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सभी को दुराग्रहों से मुक्त होना होगा

By प्रो श्री प्रकाश सिंह
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Mohan Bhagwat
Mohan Bhagwat
Prabhat Khabar

सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्पष्ट रेखांकित किया है कि हिंदुत्व किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं करता है. उनके वक्तव्य में समाज को जोड़ने की एक सकारात्मक भावना है. समाज में जो बिखराव है तथा एक-दूसरे के प्रति उपेक्षा का भाव है, वह समाप्त होना चाहिए, उनके उद्बोधन का आशय यह है. इस सकारात्मक बात को सकारात्मकता से लिया जाना चाहिए.

यह समझा जाना चाहिए कि हिंदू-मुस्लिम संबंधों की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है और जो इतिहास में घटित हुआ है, उन घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, उस दृष्टि से दिया गया यह विचार है. हिंसा किसी भी समाज के लिए श्रेयस्कर नहीं है. जो घटनाएं होती हैं, चाहे वे धर्म परिवर्तन के रूप में हों, चाहे सांप्रदायिक दंगों के रूप में हों, वे समाज की चिंता को बढ़ानेवाली हैं. किसी भी समाज में अगर हिंसा होती रहे, एक-दूसरे के प्रति दुर्भावना रहे, एक-दूसरे से विवाद रहे, तो फिर समाज का विकास नहीं हो सकता है. राष्ट्र प्रथम का जो सिद्धांत है कि हर मामले में भारत को सबसे पहले रखा जाए, उस दृष्टिकोण को सामने रखते हुए मोहन भागवत ने ये बातें कही हैं.

जिस किसी आयोजन में भागवत होते हैं, समकालीन प्रश्नों का उठना स्वाभाविक होता है. यह कार्यक्रम एक मुस्लिम विचारक द्वारा लिखी पुस्तक पर हो रहा था, तो उस दृष्टि से उन्होंने ये सारी बातें कही हैं. कोरोना महामारी के इस काल में सेवा भारती के द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर जिस स्तर पर प्रयास किये गये, उनमें कहीं भी भेदभाव नहीं है. सेवा भारती के कार्यकर्ताओं ने यह नहीं देखा कि कौन किस जाति या धर्म का है. उन्होंने उन सबकी सेवा की, जो उनके सामने आये. सभी लोग इस महामारी को सामूहिक रूप से मिलकर खत्म करने की अगर नहीं सोचेंगे, तो इससे छुटकारा नहीं मिलेगा. एक वर्ग टीकाकरण करा ले और दूसरा वर्ग टीका न ले, तो बीमारी तो बची रहेगी. ऐसी स्थिति में उनके वक्तव्य को सकारात्मक रूप से ग्रहण किया जाना चाहिए और सरकार एवं समाज को एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए.

एक श्रेणी ऐसी है, जो राजनीति के लिए दुर्भावना पैदा करने में सक्रिय रहती है क्योंकि उसकी राजनीति अलगाववाद पर आधारित होती है. इस श्रेणी के लोग या संगठन एक-दूसरे के विरुद्ध हिंसा भड़का कर अपने राजनीतिक स्वार्थों की सिद्धि करते हैं. ध्रुवीकरण की राजनीति के संदर्भ में संघ प्रमुख का यह बयान बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है. बहुत से लोग ऐसे हैं, जिन्हें यह वक्तव्य पसंद नहीं आया है और उन्होंने इसकी आलोचना या अपनी दृष्टि से समीक्षा शुरू कर दी है. राजनीतिक दल अपने हिसाब से राजनीति करेंगे ही, पर यह अपेक्षा की जा सकती है कि उन्हें भी सदबुद्धि आये. इस मंतव्य के साथ पूरे देश और समाज को चलाना चाहिए और सभी को अपने-अपने समाज में भी जागृति फैलाना चाहिए.

तीस हजार से अधिक भारतीयों से बातचीत पर आधारित अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा कराये गये सर्वेक्षण के जो निष्कर्ष आये हैं, उनसे कई भ्रांतियां दूर होती हैं. समाज में एक-दूसरे के प्रति असहिष्णुता या घृणा जैसे भाव नहीं हैं. समाज का अधिकांश हिस्सा एक-दूसरे के साथ मिलकर रहना चाहता है. भारतीय समाज में जितने भी धर्म और पूजा पद्धतियां हैं, सबकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अपनी भूमिका को सकारात्मक ढंग से निभायें. समाज में छिटपुट घटनाएं किन्हीं-किन्हीं कारणों से होती रहती हैं. उनके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार मान लेना कहीं से भी उचित नहीं है.

समाज की परिधि बहुत बड़ी है. सोच के अलग-अलग दायरे हैं. उसमें कहीं- कहीं कुछ लोग स्वयंभू के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते हैं, जिसका खराब असर समाज पर पड़ता है. लेकिन जब कोई बड़ा संगठन, जो एक सांस्कृतिक संगठन है, वैचारिक संगठन है, जो राजनीति से परे रहकर अपने विचार को रखता है, जो अपनी विरासत को वेदों, उपनिषदों, पुराणों आदि ग्रंथों में देखता है, तो उसका विचार एक ग्राह्य विचार के रूप में आता है. इसीलिए मोहन भागवत जी जब कुछ बोलते हैं, तो उस पर विमर्श भी होता है.

समाज या राष्ट्र को बनाने का कार्य किसी एक पक्ष का नहीं है. सभी को साथ आना पड़ेगा और दुराग्रहों को छोड़ना पड़ेगा. कोई अगर यह सोचे कि अकेले उसके सदाशयता दिखाने या बड़ा दिल रखने से सारे कार्य पूरे हो जायेंगे, तो ऐसा होता नहीं है. यह सामूहिक जिम्मेदारी है.

राजनीतिक विज्ञान विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

spsinghdu@gmail.com

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