लॉट

बाद में भी रेडियो प्रसारण से चुनाव प्रचार का क्रम चलता रहा. रेडियो और टीवी की बात करें तो भारत में दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो से राष्ट्रीय पार्टियों को निर्धारित टाइम स्लॉट मिला करते थे, जिनके माध्यम से उनके नेता अपनी नीतियों और एजेंडे से पब्लिक को अवगत कराते थे.भारतीय सिनेमा का उम्मीदवारों या पार्टियों के चुनाव प्रचार में किसी योगदान का अब तक तो उल्लेख नहीं मिलता, किंतु पहले आम चुनाव में एक वृत्त चित्र बनाया गया था जिसके माध्यम से मतदाताओं को जागरूक किया गया था और उन्हें उनके मतदान के अधिकार के संबंध में बताया गया था. बाद के कुछ चुनावों में कुछ पार्टियों ने जरूर कुछ ऐसे चुनावी प्रचार शूट कराए थे, जो सिनेमा हॉल में फिल्मों के बीच दिखाए जाते थे.

अब आईटी सेल करती है हाईटेक कैंपेनिंग

बदलते दौर में अब डिजिटल मीडिया पूरी तरह से चुनाव प्रचार में हावी है. इंटरनेट के माध्यम से जैसे प्रचार आजकल हो रहे हैं वैसा प्रचार शुरुआती वर्षों में अकल्पनीय था. कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि इंटरनेट एक ऐसा माध्यम बनेगा जो पार्टियों और नेताओं की बातों को पल भर में पूरे देश में फैल सकता है. पिछले कुछ आम चुनावों से छोटी-बड़ी पार्टियां अपनी टेक्निकल व आईटी एक्सपर्ट की टीम रखने लगी हैं. यह टीम बकायदे पूरी अवधि में कैंपेनिंग में युद्ध स्तर पर लगी रहती हैं. अब तो निर्दलीय उम्मीदवार तक ने अपने आईटी सेल बना रखे हैं जिनके माध्यम से उनके लिए वोट मांगे जाते हैं. साथ ही लोगों के मोबाइल पर रिकॉर्डेड कॉल व मैसेज किए जाते हैं और वोट मांगे जाते हैं.

  • वक्त के हिसाब से बदलाव
  • निर्वाचन आयोग में कार्यरत गीता चौबे कहती है कि इलेक्शन के लिए प्रचार-प्रसार के कई तरह के बदलाव आए हैं. ये बदलाव वक्त के हिसाब से आए हैं. जनता जब जिन चीजों के साथ इंवॉल्व रही है तब तमाम पार्टियों ने उसी तरीके से प्रचार करने का तरीका अपनाया है. अभी के वक्त का रिवॉल्यूशन बहुत अलग है. अभी जब इंटरनेट का दौर है और सारे लोग फोन और सोशल मीडिया से पूरी तरह प्रभावित होते हैं तब सबसे ज्यादा प्रचार भी इसी माध्यम से किया जा रहा है.
  • आधुनिक तरीका आ रहा रास
  • 70 साल के वोटर नवीन सिंह से जब हमने बात की तो उन्होंने कहा कि हमने वो दौर भी देखा है जब बड़े से बड़े नेता भी वोटिंग से पहले जनता से मिलने और उनका वोट मांगते थे. आज के वक्त में मोबाइल का जमाना है, चुनाव से पहले कुछ नेता आते हैं जो वोट देने की अपील करते हैं लेकिन अब तो फोन कर अलग-अलग आवाजों में प्रचार होता है.
  • तो वहीं 30 वर्षीय पीयूष का कहना है कि आज हर चीज हमारे सामने फोन में एवेलेवल है. हम बस नेताओं के एड कैंपेन देखते नहीं हैं बल्कि सारे एड के एक साथ एवेलेवल होने पर और मुद्दे दिखने पर हमारे लिए कंपेयर करना आसान होता है.
  • महिला वोटर पूजा शर्मा कहती है कि रिवॉल्यूशन तो आया है. वैसे ही तरीके अपनाए जा रहे हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा वोटर्स कनेक्ट हों. अभी एक क्लिक में लाखों करोड़ो लोगों तक नेताओं और पार्टी की बात पहुंच जाती है. तमाम पार्टियां अलग-अलग तरीके एड और तरीके से कैंपेन कर रही है जिससे वोटर्स को इंफ्लूएंस किया जा सकें.
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Neha Singh

लेखक के बारे में

By Neha Singh

Neha Singh is a contributor at Prabhat Khabar.

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