ePaper

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

Updated at : 01 Dec 2022 8:07 AM (IST)
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

हमारे देश में विचाराधीन कैदियों की संख्या 4.27 लाख से अधिक हो चुकी है.

विज्ञापन

कुछ दिन पहले संविधान दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बिना जमानत और सुनवाई के लंबे समय से जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का भावनात्मक निवेदन किया था. उस गोष्ठी में प्रधान न्यायाधीश समेत सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश तथा केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू भी उपस्थित थे. राष्ट्रपति की अपील को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने देशभर के राज्य सरकारों और जेल अधिकारियों को ऐसे तमाम कैदियों के बारे में 15 दिन के भीतर जानकारी देने का निर्देश दिया है.

सभी आंकड़े राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकार को सौंपे जायेंगे. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति ने अपने अंग्रेजी भाषण से इतर हिंदी में बोलते हुए गरीब कैदियों और उनके परिजनों के कष्ट को रेखांकित किया था तथा उनके लिए कुछ करने का आह्वान किया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जुलाई में एक संबोधन में अभियुक्तों को अनावश्यक रूप से जेलों में बंद रखने पर चिंता जतायी थी. पिछले साल के आंकड़ों के आधार पर कुछ माह पहले राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, हमारे देश में विचाराधीन कैदियों की संख्या 4.27 लाख से अधिक हो चुकी है.

देश की सभी जेलों में बंद कुल कैदियों में 77 प्रतिशत विचाराधीन हैं. राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में यह भी कहा था कि जेलों में क्षमता से कहीं अधिक कैदी हैं तथा नये जेल बनाना विकास की निशानी नहीं है. देश में 5.54 लाख कैदी हैं, जबकि जेलों की अधिकतम क्षमता 4.26 लाख लोगों के लिए ही है. विचाराधीन कैदी वे होते हैं, जो आपराधिक मामलों में आरोपित होते हैं तथा अदालतों में उनकी सुनवाई हो रही होती है.

सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के अनेक निर्णयों एवं निर्देशों में कहा जा चुका है कि जमानत देने में अदालतों का रवैया नरम होना चाहिए. हाल ही में पूर्व और वर्तमान प्रधान न्यायाधीश भी ऐसी राय व्यक्त कर चुके हैं. लेकिन ऐसा देखा जाता है कि मामूली अपराधों में भी अदालतें जमानत देने में संकोच करती हैं. राष्ट्रपति मुर्मू की यह बात भी महत्वपूर्ण है कि कई बार पुलिस द्वारा अभियुक्त के विरुद्ध बहुत सारी ऐसी धाराएं भी लगा दी जाती हैं, जो अपराध उस व्यक्ति ने किया भी नहीं होता.

अनेक रिपोर्ट यह जाहिर कर चुके हैं कि कैदियों में बड़ी संख्या अनपढ़, मामूली रूप से शिक्षित और वंचित लोगों की है. इनके परिजन अदालतों का खर्च वहन नहीं कर पाते. कई बार जमानत की साधारण शर्तें नहीं पूरी कर पाने की स्थिति में भी कैदियों को जेल में ही रहना पड़ता है. आशा है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद स्थिति में जल्द सुधार होगा.

विज्ञापन
संपादकीय

लेखक के बारे में

By संपादकीय

संपादकीय is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola