अन्नदाताओं के हितों की रक्षा जरूरी

Updated at : 23 Sep 2020 5:59 AM (IST)
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अन्नदाताओं के हितों की रक्षा जरूरी

आशा करनी चाहिए कि पश्चिमी देशों की तरह किसान उत्पादन, मेहनत, सम्मान के साथ आत्मनिर्भर बनेंगे. अनावश्यक आंदोलनों में समय क्यों बर्बाद करें.

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आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार

alokmehta7@hotmail.com

चौधरी चरण सिंह ने 1978 में एक अनौपचारिक बातचीत के दौरान मुझसे कहा-‘तुम कोट-टाई वाले पत्रकार खेती और किसानों के बारे में कुछ नहीं जानते और उनकी समस्याएं नहीं समझ सकते.’ उन दिनों वे उप-प्रधानमंत्री थे. मैंने कहा कि ‘चौधरी साहब, आप किसानों के असली और सबसे बड़े नेता हैं, आपको खुश होना चाहिए कि खेती-किसानी वाले आर्य समाजी दादाजी का पोता कोट-पैंट पहनकर आपके साथ बैठकर बात कर रहा है. बचपन में गन्ने, संतरे, गेहूं, आम की फसल के साथ बैलगाड़ी में बैठकर मंडी तक जाने का मैंने भी आनंद लिया है.

उस समय शिक्षक पिता की जिम्मेदारियों के थोड़े-बहुत कष्ट भी देखे हैं, इसलिए आप किसानों के बारे में जो कुछ कहेंगे, मैं उसे पूरा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में लिखूंगा-छापूंगा. ‘इस तरह चौधरी साहब, देवीलाल जैसे कई नेताओं से बातचीत करने और किसानों के मुद्दों पर लिखने का अनुभव रहा है.’ इसलिए, इन दिनों किसानों की फसल की अधिकाधिक कीमत मिलने और कहीं भी किसी को बेच सकने के लिए संसद में नया कानूनी प्रावधान होने पर हंगामे को देख-सुनकर थोड़ी तकलीफ हो रही है. दावे, समर्थन, विरोध के बीच यह भी मुद्दा है कि किसानों के हितों की रक्षा करनेवाला असली नेता कौन है?

देश के हर भाग में खेती-बाड़ी और किसानों की चुनौतियां तथा सफलताएं भी हैं. भारतीय खाद्य निगम द्वारा 1973-74 में अनाज के भंडारण के लिए हरियाणा से शुरू किये गये सेलो गोदामों के प्रयोग से लेकर अब तक सही भंडारण, सही दाम, मंडियों में तोलने में गड़बड़ी, भुगतान में हेरा-फेरी और देरी तथा मंडियों से नेताओं की राजनीति को लोग जानते रहे हैं. कई वर्षों से केवल भाजपा पार्टी ही नहीं, कांग्रेस, समाजवादी, जनता दल अपने घोषणा-पत्रों में बिचौलियों से मुक्ति, अधिक दाम, फसल बीमा और हर संभव सहयोग के वायदे करती रही हैं. संसद में विधेयक लाने के लिए विभिन्न दलों के नेताओं की संयुक्त समिति में भी उस पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ है. इसके बावजूद विरोध के नाम पर ऐसा हंगामा हो रहा है, मानो किसानों पर विदेशी हमला हो गया है.

स्वास्थ्य का मुद्दा हो या खेती-किसानी का, समय के साथ सुधार करने होते हैं. इसलिए मोदी सरकार द्वारा अनाज की खुली बिक्री-खरीदी, अधिकतम मूल्यों के प्रावधान के लिए पहले अध्यादेश और अब संसद से स्वीकृति के बाद आनेवाले महीनों में भी कुछ सुधारों की आवश्यकता हो सकती है. पंजाब, हरियाणा की राजनीति और बड़ी संख्या में बिचौलियों के धंधे पर जरूर असर होनेवाला है, लेकिन अधिकांश राज्यों के किसानों को अंततोगत्वा बड़ा लाभ होनेवाला है. प्रधानमंत्री मोदी और कृषिमंत्री नरेंद्र तोमर ने स्पष्ट घोषणा कर दी है कि सरकार द्वारा न्यूनतम मूल्यों पर खरीद निरंतर होती रहेगी.

खाद्य निगम गेहूं और धान तथा नेफेड दलहन व तिलहन की खरीद करते रहेंगे. किसान केवल सरकारों पर ही निर्भर क्यों रहे? वह इलाके की मंडी की मेहरबानी पर क्यों रहे? वह अपनी फसल का मनचाहा दाम क्यों न लें. मुझे वर्षों पहले पिताजी द्वारा दिल्ली आते समय उज्जैन से मालवी गेहूं की बोरी लाने पर रेलगाड़ी में कभी रेल कर्मचारी या रेलवे पुलिस द्वारा बोरी में कितने किलो गेहूं और कहां, क्यों ले जाने के, सवालों की याद आयी. उन दिनों यह गेहूं दिल्ली तक मुश्किल से आता था. मतलब, हम अपने घर का अनाज लाने में भी परेशान हो जाते थे.

विरोध में हमारे नेता चिंता जता रहे हैं कि किसानों के साथ अनुबंध करनेवाले बड़े व्यापारी या कंपनियां ठग लेंगी. संभव है कि शुरू में अधिक कीमत दें और बाद में कीमत कम देने लगें. लेकिन, वे भूल जाते हैं कि अब किसान और दूर-दराज के परिवार संचार माध्यमों से बहुत समझदार हो गये हैं. वे बैंक खाते, फसल बीमा, खाद, बीज और दुनियाभर से भारत आ रहे तिलहन, प्याज, सब्जी-फल का हिसाब-किताब भी देख-समझ रहे हैं. भंडारण-बिक्री की व्यवस्था होने पर वे अधिक लाभ उठाने लगेंगे. फिर दलालों, बिचौलियों और ठगों से बचाने के लिए सत्तारूढ़ नेता ही क्यों, प्रतिपक्ष के नेता, कार्यकर्ता, पुलिस, अदालत, मीडिया क्या सहयोग नहीं कर सकता? अन्नदाताओं के सम्मान और हितों की रक्षा की जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग की है.

कई नेता फोटो खिंचवाने और विज्ञापनों के लिए ट्रैक्टर पर बैठते रहे हैं. फिल्मों में भी ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, खेत-खलिहान के लिए नायक, नायिका अच्छे दृश्य फिल्मा लेते हैं. लेकिन उन्हें जमीनी समस्याओं का अंदाज नहीं होता. मनमोहन सिंह ने 1992 में बजट पेश करने के अगले दिन इंटरव्यू के दौरान मुझसे कहा था कि ‘नयी आर्थिक नीतियों से देश के किसानों या व्यापारियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला करना होगा.’ लेकिन, उनके या कई प्रधानमंत्रियों के सत्ताकाल में किसानों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुकाबले लायक बनाने के प्रयास नहीं हुए. उनके सत्ताकाल में विदेशी हमारे पानी को कौड़ियों के दाम या मुफ्त लेकर अरबों रुपयों की कमाई करते रहे हैं.

यशवंत सिन्हा या पी चिदंबरम ने वित्तमंत्री रहते कौन से लाभ दिये? किसानों के नाम पर राजनीति करनेवाले एक बड़े नेता अब दुनिया में नहीं रहे, इसलिए नाम नहीं लिख रहा, लेकिन उन्होंने न केवल कृषि उपकरणों, ट्रैक्टर आदि की सरकारी खरीदी के अलावा सैकड़ों एकड़ जमीन पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कब्जाई और असली खेती करनेवालों का शोषण भी किया. चौधरी चरण सिंह की पारिवारिक रियासत वाले अजीत सिंह या गरीब किसानों को गाय-बैल बांटने के नाम पर करोड़ों का चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू प्रसाद आखिरकार उन्हीं किसानों के कोपभाजन के कारण सत्ता से बाहर हैं.

इसे दुर्भाग्य कहा जायेगा कि अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों के असली नेता कहे जानेवाले समाजसेवी व्यक्ति देश में नहीं दिखायी दे रहे हैं. केवल भाषण, टीवी चैनल और फेसबुक वाले पांच सितारा शैली के लोग किसानों के नाम पर विरोध कर रहे हैं. यदि सर्वमान्य नेता होते तो चौधरी चरण सिंह या टिकैत की तरह समर्थन या विरोध में लाखों की भीड़ जुटा देते. बहरहाल, अब आशा करनी चाहिए कि पश्चिमी देशों की तरह किसान अपने उत्पादन, मेहनत, सम्मान के साथ आत्म निर्भर बनेंगे. अनावश्यक आंदोलनों में अपना समय क्यों बर्बाद करें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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आलोक मेहता

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By आलोक मेहता

आलोक मेहता is a contributor at Prabhat Khabar.

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