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बिहार में सभी दलों की प्रतिष्ठा दांव पर

By के सी त्यागी
Updated Date

केसी त्यागी, प्रधान महासचिव, जद(यू)

kctyagimprs@gmail.com

मुख्य चुनाव आयुक्त की घोषणा के बाद यह तय है कि नवंबर माह में बिहार चुनाव होंगे और सुप्रीम कोर्ट ने दायर याचिका को खारिज करते हुए चुनावी प्रक्रिया को जारी रखने का समर्थन किया है. मुख्य मुकाबला एनडीए और गठबंधन के बीच होगा. प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा कई अवसरों पर घोषणा कर चुके हैं कि एनडीए का नेतृत्व नीतीश कुमार करेंगे. गठबंधन में अभी सहमति बनना बाकी है, लेकिन मोटे तौर पर तेजस्वी यादव उनके संभावित उम्मीदवार होंगे. कोरोना संक्रमण काल में हो रहे चुनाव में सभी तैयारियों में कटौती होगी.

बिहार चुनाव आयोग का सुझाव भी केंद्रीय चुनाव आयोग ने स्वीकार कर लिया है कि पांच के बजाय यह चुनाव एक या दो चरणों में संपन्न कराया जाये. दिशा-निर्देशों के अनुसार, नामांकन ऑनलाइन होंगे. डाक मतपत्रों की सुविधा अब दिव्यांगों, 80 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों और जरूरी सेवाओं से जुड़े मतदाताओं के लिए भी होगी. कोरोना पॉजिटिव और कोरोना संदिग्धों को भी डाक द्वारा मतदान की सुविधा होगी.

मतदाताओं के लिए सैनिटाइजर, मास्क और दस्तानों का इंतजाम चुनाव आयोग करेगा. चुनाव अधिकारियों के लिए पीपीइ किट का प्रावधान है. घर-घर जनसंपर्क में पांच लोगों के लिए ही अनुमति होगी. मानकों को पूरा करने पर रैली या रोड शो जैसे आयोजनों की अनुमति होगी. जनसभाओं में कितने लोग आयेंगे, इसकी भी संख्या पूर्व में तय होगी. मतदाता का तापमान अधिक पाया गया, तो उसे अंत में मतदान के लिए बुलाया जायेगा. वोटों की गिनती के दिन एक हॉल में अधिकतम सात टेबल लग सकेंगे.

सुशील मोदी का वक्तव्य महत्वपूर्ण है कि बिहार में अपने बलबूते कोई दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा सत्तारूढ़ है, लेकिन विगत दिनों विधानसभा चुनाव के परिणाम अपे क्षा के अनुरूप नहीं रहे. अगले वर्ष पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु समेत कई राज्यों में पार्टी की परीक्षा होनी है, लिहाजा बिहार चुनाव में गठबंधन के जीतने पर भाजपा को आनेवाले समय में मनोवैज्ञानिक लाभ भी होगा.

पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओडिशा, झारखंड, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं थे. हालांकि, कांग्रेस की अकर्मण्यता और आंतरिक विवाद के कारण कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार बनाने में सफल रही. जनता दल (यू) गठबंधन का महत्वपूर्ण अंग है और नेतृत्व का भार भी उसी के कंधों पर है. चुनाव का नारा है कि पिछले 15 साल बनाम हमारे 15 साल.

यह जीत पार्टी नेतृत्व के बढ़े कद में और इजाफा करेगी और देशभर में पार्टी के फैलाव में भी मददगार होगी. यह चुनाव आरजेडी और तेजस्वी यादव दोनों के राजनैतिक अस्तित्व के लिए है. पराजय के साथ ही पारिवारिक कलह में इजाफा होगा. पार्टी में असंतोष उग्र हो सकता है. आधा दर्जन से अधिक विधायक बगावत कर जेडी(यू) में शामिल हो चुके हैं. पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भी एनडीए को ही भविष्य का सत्तारूढ़ दल स्वीकार कर चुके हैं.

बिहार को 2005 में दो बार चुनाव का सामना करना पड़ा. फरवरी के चुनाव में किसी को बहुमत नहीं था. दिल्ली में यूपीए की सरकार थी, जो किसी भी कीमत पर एनडीए को सत्तारूढ़ होने से रोके हुए थी. एलजेपी की फूट और निर्दलियों के समर्थन से एनडीए ने बहुमत प्राप्त कर लिया. दिल्ली में 150 से अधिक विधायकों ने आडवाणी और नीतीश के नेतृत्व में राष्ट्रपति के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी, लेकिन राज्यपाल बूटा सिंह द्वारा विधानसभा भंग किये जाने से सारे समीकरण बदल गये. सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि नीतीश कुमार को एक अवसर देना चाहिए था.

कुछ सख्त टिप्पणी राज्यपाल के विरुद्ध भी की गयी, जिससे उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. समाचारपत्रों की तल्ख टिप्पणियों से क्षुब्ध होकर राष्ट्रपति अब्दुल कलाम भी त्यागपत्र का मन बना चुके थे, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं राष्ट्रपति भवन जाकर कलाम साहब को देर तक आग्रह कर बमुश्किल त्यागपत्र देने से रोक पाये. नवंबर में मध्यावधि चुनाव की तिथि घोषित हो चुकी थी, लेकिन एनडीए के नेता की घोषणा नहीं हो पायी. मतदान में प्रतीत हुआ कि चुनाव निर्णायक दौर में प्रवेश नहीं कर पा रहा है. जद(यू) और भाजपा के नेताओं में सामंजस्य की भी कमी थी.

इसी बीच आडवाणी द्वारा की गयी घोषणा ने राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया. रांची में उन्होंने नीतीश कुमार को अग्रिम मुख्यमंत्री के रूप में चिह्नित किया. इस चुनाव में जद(यू) 88, भाजपा 55 और आरजेडी 54 सीटों पर विजयी रही. आगामी पांच वर्षों में गठबंधन की सरकार ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को देश का सबसे सफल मुख्यमंत्री साबित किया. चुनाव का बिगुल बज चुका है. गृहमंत्री अमित शाह द्वारा संबोधित वर्चुअल रैली ने इसकी शुरुआत की है. जनता दल (यू) द्वारा आयोजित 7 सितंबर की रैली में नीतीश कुमार भी पार्टी और गठबंधन का एजेंडा घोषित कर चुके हैं. यद्यपि अन्य चुनावों की तरह इस बार धूमधाम, ढोल-ढपली, जनसभाओं आदि की अनुपस्थिति अवश्य खलेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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