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विकसित भारत के लिए रोडमैप पर चिंतन जरूरी, पढ़ें विराग गुप्ता का लेख

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विकसित भारत के लिए रोडमैप पर चिंतन जरूरी, फोटो- एआई

भारतीय गणतंत्र की गौरवशाली सफलता के 75 वर्ष पूरे होने के बाद अब साल-2047 में विकसित भारत को सफल बनाने के रोडमैप पर चिंतन होना चाहिए.

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Developed India: भारत के पड़ोसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और अफगास्तिान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकारों का पतन हो रहा है. ऐसे वैश्विक माहौल में भारतीय गणतंत्र की गौरवशाली सफलता के 75 वर्ष पूरे होने के बाद अब साल-2047 में विकसित भारत को सफल बनाने के रोडमैप पर चिंतन भी होना चाहिए. संविधान की प्रस्तावना में आम जनता के लिए स्वतंत्रता, समानता और न्याय का सपना पूर्णतौर पर साकार हो जाए, तो कल्याणकारी राज्य के साथ विकसित भारत का लक्ष्य भी पूरा हो जायेगा. आजादी के बाद हमारे गणतंत्र को विभाजन और उपनिवेशवाद की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था. आज भी गणतंत्र के सभी स्तंभ नयी तरह की परीक्षाओं का सामना कर रहे हैं.

संसद : संसद और विधानसभाओं में हंगामे की वजह से जनता से जुड़े मुद्दों और कानून निर्माण पर सही और स्वस्थ बहस नहीं हो रही है. एक तिहाई से ज्यादा जनप्रतिनिधि यानी विधायक और सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं. विधायक और सांसद निधि में अनियमिताओं और भ्रष्टाचार से लोगों का नेताओं के प्रति भरोसा और कमजोर हो रहा है. तमिलनाडु और कर्नाटक में विधानसभा सत्र के दौरान राज्यपालों के अभिभाषण पर विवाद से संघीय व्यवस्था के साथ विधायिका की छवि धूमिल हुई है. दिल्ली विधानसभा और पंजाब सरकार के बीच चल रहा विवाद और भी दुखद है. पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन की चर्चा से साफ है कि विधायिका की घटती साख से संविधान का सबसे मजबूत स्तंभ कमजोर हो रहा है.

सरकार : कार्यपालिका के सामने कई मोर्चों पर चुनौती है. संसद ने श्रम सुधारों और डाटा सुरक्षा पर कई साल पहले जो कानून पारित किये, वे अभी तक लागू नहीं हुए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेवड़ियों पर ज्यादा जोर देने की बजाय एक तिहाई पैसा विकास कार्यों में खर्च होना चाहिए, पर सरकारी खजाने की अधिकांश धनराशि वेतन, पेंशन, सब्सिडी और ब्याज के भुगतान में चली जाती है. रेवड़ियों के वितरण से समाज और अर्थव्यवस्था में असमानता और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है. संविधान लागू होने के कई साल बाद तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार का चलन था. उसके बाद मजबूत विपक्ष के आगमन से लोकतंत्र में मजबूती आयी, लेकिन अब संघीय प्रणाली में असहिष्णुता बढ़ रही है. देश में घुसपैठ रोकना और विदेशियों की छानबीन करना जरूरी है, लेकिन विकास कार्यों को तेजी से बढ़ाने की बजाय सरकारों का अधिकांश समय वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने जैसे अनुत्पादक कामों में लगना चिंताजनक है.

नौकरशाही : विकास कार्यों में कमी और भ्रष्टाचार की वजह से बढ़ रहे हादसों के लिए नेताओं के साथ नौकरशाही की भी जवाबदेही तय करने की जरूरत है. स्वच्छतम शहर इंदौर में दूषित पानी से 25 से ज्यादा लोगों की मौत, पर्यटन के सबसे बड़े केंद्र गोवा में नये साल के उत्सव के दौरान अग्निकांड से 25 लोगों की मौत, राजधानी दिल्ली के निकट नोएडा में गड्ढे में डूबने से सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत चिंताजनक हैं. संविधान के अनुसार सरकारों की जिम्मेदारी लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान सुनिश्चित करने की है. दुनिया के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में 13 भारत के हैं. दूषित जल और प्रदूषण की वजह से करोड़ों लोगों के जीवन के अधिकार का हनन होना गणतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है.

न्यायपालिका : अनुच्छेद-21 के अनुसार जल्द और सही न्याय मिलना सभी का मौलिक अधिकार है, पर पिछले सात वर्षों में मुकदमों का बोझ दोगुना बढ़ गया है. कोरोना के बाद अदालती कार्रवाई का सीधा प्रसारण, ऑनलाइन सुनवाई और गवाही का प्रचलन बढ़ गया है. अदालतों की कार्रवाई देखने के बाद अब जजों से आम जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ गयी हैं. अदालती कार्रवाई का सीधा प्रसारण यू-ट्यूब जैसे विदेशी प्लेटफार्म के माध्यम से होता है, जहां पर न्यायिक व्यवस्था के संवेदनशील डाटा का व्यवसायिक इस्तेमाल हो सकता है. ऑनलाइन सुनवाई के लिए इस्तेमाल हो रहे जूम जैसे प्लेटफार्म राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं. सही नियमन और सुरक्षा सुनिश्चित किये बगैर तकनीक और एआइ के अराजक इस्तेमाल से न्यायिक व्यवस्था में हस्तक्षेप बढ़ सकता है, जिसे ठीक करने की जरूरत है.

मीडिया : लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया का स्वरूप बदल रहा है. प्रिंट और टीवी के बाद डिजिटल मीडिया की वजह से जागरूकता बढ़ने के साथ फेक न्यूज और हेट स्पीच का प्रसार बढ़ता जा रहा है. एआइ के बढ़ते दौर में युवाओं को सही शिक्षा, ज्ञान और ट्रेनिंग नहीं मिली, तो बेरोजगारी के साथ पिछड़ापन बढ़ सकता है. विदेशी कंपनियों के बढ़ते वर्चस्व से डिजिटल उपनिवेशवाद के नये खतरे मंडरा रहे हैं. विकसित भारत के लिए युवाओं के जनसांख्यिकी लाभ के सकारात्मक इस्तेमाल की जरूरत है. गणतंत्र की बाधाओं और चुनौतियों को दुरुस्त करके हम देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रख सकते हैं. जेन-जी को सही दिशा मिलने से समाज की दशा बदलने के साथ संविधान और गणतंत्र के शिल्पकारों का सपना साकार होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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विराग गुप्ता

लेखक के बारे में

By विराग गुप्ता

लेखक और वकील

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