1. home Hindi News
  2. opinion
  3. right to abandon supreme court women condition editorial news column opinion latest updates prt

परित्यक्ता का अधिकार

By संपादकीय
Updated Date

परिवार और बच्चों के साथ घर की जिम्मेदारी का बोझ ढोनेवाली महिलाएं किस तरह कार्यबल का हिस्सा बनने से वंचित रह जाती हैं. अक्सर यह विषय आम चर्चा से दूर ही रहता है. पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों की देखभाल के लिए अपने करियर को दांव पर लगानेवाली कामकाजी महिलाओं के हालातों का भी संज्ञान लिया है. जस्टिस इंदु मल्होत्रा और आरएस रेड्डी की खंडपीठ ने कहा है कि परित्यक्ता पत्नी के गुजारा-भत्ते को निर्धारित करते समय जरूरी तौर पर उसके करियर की कुर्बानी को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, ताकि वह वैवाहिक घर जैसा ही जीवन जी सके.

आमतौर पर परित्यक्ता पत्नी के लिए निर्वाह भत्ते को तय करते समय अदालतें केवल पति की आमदनी और संपत्तियों पर ही विचार करती हैं. आधुनिक समाज में कामकाजी महिलाओं के सामने अनेक तरह की चुनौतियां हैं. संबंधों में बिखराव के बाद जीवनयापन के लिए दोबारा नौकरी हासिल कर पाना आसान नहीं होता.

मांग के अनुरूप नये कौशल को प्राप्त करने लिए उन्हें दोबारा प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, जो उम्र के इस पड़ाव पर आसान नहीं है. यही वजह है कि वर्षों के अंतराल के बाद उम्रदराज महिलाएं बामुश्किल ही कार्यबल का दोबारा हिस्सा बन पाती हैं. आम सामाजिक धारणा भी है कि जिस महिला का पति नौकरी करता है, उसे नौकरी के लिए बाहर निकलने की जरूरत नहीं है.

एक अन्य चिंता महिलाओं के साथ बढ़ते अपराधों की भी है. इन्हीं वजहों से कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी सीमित है. सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना स्वागतयोग्य है कि परित्यक्ता पत्नी के साथ रहनेवाले बच्चों की पढ़ाई के खर्च का भी कुटुंब अदालतों द्वारा संज्ञान लेना जरूरी है. आमतौर पर बच्चों की पढ़ाई का खर्च पिता द्वारा ही वहन किया जाता है.

न्यायालय ने यह भी कहा है कि अगर पत्नी की पर्याप्त आमदनी है, तो बच्चों की पढ़ाई का खर्च दोनों पक्षों में अनुपातिक तौर पर साझा होना चाहिए. यद्यपि हिंदू विवाह अधिनियम और महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम गुजारा-भत्ता प्रदान करने की तारीख को तय नहीं करता है, यह पूरी तरह से कुटुंब अदालतों पर निर्भर होता है.

इसके लिए न्यायालय का निर्देश है कि परित्यक्ता द्वारा अदालत में याचिका दाखिल करने की तिथि से गुजारा-भत्ता दिया जाना चाहिए. इसका भुगतान नहीं करने पर पति की गिरफ्तारी और संपत्तियों को जब्त भी किया जा सकता है. हालांकि, निर्वाह भत्ते की आस में तमाम याचिकाएं अदालतों में वर्षों से लंबित हैं.

किसी भी नियम-कानून का जब तक समुचित अनुपालन सुनिश्चित नहीं किया जायेगा, तब तक वह मात्र कागज का पुलिंदा ही रहेगा. इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश बहुत ही मुनासिब है. समयबद्ध निर्वाह भत्ते का भुगतान कई असहायों का जीवन दोबारा पटरी पर लौटा सकता है.

Posted by: pritish sahay

Share Via :
Published Date
Comments (0)
metype

संबंधित खबरें

अन्य खबरें