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दिल्ली के चुनावी दंगल का तीखापन, पढ़ें उमेश चतुर्वेदी का खास लेख

Updated at : 31 Jan 2025 7:00 AM (IST)
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Delhi Assembly election

अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव

Delhi assembly election : राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति के जानकारों का मानना है कि सत्ता में वापसी की दौड़ में बीजेपी 2013 में अपनी रणनीतिक कमजोरियों की वजह से ही पिछड़ गयी. वह एक तरह से उसके लिए बड़ी फिसलन रही. बाद के दिनों में केजरीवाल की लोकप्रियता ने ऐसी गति पकड़ी कि लगातार दो चुनावों में बीजेपी खड़ी भी नहीं हो पायी.

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Delhi Assembly Election : चुनावी राजनीति आज जिस मुकाम पर पहुंच चुकी है, उसमें दिल्ली की राजनीतिक लड़ाई तीखी नहीं होती तो ही हैरत होती. वैसे भी आज राजनीतिक दलों की कामयाबी की बुनियाद उनकी उपलब्धि या लोकहित के कदम नहीं रह गये हैं. परसेप्शन, दल विशेष की कामयाबी का आधार बन गया है. इसीलिए हर दल लोकधारणा बेहतर बनाने की दिशा में जितनी तेजी से प्रयास करता है, उतने ही तीखेपन से विरोधी दल की छवि को चोट भी पहुंचाता है. दिल्ली के चुनावी दंगल में भी यह प्रवृत्ति खूब नजर आ रही है.


इसमें दो राय नहीं कि दिल्ली में दांव पर सबसे ज्यादा सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की साख है. लगातार दो चुनावों में भारी जीत के साथ सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी के लिए इस बार कठिन चुनौती है. वर्ष 2013 से लेकर हर विधानसभा चुनाव में सत्ता में वापसी की जीतोड़ कोशिश करती रही बीजेपी इस बार ज्यादा उत्साहित है. राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति के जानकारों का मानना है कि सत्ता में वापसी की दौड़ में बीजेपी 2013 में अपनी रणनीतिक कमजोरियों की वजह से ही पिछड़ गयी. वह एक तरह से उसके लिए बड़ी फिसलन रही. बाद के दिनों में केजरीवाल की लोकप्रियता ने ऐसी गति पकड़ी कि लगातार दो चुनावों में बीजेपी खड़ी भी नहीं हो पायी.

इस जंग में सबसे ज्यादा नुकसान उस कांग्रेस का हुआ, जिसका सबसे ज्यादा दिनों तक दिल्ली की जनता ने साथ दिया. वर्ष 1998 में 47.75 प्रतिशत वोट और 52 सीटों के साथ सत्ता पर काबिज होकर तीन बार जीत का स्वाद चखने वाली कांग्रेस को 2013 में 24.6 प्रतिशत वोट और आठ सीट ही मिली. करीब दो वर्ष बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को महज 9.7 और 2020 में 4.26 प्रतिशत वोट ही मिले. दिल्ली की चुनावी राजनीति में जितनी तेजी से कांग्रेस पिछड़ती गयी, उतनी ही तेजी से आप का ग्राफ बढ़ता गया. वर्ष 2013 में आप को 29.5 प्रतिशत वोट मिले, तो अगले चुनाव में उसे बेतहाशा समर्थन मिला. वर्ष 2015 में आप को 54.3 प्रतिशत वोट और 67 सीटें मिलीं. वर्ष 2020 के चुनावों में आप 53.57 प्रतिशत वोट हासिल करने और 62 सीटें जीतने में सफल रही.


इसी बीच के दो लोकसभा चुनावों में एकतरफा जीत हासिल करने वाली बीजेपी के लिए विधानसभा चुनावों में जीत मृगमरीचिका बनी रही. पार्टी को 2013 में जहां 33 प्रतिशत वोट मिले, वहीं 2015 में 32.3 प्रतिशत वोट हासिल हुए. वर्ष 2020 में बीजेपी के वोट प्रतिशत में छह प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. उसे 38.51 प्रतिशत वोट तो मिले, लेकिन जीत उससे दूर रही. हालांकि इस बार उसे आठ सीटें मिलीं. किसी भी चुनाव में जीत के लिए नेता, नीति और नीयत की बड़ी भूमिका मानी जाती है. वर्ष 2003 के चुनावों से ही दिल्ली बीजेपी प्रभावी नेता के संकट से जूझती रही है. पिछले दो चुनावों में वह प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे के ही भरोसे रही.

दिल्ली के वोटरों ने केंद्रीय राजनीति के लिए प्रधानमंत्री मोदी पर भरोसा तो जताया, पर दिल्ली के लिए केजरीवाल उसकी उम्मीद बने रहे. पर इस बार मामला बदला नजर आ रहा है. इसका संकेत मिल रहा है आप की ओर से हो रही बयानबाजी से. वैसे केजरीवाल बार-बार बीजेपी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार का प्रश्न उछाल रहे हैं. इसके जरिये वे दरअसल बीजेपी की नेता की कमी को प्रभावी मुद्दा बनाना चाहते हैं. इसके जरिये वे खुद को दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित भी कर रहे हैं. दिल्ली की राजनीति का बड़ा संकट यह है कि वह नब्बे के दशक से पहले वाली दिल्ली के जातीय और सामुदायिक समीकरणों के लिहाज से चुनावी कदम उठाती है. उस वक्त दिल्ली की राजनीति के केंद्र में पंजाबी, बनिया और शरणार्थी समुदाय के साथ ही देहात के जाट और गुर्जर समुदाय रहे.

आज की दिल्ली में करीब बीस प्रतिशत पूर्वांचली, जबकि आठ प्रतिशत वोटर उत्तराखंड और हिमाचल के हैं. पूर्वांचली मतदाताओं को रिझाने के लिए पिछली बार केजरीवाल ने 16 पूर्वांचली उम्मीदवार उतारे थे, हालांकि दिल्ली के हेल्थ सिस्टम पर बढ़ते दबाव के लिए उन्हीं लोगों को जिम्मेदार ठहराया था. इसके बावजूद उन्हें भारी जीत मिली थी. इस बार भी दिल्ली में पूर्वांचली वोटर बड़ा मुद्दा बन रहा है. यह भी सच है कि दिल्ली में बीजेपी की कामयाबी तीसरे दल की ताकत पर निर्भर करती है. वर्ष 1993 के पहले विधानसभा चुनाव में जनता दल को 12 प्रतिशत से कुछ ज्यादा वोट मिले थे, उसी कारण बीजेपी को जीत मिली थी. लेकिन अगले चुनाव में जनता दल अपने अंतर्विरोधों के चलते खत्म हो चुका था, लिहाजा बीजेपी की तत्कालीन प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को जीत हासिल करने में आसानी रही.


इस बार के चुनावों में कांग्रेस पूरा दमखम लगा रही है. वह खुद को पहले की तुलना में ज्यादा ताकतवर दिखा रही है. अगर वह ताकतवर हुई, 1993 के जनता दल की तरह बारह से पंद्रह प्रतिशत तक वोट हासिल करने में सफल हुई, तो बीजेपी की संभावनाएं बढ़ेंगी. दिल्ली में कांग्रेस के जो पारंपरिक मतदाता रहे, वे अब आप के समर्थक हैं. कांग्रेस उन्हें लुभाने की कोशिश कर रही है. इस पूरी कवायद में जीत और हार का दारोमदार सबसे अधिक कांग्रेस पर है. वह जितनी ताकतवर होगी, बीजेपी की उम्मीदों की पतंग उतनी ही ऊंची उड़ेगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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उमेश चतुर्वेदी

लेखक के बारे में

By उमेश चतुर्वेदी

उमेश चतुर्वेदी is a contributor at Prabhat Khabar.

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