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भोजपुरी समाज की जड़ताओं को तोड़ा था महेंदर मिसिर ने

Updated at : 14 Mar 2025 11:29 AM (IST)
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Mahendar Misir

महेंदर मिसिर

Mahendar Misir : महेंदर मिसिर ने भोजपुरी गीतों की दुनिया को एक आकार दिया. एक नया आयाम दिया. मुकाम भी. महान भोजपुरी गायक मोहम्मद खलील से लेकर हाल में इस नश्वर संसार से विदा हुईं शारदा सिन्हा ने उनके गीतों का गायन कर, भोजपुरी गीतों के सौंदर्य को दुनियाभर में नये रूप में फैलाया.

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Mahendar Misir : ऋतुराज वसंत के उठान के दिनों में सृष्टि प्रकृति के सभी प्राणियों को नवजीवन का रस देकर विदाई की बेला में है. ऐसे मौसम में महेंदर मिसिर की जयंती का दिन आ रहा है. लोग उन्हें पुरबी का पुरोधा, पुरबी का जनक, पुरबी का सम्राट कहते हैं. पुरबिया उस्ताद भी. प्रेमरसिया भी. इस बार उनकी जयंती उस समय आयी है, जब भोजपुरी दुनिया हनी सिंह के भोजपुरी प्रयोग से गूंज रही है. हनी सिंह की नजर स्त्री देह की अश्लीलता के बारे में ज्यादा है. भोजपुरी समाज का एक वर्ग ही नहीं, गैर भोजपुरियों का एक बड़ा वर्ग भी हनी सिंह के साथ है. रील कल्चर के इस दौर में असंख्य लड़कियां और महिलाएं भी हनी सिंह के एलान पर बेताबी के साथ रील बना रही हैं. हनी सिंह कह रहे हैं, उन्होंने भोजपुरी की एक गायिका को आगे बढ़ाया. वह खुलकर भले न कह रहे हों, लेकिन उनके कहने का आशय यह है कि भोजपुरी को उन्होंने ऊंचाई दी है, इसके लिए भोजपुरी समाज को उनका कृतज्ञ रहना चाहिए. हनी सिंह से यह पूछा जाना चाहिए कि अगर उनके दिमाग में ऐसे प्रयोग का खयाल आया था, तो वह मराठी पर, अपने पंजाबी पर या फिर हिंदी क्षेत्र की ही दूसरी लोकभाषाओं से ऐसे गीत बनाकर प्रयोग करने का क्यों नहीं सोच सके?


बहरहाल, बात दूसरी है. हनी सिंह के इस दौर में आज हम सब महेंदर मिसिर को याद कर रहे हैं. महेंदर मिसिर ने भोजपुरी गीतों की दुनिया को एक आकार दिया. एक नया आयाम दिया. मुकाम भी. महान भोजपुरी गायक मोहम्मद खलील से लेकर हाल में इस नश्वर संसार से विदा हुईं शारदा सिन्हा ने उनके गीतों का गायन कर, भोजपुरी गीतों के सौंदर्य को दुनियाभर में नये रूप में फैलाया. शारदा सिन्हा के दस चुनिंदा और सर्वकालीन सदाबहार-लोकप्रिय गीतों की सूची बनाइए, उनमें चार के करीब महेंदर मिसिर के गीत होंगे. चाहे वह ‘पटना से बैदा बुलाई द…’ हो, ‘अमवा महुइया के झूमे डलिया…’ हो, ‘पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह पिया…’ हो या फिर ‘हमनी के रहब जानी दुनो परानी…’ जैसे गीत हों.


महेंदर मिसिर जनमानस में स्थापित हुए, पुरबी के पुरोधा के रूप में. उन्होंने पुरबी को एक नया आयाम और अपार विस्तार दिया. पर, उनका रचना संसार यहीं तक सीमित नहीं था. अपने आरंभिक दिनों में वह शिव को रच रहे थे, राम को लेकर अपूर्ण रामायण रच रहे थे, प्रेम गीतों को रच रहे थे, राधाकृष्ण को रच रहे थे, सभी गीतों को पुरबी के रंग में ढाल रहे थे. यह उनकी खासियत थी. पर, उनकी पहचान सिर्फ पुरबी तक सीमित नहीं थी. उनकी रचनाओं से गुजरते हुए पुरबी के समानांतर ही प्रेम का उभार होता है मन में. महेंदर मिसिर लोकभाषाओं की दुनिया में प्रेम को केंद्रीय विषय बनानेवाले अनोखे रचनाकार हुए. उनके निरगुण गीतों की दुनिया एकदम अलग है. उन्होंने तो आजादी का भी तराना लिखा, ‘हमरा नीको नाही लागेला गोरन के करनी…’ जैसे गीत. और भी दूसरे विषयों को केंद्र बनाकर उन्होंने अनेकानेक रचनाएं कीं. और इन सबसे अलग, महेंदर मिसिर ने पलायन के गीतों का आख्यान रचा. पर, यह सब रचते हुए प्रेम अहम विषय रहा उनके लेखन में. उनकी रचनाओं से गुजरते हुए कई बार ऐसा लगता है, जैसे वह अपने समय में प्रेम को केंद्र में रखकर स्त्री मुक्ति की राह बना रहे थे, भोजपुरी समाज की जड़ताओं को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, देहरी के अंदर रहनेवाली स्त्रियों के मन में पलनेवाले प्रेम को स्वर देकर उन्हें मजबूत करना चाह रहे थे. सोचती हूं कि कितना कठिन रहा होगा उनके लिए. किस तरह वह स्त्री मन के अंदर की बातों को, एकदम से शब्दों में उतारते होंगे. कितनी गहराई में डूब जाते होंगे वह. स्त्री ही बन जाते होंगे, लिखते समय….


महेंदर मिसिर से ज्यादा प्रेम को किसने रचा भोजपुरी में? पर, प्रेम अपने उदात्त रूप में पहुंचकर भी स्त्री के मन तक सिमटा रहा. तन पर नहीं आया. वह अपने गीतों में स्त्रियों को सहभागी बना रहे थे. प्रेम स्त्री के तन के बजाय मन से शुरू होकर मन की विराट दुनिया में विस्तार पा सकता है, महेंदर मिसिर ने अपने गीतों से यह साबित किया. अब, स्त्री को महज देह के भूगोल में समेटकर गीत लिखने और गानेवाले कहते हैं कि भोजपुरी में यह सब चलता है. महेंदर मिसिर से चलकर आज तक के भोजपुरी गीतों के सफर का एक बड़ा हासिल यह भी है कि महेंदर मिसिर ने प्रेम को केंद्र में रख कर स्त्रियों को भोजपुरी गीतों की दुनिया से जोड़ा था. अब प्रेम को गायब कर, स्त्रियों के मन को गायब कर, सिर्फ उनके तन को लेकर यह भाव भरा जाता है कि लड़कियों, डरो भोजपुरी गीतों से, दूर रहो. हमें स्त्री का मन नहीं चाहिए गीत में, सिर्फ तन चाहिए. दिखाने के लिए. जो जी में आये, जैसे जी में आये, उसे कानफाड़ू तेज संगीत के बीट पर फिट कर सबको सुनाने के लिए.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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विश्वनाथ त्रिपाठी

लेखक के बारे में

By विश्वनाथ त्रिपाठी

विश्वनाथ त्रिपाठी is a contributor at Prabhat Khabar.

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