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बिगड़ती आबोहवा की करें चिंता

आज वायु का प्रदूषण दुनिया में एक नये पैमाने के साथ मापा जाना चाहिए और इसको सीधे जीवनशैली से जोड़ कर देखा जाना चाहिए. जीवन ही नहीं होगा, तो हम किस शैली को लेकर आगे बढ़ें, ये सोचने का समय भी नहीं बचेगा?

By अनिल प्रकाश जोशी
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बिगड़ती आबोहवा की करें चिंता
बिगड़ती आबोहवा की करें चिंता
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पद्मश्री डॉ अनिल प्रकाश जोशी, प्रतिष्ठित पर्यावरण कार्यकर्ता

dranilpjoshi@gmail.com

हम किसी भी रूप में विकास के नाम का डंका पीटना चाहते हों, लेकिन यह कैसे भूल जाएं कि वायु गुणवत्ता की हमारे सामने गंभीर चिंता है. एक हालिया रिपोर्ट हमें आइना दिखा रही है. विकास की प्रतिबधता में हम कुछ हद तक खरे उतरे, लेकिन हम भूल गये कि उन सबको भोगने के लिए जीवन चाहिए और जीवन के लिए प्राण वायु. प्राण के लिए पृथ्वी को बचाना होगा. अब यही वायु यदि प्राण लेने लग जाए, तो हमारे तमाम तरह के उपक्रमों और रणनीतियों पर बड़ा अंकुश तो लग ही जायेगा. जिस तरह से यह रपट बता रही है कि हम कितने भी बढ़ते-चढ़ते देश हों, पर यहां पर हमने बहुत बड़ी मात खा ली है.

दुनिया के करीब 50 शहरों को सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण के रूप में गंभीर माना गया है. अगर 35 शहर भारत के हों, तो वह बेहद चिंताजनक है. ऐसा न हो कि इसको गंभीरता से न लेते हुए हम अपने ही जीवन को संकट में डाल लें, वो जीवन जिसके लिए देश 75 सालों से विकासशील या विकसित देश बनने के लिए लालायित है. साल 2021 की यह रपट जो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कई मानकों पर तय की है. अपने देश के 35 शहर इसके बड़े घेरे में आ चुके हैं. स्विस संगठन आईक्यू इयर की हालिया रिपोर्ट पीएम-2.5 वाले वायुप्रदूषण को लेकर है, जिसमें यह माना गया है कि अकेले दिल्ली में 2021 में पीएम-2.5 के स्तर में 14.6 फीसदी की बढ़ोतरी हो गयी है.

पिछले तमाम दशकों से जो वायु प्रदूषण को लेकर शोर-शराबा हुआ है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार डांट-फट कार लगायी, पर हम संभले नहीं. इसमें 2020 के 84 माइक्रोग्राम प्रतिघन के मुकाबले 2021 में यही पीएम-2.5 का कण 96 माइक्रोग्राम प्रतिघन मीटर हो गया. जो दिल्ली देश को दिशा देती हो, राजनीतिक हो, आर्थिक हो या सामाजिक हो, अगर यह नहीं संभली हो, तो बाकी हिस्सों का क्या होगा? उदाहरण के लिए, दिल्ली को देश का दिल मानते हुए भविष्य की बहुत -सी रणनीतियां बनती हों और अगर उसके ये हालात हैं, तो फिर बाकी शहरों की क्या स्थिति होगी, यह समझ में आ जाना चाहिए.

दुनिया मे 50 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में 35 हमारे हिस्से के हैं. दिल्ली को तो इस रूप में भी माना जा सकता है कि यहां बड़ा जमावड़ा हमेशा रहता है. राजधानी होने के नाते क्या उद्योगपति, क्या राजनीतिक और क्या अन्य व्यवसायों से जुड़े हुए लोग, इस शहर में भीड़ बढ़ा कर रखते हैं, आवाजाही हमेशा और शहरों की तुलना में अधिक रहती है, तो ये समझा भी जा सकता है कि दिल्ली के बिगड़ने ये कारण हो सकते हैं, पर देश के अन्य शहरों में भी ऐसे ही हालात बढ़ते जा रहे हैं. हम ग्लासगो में जाकर कुछ भी हल्ला कर लें, दिल्ली में बैठ कर अपने आने वाले समय के विकास के रास्तों को मजबूत कर रहे हों, लेकिन अब इस तरह के आंकड़े एक भयानक भविष्य की ओर इशारा करते हैं.

अपने देश में देखिए, 48 फीसदी भारतीय शहरों में वायु गुणवत्ता का स्तर 50 ग्राम प्रतिघन मीटर से उपर रहा है, जो कि डब्लूएचओ के मानक पांच ग्राम प्रति घन मीटर से 10 गुना अधिक है. अब अगर ये हालात हैं, तो ये मान कर चलें कि अब दिन दूर नहीं कि हम अपने शहरों को गैस चैंबरों में परिवर्तित कर देंगें. यह हाल मात्र अभी 35 शहरों का दर्शाया गया है, लेकिन आने वाले समय में देश के सारे शहरों के यही हाल होंगे.

इसका बड़ा साफ खुला कारण भी है, हमारे ही देश में सड़कों पर उतरती गाड़ियों की संख्या पूरी तरह से अनियंत्रित है और शहर के लोग अपने तबकों के अनुसार कई तरह की गाड़ियों के शौक को भी पूरा करते हैं और यही नहीं, जिस तरीके से बाजारी सभ्यता गांव तक पहुंचा दी है, अब गांव में भी कार, मोटरसाइकिलों का जमावड़ा शुरू हो गया है. हमने आवाजाही और ट्रांसपोर्ट को इस हद तक पहुंचा दिया है, जो हमारे लिए कार्बन उत्सर्जन का और अंततः वायु प्रदूषण का बड़ा कारण बना है. देश बढ़ता चला जा रहा है और देश की आगामी योजनाओं में सबसे ज्यादा ढांचागत विकास को महत्व दिया जा रहा है. ये भी अपने आप में बहुत बड़ा कारण भी बनेगा.

हमारी पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल असर डालेगा. इसके अलावा उद्योगों की बाढ़ और वहीं दूसरी तरफ जरूरी वनों का घटता घनत्व और साथ में मरती नदियां और पानी के स्रोत, ये सब अब हमारा धीरे-धीरे साथ छोड़ रहे हैं. साफ बात है कि इनका भी प्रतिकूल असर इन सब पर पड़ रहा है, जिसका न तो हमारे पास कोई अध्ययन है और ना ही कोई आंकड़ा हमारे सामने है. समुद्र, जो कार्बन सिंकिंग का बहुत बड़ा स्रोत है, वह भी आज डार्क जोन में परिवर्तित होता जा रहा है. कचरे से भरा समुद्र आज हमारे कार्बन को लेकर के शायद हमारी बहुत बड़ी सहायता नहीं कर पायेगा. एक बड़ा गंभीर विषय है.

अब यह बहुत बड़ी बहस की आवश्यकता हो चुका है कि हमारी जीवनशैली को नियंत्रण करने के लिए भी नियम बनें. नियम और नियंत्रण ही वे होंगे, जो हमारे अपने जीवन को बचाने के होंगे. हम किसी भी तरह के प्रतिबंध से परहेज न करें, क्योंकि उन्हें हम अपने जीवनशैली का विरोधी अवश्य मानेंगे, लेकिन यही शायद हमारे जीवन को बचा पायेगा. आज वायु का प्रदूषण दुनिया में एक नये पैमाने के साथ मापा जाना चाहिए और इसको सीधे जीवनशैली से जोड़कर देखा जाना चाहिए. जीवन ही नहीं होगा, तो हम किस शैली को लेकर आगे बढ़ें, ये सोचने का समय भी नहीं बचेगा?

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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