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भारत-ब्रिटेन के बीच ऐतिहासिक व्यापार संधि, पढ़ें शिवकांत शर्मा का लेख

Updated at : 25 Jul 2025 6:45 AM (IST)
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india uk relations

भारत-ब्रिटेन संबंध

भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और ब्रिटेन छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. परंतु इन दोनों का व्यापार केवल 58 अरब डॉलर है, जो विश्व व्यापार का 0.2 फीसदी भी नहीं है. ब्रिटेन को यूरोपीय संघ छोड़ने से हुए व्यापारिक नुकसान की भरपाई के लिए बड़े-बड़े देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते करने की जरूरत है.

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India-UK : ब्रिटेन की चौथी राजकीय यात्रा पर गये प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और ब्रिटेन के बीच हुए व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते को ऐतिहासिक बताया और ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टार्मर ने इसे ब्रिटेन के सबसे व्यापक व्यापार सौदे की संज्ञा दी. तीन साल की तैयारी के बाद हुए इस समझौते के तीन भाग हैं-मुक्त व्यापार समझौता, दोहरे समाज-सुरक्षा योगदान से मुक्ति का समझौता और द्विपक्षीय निवेश संधि. इनमें से पहले दो पर मुहर लग चुकी है और निवेश संधि पर काम चल रहा है. मुक्त व्यापार समझौते में वस्तुओं, सेवाओं, नवाचार, सरकारी खरीद और बौद्धिक संपदा अधिकारों पर अलग-अलग अध्याय हैं. इसे भारत की कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है, पर ब्रिटिश संसद का अनुमोदन मिलना अभी बाकी है.


भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और ब्रिटेन छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. परंतु इन दोनों का व्यापार केवल 58 अरब डॉलर है, जो विश्व व्यापार का 0.2 फीसदी भी नहीं है. ब्रिटेन को यूरोपीय संघ छोड़ने से हुए व्यापारिक नुकसान की भरपाई के लिए बड़े-बड़े देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते करने की जरूरत है. इसीलिए उसने हाल में अमेरिका, जापान ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर के साथ व्यापार समझौते किये हैं. भारत के साथ हुए समझौते का प्रमुख लक्ष्य दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के मौजूदा व्यापार को बढ़ाकर 2030 तक 120 अरब डॉलर करना है.

भारत के लिए इस समझौते की शायद सबसे बड़ी उपलब्धि ब्रिटेन में कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों और उनके अस्थायी रूप से ब्रिटेन में आकर काम करने वाले कर्मचारियों को तीन साल तक वहां के राष्ट्रीय सुरक्षा योगदान से मिली छूट है, जिनमें सूचना संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में काम करने वाले प्रमुख हैं. ब्रिटेन में काम करने वालों को वेतन का 10-12 फीसदी और उनकी कंपनियों को कर्मचारियों के वेतन का 15 फीसदी राष्ट्रीय सुरक्षा योगदान के रूप में देना पड़ता है. इसमें छूट मिलने से भारतीय कंपनियों को प्रति कर्मचारी 20 फीसदी तक की बचत होगी. यह प्रावधान एक अलग समझौते के तहत किया गया है, जिसे दोहरा योगदान कन्वेन्शन कहते हैं.

इस समझौते से ब्रिटेन को 10 से 12 करोड़ डॉलर सालाना की कर हानि होगी, जिस पर वहां का विपक्ष सवाल उठा रहा है. पर स्टार्मर सरकार का तर्क है कि ब्रिटेन ने ऐसे ही समझौते यूरोप के अधिकांश देशों समेत 50 देशों से किये हैं. इस व्यापार सौदे के बाद भारत से निर्यात होने वाले 99 फीसदी माल पर ब्रिटेन में कोई शुल्क नहीं लगेगा. बदले में भारत भी ब्रिटेन से आयात होने वाले माल पर अपने शुल्कों में 90 फीसदी तक की कटौती करेगा. स्कॉच, व्हिस्की जैसे ब्रिटिश माल पर दस साल के भीतर शुल्कों में कटौती की जायेगी.

मुक्त व्यापार समझौता होने से ब्रिटेन में भारतीय कपड़े, जूते, कारें और उनके पुर्जे, दवा, रसायन, रत्न-आभूषण, समुद्री माल, खेल के सामान और खिलौने सस्ते हो जायेंगे. जबकि भारत में ब्रिटेन से आने वाली धातुएं, व्हिस्की और जिन, चिकित्सा उपकरण, शृंगार सामग्री, चॉकलेट, बिस्कुट, ऊनी कपड़ा, मांस, मछली और महंगी कारें सस्ती हो जायेंगी. यह दोनों देशों के लिए लाभ का सौदा है. द्विपक्षीय निवेश संधि होने पर भारतीय कंपनियों को ब्रिटिश ठेकों के लिए बोली लगाने और वहां की कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदने और कारोबार लगाने की सुविधाएं मिलेंगी. उसके बदले ब्रिटिश कंपनियां भी भारत में उस तरह की सुविधाएं ले सकेंगी. व्यापार और निवेश बढ़ने से दोनों देशों में रोजगार बढ़ेंगे और आर्थिक विकास को गति मिलेगी. इससे भारत अपने निर्यात को बढ़ाकर 2030 तक एक लाख करोड़ डॉलर करने के लक्ष्य की ओर बढ़ सकेगा.


भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते में सबसे बड़ी रुकावट ब्रिटेन पढ़ने जाने वाले भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए वीजा की संख्या बढ़ाने और प्रक्रिया को आसान करने की भारत की मांग थी, जिसके लिए ब्रिटिश सरकार को अपनी आव्रजन नीति बदलनी पड़ती. आप्रवासी विरोधी राजनीतिक माहौल को देखते हुए इसे स्वीकार करना ब्रिटिश सरकार के लिए संभव नहीं था. इसलिए भारत को अपनी इस मांग से समझौता करना पड़ा. ब्रिटेन में कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों के कर्मचारियों के लिए वीजा प्रक्रिया को आसान बनाने और भारतीय रसोइयों, संगीतकारों और योग शिक्षकों के लिए सालाना 1,800 वीजा देने के आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिल पाया है. समझौते में 2022 की व्यापार वार्ताओं में उठे दवा पेटेंटों के उस विवाद का जिक्र भी नहीं है, जिसकी वजह से भारत में सस्ती जेनेरिक दवाओं के उत्पादन में रुकावटें खड़ी हो सकती थीं और ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा को सस्ती जेनेरिक दवाएं मिलने में दिक्कत खड़ी हो सकती थीं.


यह व्यापार सौदा भारत के लिए इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ का प्रवेश द्वार माना जाता है. यूरोपीय संघ दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक है और उससे बाहर हो जाने के बावजूद ब्रिटेन का लगभग आधा व्यापार उसी के साथ होता है. भारत पिछले कई वर्षों से यूरोप के साथ भी मुक्त व्यापार सौदा करने की कोशिश में है. ब्रिटेन के साथ हुए व्यापार सौदे से उसे पूरा करने में भी मदद मिल सकती है. यूरोप के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं में कृषि उत्पादों, ऑटो पार्ट और सेवाओं के लिए मंडियां खोलने पर और कार्बन टैक्स, पर्यावरण और श्रम के स्तरों को लेकर रुकावटें खड़ी होती रही हैं.

भारत-ब्रिटेन सौदे में बाकी सब रुकावटों को तो दूर कर लिया गया, पर कार्बन टैक्स का मामला अभी अटका हुआ है. भारत और ब्रिटेन की मंडियों में एक-दूसरे की चीजों की कीमतों पर इस समझौते का प्रभाव अगले वर्ष से दिखाई देने लगेगा. शुल्क मुक्त व्यापार से भारत के निर्यातकों को लगभग 4,000 करोड़ रुपये सालाना और ब्रिटिश निर्यातकों को करीब 3,500 करोड़ रुपये सालाना की बचत होगी. भारत के कपड़े, जूते, खेल का सामान और खिलौने बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, वियतनाम और चीन से आने वाले मालों का मुकाबला करते हुए बाजारों में अपनी जगह बना सकेंगे.

इस समझौते का सामरिक महत्व भी है. इससे भारत और ब्रिटेन की व्यापक सामरिक साझेदारी मजबूत होगी, जो आपसी आर्थिक विकास, तकनीकी नवाचार और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकटों के समाधान में सहयोग पर केंद्रित है. इसी के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्रीय और वैश्विक प्रश्नों पर चर्चा करने के साथ-साथ ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टार्मर को खालिस्तानी चरमपंथियों की बढ़ती गतिविधियों और भगोड़े नागरिकों के प्रत्यर्पण में आ रही अड़चनों का ध्यान भी दिलाया है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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शिवकांत शर्मा

लेखक के बारे में

By शिवकांत शर्मा

शिवकांत शर्मा is a contributor at Prabhat Khabar.

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