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क्या है हमारी पहचान

By मोहन गुरुस्वामी
Updated Date

मोहन गुरुस्वामी, वरिष्ठ स्तंभकार

Mohanguru@gmail.com

शरीर रचना की दृष्टि से आधुनिक मानव का इतिहास 1,20,000 वर्ष पुराना है. वास्तव में भाषा का अध्ययन ही मानव जाति के विकास का अध्ययन है. भाषाविदों के मुताबिक भाषा सुने या बोले गये शब्दों से अधिक हावभाव और संकेतकों के माध्यम से एक संवाद है. हवै विश्वविद्यालय के डॉ डेरेक बिकर्टन के अनुसार, भाषा का सार, शब्द और वाक्य विन्यास है, जो मस्तिष्क में एक संयोजन प्रणाली द्वारा उत्पन्न होता है. हाल के वर्षों में भारतीय राष्ट्र की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिक तौर पर व्युत्पन्न सिद्धांतों को खारिज करने का चलन बढ़ा है. इसकी वजह नया अति राष्ट्रवाद है. सच है कि हम प्राचीन लोग हैं और हमारे राष्ट्रत्व का वृहद भौगोलिक विस्तार था, लेकिन, हमारी सभ्यता तमाम सभ्यताओं और हमारी राष्ट्रीयता तमाम जातियों से संगलित रही है.

भारत में इस्लाम का आगमन ही स्पष्ट तौर पर दिखता है. इससे पहले से भी लोग पलायन कर यहां पहुंचते रहे हैं, जैसे- राजपूत वंश, सिसोदिया सिथियन मूल से जुड़ा है और इतिहासकारों ने उनका नाम ससानियन से लिया है. उसी तरह जाट गताई से, अहीर अवार से, गुजर खाजार से और ठाकुर टुखारियन से लिया गया है. इसमें कुछ ने राजवंशों की शुरुआत की और ब्राह्मण पुरोहितवाद द्वारा उन्हें आसानी से वंशावली दी गयी. सिंधु घाटी सभ्यता में 1500 से अधिक अवस्थापन शामिल थे. उत्तरी यूरोप से भी बड़े आकार में उसका भूभाग वर्तमान पाकिस्तान और पश्चिमी भारत तक फैला था. मोहनजोदड़ो ही नहीं, हड़प्पा, कोट दिजियान और धौलावीरा की खुदाई से स्पष्ट है कि यह द्रविड़ उपनिवेश था, जो 1600 ई पू तक मौजूद रहा.

पुरातत्वविदों का निष्कर्ष है कि इस युग में हड़प्पा सैन्य अभाव के बावजूद एक वृहद और आर्थिक व राजनीतिक केंद्र के रूप में शक्तिशाली क्षेत्र था ( साइंटिफिक अमेरिकन, जुलाई 2003 देखें). पुरातत्वविदों का मानना है कि सभ्यता का अवसान सिंधु घाटी की प्रमुख नदी घग्गर-हाकरा नदी (सरस्वती) के जलमार्ग परिवर्तन के साथ ही शुरू हुआ. इसी वजह से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था नष्ट हो गयी. इससे घनी आबादी वाले शहरों मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में विकराल समस्याएं पैदा हो गयीं. करीब 1500 ई पू में आर्यों के आगमन के समय इन शहरों का पतन शुरू हो चुका था.

इस क्षेत्र में 1000 ई पू तक नयी और विशेष विचारधारा तथा भाषा का फैलाव शुरू हुआ. अब वैदिककाल आ चुका था. आर्य और द्रविड़ दोनों ही प्रवासी जातियां थीं, जो अपने पशु के लिए चारागाह और कृषि के लिए उपजाऊ जमीन की तलाश में पूर्व की ओर निकलीं. इन मुद्दों पर अति राष्ट्रवादी और रुढ़िवादी हिंदू मान्यताओं के साथ मतभेद है. वे हमारे राष्ट्र पर एक नया वंश क्रम थोप रहे हैं. अभी कहा जा रहा है कि आज के भारतीय यहां के मूलनिवासी हैं.

भारत में मूलनिवासी केवल आदिवासी हैं, जिन्हें निहार रंजन राय ने भारत का मूलस्थानिक कहा. शेष सभी द्रविड़ या आर्य, हिंदू या मुस्लिम, राजपूत या जाट, प्रवासी हैं, यूरोपीय प्रवासियों की तरह, जो अमेरिका में बसे हैं. अमेरिका में उपनिवेश बनानेवाले लोग नयी पहचान बनाने में कामयाब रहे. इसी तरह यूरोपीय यहूदी आधुनिक इस्राइल बनाने में कामयाब रहे, दुनिया उन्हें उसी रूप में स्वीकार करती है. हम कौन हैं? इसे खोजने के वैज्ञानिक तरीके हैं.

आधुनिक अनुवांशिकी विज्ञान से विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की जानकारी एकत्र करना संभव है. भारत में अध्ययन से स्पष्ट है कि निहार रंजन राय का कहना सही था कि मध्य भारत के आदिवासी ही इस देश के मूलनिवासी हैं. उताह विश्वविद्यालय के अनुवांशिकी वैज्ञानिक डॉ माइकल बैम्शड ने जून, 2001 के जिनोम रिसर्च में दावा किया कि भारत के आधुनिक उच्च जातियों के पूर्वज अनुवांशिक तौर यूरोपियों से काफी समान हैं. निचली जातियों की आबादी एशियाई लोगों के समान है.

अनुवांशिकी तौर पर विचलन के बावजूद, आर्य और द्रविड़ एक-दूसरे से बहुत दूर नहीं हैं. भाषाविद लंबे समय से सहमत रहे हैं कि इंगलिश, डच, जर्मन, रसियन विशाल इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की शाखाएं हैं. इसमें शामिल जर्मेनिक, सेल्टिक, बाल्टिक, इंडो-ईरानी और अन्य भाषाएं, ग्रीक, लैटिन और संस्कृत जैसी प्राचीन भाषाओं से निकली हैं. वायने स्टेट यूनिवर्सिटी के डॉ एलेक्सिस मनैस्टर रेमर ने प्रोटो-इंडो-यूरोपियन (पीआइइ) और दो अन्य भाषा समूहों के बीच समरूपता प्राप्त की है.

दो भाषाएं- यूरेलिक, जिसमें फिन्निश, इस्टोनियन और हंगरियन तथा अल्टैइक, जिसमें तुर्किश और मंगोलियन शामिल हैं. रेमर ने इन तीनों समूह से निष्कर्ष निकाला कि इनकी जड़ें पुरातन भाषा नॉस्ट्रैटिक से जुड़ी हैं. अगर वे सही हैं, तो सभी भारतीय भाषाएं, संस्कृत या द्रविड़ियन 12000 वर्ष पहले की नॉस्ट्रैटिक से निकली हैं? पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में आज भी द्रविड़ियन भाषा ‘ब्राहुइ’ को पांच लाख से अधिक लोग बोलते हैं.

इससे स्पष्ट है कि आर्यों के दबाव में द्रविड़ लोगों ने पूर्व और दक्षिण का रुख कर लिया होगा. जो कुछ भी इसकी उत्पत्ति है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आर्यों और द्रविड़ों के संलयन से निकलनेवाली संस्कृत भाषा हल्की चमड़ी वाले अभिजात्य वर्ग की भाषा थी. इसे फारसी द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, जो अभिजात्य वर्ग की ही एक अन्य इंडो-यूरोपीय भाषा थी. उत्तर भारत में, कुलीन वर्ग की इन भाषाओं ने क्षेत्रीय बोलियों को मिला कर हिंदवी यानी उर्दू भाषा का निर्माण किया.(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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