बुधवार को रांची में हजारों छात्रों ने JPSC और JSSC के खिलाफ मार्च निकाला. जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम से अल्बर्ट एक्का चौक तक हुए इस मार्च में छात्रों ने भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्ध नियुक्ति (Time-bound Recruitment) और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की. प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने साफ कहा कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन और तेज होगा. इतना ही नहीं, 6 अगस्त को झारखंड विधानसभा का घेराव करने का भी ऐलान किया गया है. इस पूरे मामले की टाइमिंग बेहद अहम है. 6 से 12 अगस्त तक झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र प्रस्तावित है और 6 अगस्त को ही विधानसभा घेराव का ऐलान किया गया है. ऐसे में कई लोग इसकी तुलना NEET आंदोलन से कर रहे हैं कि कैसे छात्रों का आंदोलन सड़कों पर उतरा, मामला संसद तक पहुंचा और आखिरकार सरकार को अपने फैसले बदलने पड़े. अब झारखंड में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर बनती दिखाई दे रही है. सवाल उठता है कि क्या छात्रों का यह प्रदर्शन झारखंड की राजनीति का अगला बड़ा यूथ मूवमेंट बनने जा रहा है? और क्या इस आंदोलन का असर आने वाले मानसून सत्र पर दिखेगा?अपनी मांगों को लेकर छात्र बैनर और नारेबाजी के साथ JPSC कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करते हुए14वीं JPSC को लेकर छात्रों में क्यों है नाराजगीझारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं पर विवाद कोई नई बात नहीं है. खासकर JPSC और JSSC की परीक्षाएं पिछले दो दशकों से किसी न किसी वजह से लगातार सवालों के घेरे में रही हैं.कभी पेपर लीक के आरोप लगे,कभी रिजल्ट पर सवाल उठे, कभी मामला कोर्ट पहुंचा, तो कई बार जांच एजेंसियों को भी दखल देना पड़ा.अब 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. 14वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा के तहत कुल 103 पदों पर भर्ती होनी थी. प्रीलिम्स परीक्षा के बाद 204 अभ्यर्थियों का चयन मेंस परीक्षा के लिए हुआ. लेकिन रिजल्ट जारी होते ही अभ्यर्थियों ने रिजल्ट, मेरिट लिस्ट और पूरी परीक्षा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए.छात्रों का आरोप है कि आयोग ने कैटेगरी-वाइज कट-ऑफ जारी नहीं किया. रिजल्ट के साथ जारी मेरिट लिस्ट पर आयोग के संवैधानिक सदस्यों के हस्ताक्षर भी नहीं थे. कई अभ्यर्थियों ने मूल्यांकन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए.झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) परीक्षा के कथित पेपर लीक के विरोध में छात्रों का प्रदर्शनयह विवाद उस समय और गहरा गया, जब सोशल मीडिया पर कुछ कथित OMR शीट वायरल हुईं. सबसे ज्यादा चर्चा दूसरे राज्य के एक अभ्यर्थी की कथित OMR शीट को लेकर हुई. दावा किया गया कि उसने पेपर-1 में करीब 48 सवाल हल किए थे, जबकि इस परीक्षा का संभावित कट-ऑफ लगभग 144 अंक बताया जा रहा था. ऐसे में सवाल उठने लगा कि आखिर वह अभ्यर्थी मेंस परीक्षा के लिए क्वालिफाई कैसे कर गया? हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल इन OMR शीट्स की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. इतना ही नहीं, परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो रिजल्ट को लेकर भी विवाद हो रहा है.परीक्षा 19 अप्रैल 2026 को आयोजित हुई. अगले ही दिन यानी 20 अप्रैल को आंसर-की जारी कर दी गई. अभ्यर्थियों को आपत्ति दर्ज कराने के लिए केवल तीन दिन का समय दिया गया. छात्रों का आरोप है कि कई परीक्षा केंद्रों पर अभ्यर्थियों के फिंगरप्रिंट तक नहीं लिए गए. पहचान सत्यापन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए.2 जुलाई 2026 की देर रात करीब 12:30 बजे परीक्षा का रिजल्ट घोषित किया गया. छात्रों का आरोप है कि आयोग ने रिजल्ट के साथ कैटेगरी-वाइज कट-ऑफ जारी नहीं की. इसके अलावा मेरिट लिस्ट पर आयोग के संवैधानिक सदस्यों के हस्ताक्षर भी नहीं थे. कई अभ्यर्थियों का यह भी आरोप है कि कुछ सही उत्तर वाले प्रश्नों को ड्रॉप कर दिया गया या फिर उत्तर पुस्तिकाओं का गलत मूल्यांकन किया गया. उनका कहना है कि उन्होंने इन दावों के समर्थन में आयोग को साक्ष्य भी सौंपे, लेकिन उनकी आपत्तियों पर कोई उचित कार्रवाई नहीं की गई.झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) के पूर्व अध्यक्ष एल खियांग्तेCID कर रही मामले की जांच...मामले में हो रहे विवाद को लेकर सरकार ने CID को SIT बनाकर जांच का निर्देश दिया. CID और रांची पुलिस ने JPSC कार्यालय समेत कई जगहों पर छापेमारी की. 21 जुलाई की देर रात तत्कालीन अध्यक्ष एल खियांग्ते ने इस्तीफा दिया, जिसे अगले दिन राज्यपाल संतोष गंगवार ने स्वीकार कर लिया. 28 और 29 जुलाई को CID ने एल खियांग्ते से कई घंटे पूछताछ की. JPSC की डिप्टी कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन श्वेता गुप्ता, TDPL के निदेशक रामवीर सिंह, मार्केटिंग मैनेजर अभय कुमार तिवारी उर्फ मनोज कुमार तिवारी समेत कई लोगों से भी पूछताछ हो रही है.मानसून सत्र में दिखेगा छात्रों के विरोध का असर ?हाल के दिनों में यह देखा गया है कि युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दे केवल सड़कों तक नहीं रहते. यदि कोई छात्र आंदोलन व्यापक जनसमर्थन हासिल कर ले, तो विपक्ष उसे सरकार को घेरने के लिए एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना लेता है. जैसा कि नीट आंदोलन को लेकर हुआ. ऐसे में विधानसभा की कार्यवाही के दौरान भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, आयोगों की कार्यप्रणाली और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठ सकते हैं.भाजपा सांसदों द्वारा मानसून सत्र के दौरान संसद परिसर में झारखंड की JPSC और JSSC सहित भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली के विरोध में प्रदर्शन यदि छात्रों का आंदोलन लगातार मजबूत होता है और उसे व्यापक सामाजिक व राजनीतिक समर्थन मिलता है, तो सरकार पर प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इसका प्रभाव NEET आंदोलन जितना व्यापक होगा.क्या NEET आंदोलन जैसी स्थिति बनने की संभावना है?छात्रों द्वारा किए जा रहे JPSC प्रदर्शन का आगामी विधानसभा के मानसून सत्र पर क्या असर पड़ सकता है? इस विषय पर हमने पूर्व सूचना आयुक्त और वरिष्ठ पत्रकार बैजनाथ मिश्र से बातचीत की. पढ़िए, इस पूरे मुद्दे पर उनकी क्या राय है.क्या झारखंड में चल रहे छात्रों के आंदोलन की तुलना NEET आंदोलन से की जा सकती है?दोनों आंदोलनों की परिस्थितियां अलग हैं. NEET राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा से जुड़ा मामला था, जबकि झारखंड का आंदोलन राज्य की भर्ती परीक्षाओं को लेकर है. राजनीतिक दृष्टि से देखें तो अभी तक इस आंदोलन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई बड़ा राजनीतिक रंग नहीं मिला है. हालांकि, विपक्ष इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ जरूर उठा रहा है. इसके साथ-साथ NEET आंदोलन सीधे तौर पर सरकार के मंत्री से जुड़ा मामला था, जबकि JPSC विभाग और उसके अधिकारियों से जुड़ा है. संभावना है कि विपक्ष, विशेषकर भाजपा, विधानसभा के मानसून सत्र में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाए और सरकार को घेरने की कोशिश करे. हालांकि, अभी तक आंदोलन का स्वरूप मुख्य रूप से छात्रों की मांगों तक सीमित है और इसमें किसी बड़े राजनीतिक एंगल की स्पष्ट झलक नहीं दिखी है.सरकार को इस स्थिति में क्या कदम उठाने चाहिए?सरकार को चाहिए कि वह समय रहते छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करे और छात्र प्रतिनिधियों से बातचीत करे. संवाद के माध्यम से कोई बीच का रास्ता निकालना सबसे बेहतर विकल्प होगा. यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन के उग्र होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, जैसा कि जंतर-मंतर पर देखने को मिला.क्या छात्रों की मांगों को आप उचित मानते हैं?बिल्कुल, किसी भी परीक्षा की सबसे बड़ी कसौटी उसकी पारदर्शिता और निष्पक्षता होती है. यदि बड़ी संख्या में अभ्यर्थी परीक्षा प्रक्रिया या परिणाम पर सवाल उठा रहे हैं, तो सरकार और संबंधित आयोग की जिम्मेदारी है कि वे उनकी शंकाओं का पारदर्शी तरीके से समाधान करें और उनका विश्वास बहाल करें.यदि सरकार समय रहते समाधान नहीं निकालती है, तो इसका क्या असर हो सकता है?यदि यह मुद्दा लंबा खिंचता है, तो आंदोलन और व्यापक हो सकता है, जिसका असर विधानसभा के मानसून सत्र की कार्यवाही पर भी पड़ सकता है. इसलिए सरकार को सत्र शुरू होने से पहले ही समाधान निकालने की दिशा में सकारात्मक पहल करनी चाहिए, ताकि विधानसभा में राज्य के विकास और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा हो सके.ये भी पढ़ें : 2024 का कानून...2026 में संशोधन, पेपर लीक पर क्या है सरकार का नया एक्शन प्लान