इयू से रक्षा समझौते का लाभ समुद्री सुरक्षा में

भारत और ईयू के बीच रक्षा समझौता
India and European Union deal : वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था इन दिनों गहरे दबाव में है. क्षेत्रीय संघर्षों के साथ-साथ बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा और बदलती प्राथमिकताओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर बना दिया है. अमेरिकी रवैये के कारण यूरोप की सुरक्षा चिंताएं फिर उभरकर सामने आयी हैं.
India and European Union deal : भारत और यूरोपीय संघ के बीच रक्षा क्षेत्र में बढ़ता सहयोग समकालीन भू-राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण, किंतु अपेक्षाकृत कम चर्चित, परिवर्तनों में से एक है. हाल ही में नयी दिल्ली में आयोजित भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में अधिकांश ध्यान व्यापार समझौते और आर्थिक सहयोग पर केंद्रित रहा, लेकिन इसी दौरान एक और उतना ही महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया. यह था भारत और यूरोपीय संघ के बीच सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर. यह समझौता न केवल दोनों पक्षों के बीच बढ़ते भरोसे को दर्शाता है, बल्कि उस अस्थिर और अनिश्चित वैश्विक सुरक्षा वातावरण के प्रति साझा प्रतिक्रिया भी है, जिसमें पारंपरिक व्यवस्थाएं और स्थापित नियम लगातार कमजोर पड़ रहे हैं.
वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था इन दिनों गहरे दबाव में है. क्षेत्रीय संघर्षों के साथ-साथ बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा और बदलती प्राथमिकताओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अस्थिर बना दिया है. अमेरिकी रवैये के कारण यूरोप की सुरक्षा चिंताएं फिर उभरकर सामने आयी हैं. नाटो सहयोगियों पर लगातार बढ़ता अमेरिकी दबाव, कि वे अपनी रक्षा जिम्मेदारियां स्वयं उठायें, और वाशिंगटन की अप्रत्याशित विदेश नीति ने यूरोप को अपनी रणनीतिक निर्भरता पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया है. ऐसे समय में, भारत एक ऐसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में उभरता है, जो न तो किसी सैन्य गुट का हिस्सा है और न ही जिसकी रणनीतिक सोच किसी एक शक्ति पर निर्भर है.
भारत के लिए यह साझेदारी यूरोपीय संघ द्वारा उसकी बदलती वैश्विक भूमिका की औपचारिक स्वीकृति है. लंबे समय तक भारत-यूरोपीय संघ संबंध मुख्यतः व्यापार और आर्थिक सहयोग तक सीमित रहे. राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग अपेक्षाकृत हाशिये पर रहा. नयी रक्षा साझेदारी इस प्रवृत्ति से स्पष्ट बदलाव को दर्शाती है. शांति, सुरक्षा और रक्षा को द्विपक्षीय संबंधों का केंद्रीय स्तंभ बनाकर दोनों पक्ष यह स्वीकार करते हैं कि आज उनके हित समुद्री सुरक्षा, वैश्विक साझा संसाधनों की रक्षा, आतंकवाद से मुकाबले और उभरती प्रौद्योगिकियों के नियमन जैसे क्षेत्रों में तेजी से एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं. इसमें समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद और उग्रवाद से मुकाबला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हाइब्रिड खतरों, अंतरिक्ष सुरक्षा, रक्षा उद्योग सहयोग और क्षमता निर्माण जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं.
हिंद महासागर, अदन की खाड़ी और गिनी की खाड़ी में संयुक्त नौसैनिक गतिविधियां दिखाती हैं कि यह साझेदारी व्यावहारिक और संचालन आधारित सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रही है. भारत और यूरोपीय संघ ने नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र केंद्रित बहुपक्षीय प्रणाली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहरायी है. जब एकतरफा रवैया, दबाव की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून की चयनात्मक व्याख्या बढ़ रही है, तब यह साझा दृष्टिकोण विशेष महत्व रखता है. यद्यपि भारत और यूरोपीय संघ के दृष्टिकोण सभी मुद्दों पर पूरी तरह समान नहीं हैं, फिर भी संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थागत वैधता को लेकर दोनों की रणनीतिक सोच में स्पष्ट सामंजस्य है. रक्षा औद्योगिक सहयोग इस समझौते का शायद सबसे परिवर्तनकारी पहलू है.
यूरोप की पुनःसशस्त्रीकरण की प्रक्रिया और रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की उसकी जरूरत ने भारतीय रक्षा उद्योग के लिए नये अवसर खोल दिये हैं. भारत-यूरोपीय संघ रक्षा उद्योग मंच की स्थापना का निर्णय, जिसमें सरकारें पर्यवेक्षक की भूमिका में होंगी, एक व्यावहारिक और भविष्यदर्शी कदम है. इससे रक्षा कंपनियों के बीच प्रत्यक्ष साझेदारी, संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा मिलेगा.
भारत के लिए यह केवल बाजार तक पहुंच का प्रश्न नहीं है, बल्कि वैश्विक रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर भी है. भारतीय रक्षा उद्योग, जो हाल के वर्षों में तेजी से विकसित हुआ है, यूरोपीय रक्षा आवश्यकताएं पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इससे न केवल ‘मेक इन इंडिया’ और रक्षा निर्यात रणनीति को बल मिलेगा, यूरोपीय संघ को भी सीमित आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी. यह साझेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह परस्पर लाभ पर आधारित है और किसी एक पक्ष को दूसरे पर हावी नहीं होने देती.
वार्षिक भारत-यूरोपीय संघ सुरक्षा और रक्षा संवाद की स्थापना से यह सुनिश्चित होगा कि सहयोग केवल घोषणाओं तक सीमित न रहे. नियमित समीक्षा, विषयगत परामर्श और संवाद के माध्यम से इस साझेदारी को वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप ढाला जा सकेगा. अतीत में भारत-यूरोपीय संघ संबंधों की एक बड़ी कमजोरी क्रियान्वयन की रही है, यह नया ढांचा वह कमी दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरती सुरक्षा गतिशीलता के संदर्भ में यह साझेदारी और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है. यूरोपीय संघ की इस क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी और इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव में शामिल होना भारत की दृष्टि के अनुरूप है.
भारत के लिए यूरोपीय उपस्थिति किसी एक शक्ति पर निर्भरता कम करती है, जबकि यूरोपीय संघ के लिए भारत एक ऐसा साझेदार है, जो क्षेत्रीय वास्तविकताओं को गहराई से समझता है. यह साझेदारी वैश्विक साझेदारियों के पुनर्संतुलन को भी दर्शाती है. भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों को महत्व देता है और यूरोप भी ट्रांस-अटलांटिक संबंधों से जुड़ा हुआ है, लेकिन दोनों ही अब अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता चाहते हैं. भारत-यूरोपीय संघ रक्षा साझेदारी किसी मौजूदा गठबंधन के विरुद्ध नहीं है, बल्कि अनिश्चित वैश्विक माहौल में विकल्प और लचीलापन प्रदान करती है.
कुल मिलाकर, भारत और यूरोपीय संघ के बीच सुरक्षा और रक्षा साझेदारी एक शांत लेकिन निर्णायक रणनीतिक परिवर्तन का संकेत है. यह रक्षा सहयोग को द्विपक्षीय संबंधों के केंद्र में लाती है, वैश्विक अस्थिरता के दौर में रणनीतिक दृष्टियों का सामंजस्य स्थापित करती है और औद्योगिक सहयोग के नये द्वार खोलती है. जब पारंपरिक सुरक्षा गारंटी कम भरोसेमंद होती दिख रही है और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दबाव में है, तब भारत और यूरोपीय संघ ने सावधानी के बजाय साझेदारी का रास्ता चुना है. इसकी सफलता अंततः क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी, लेकिन इसकी दिशा और मंशा स्पष्ट है- एक अधिक संतुलित, स्थिर और बहुध्रुवीय सुरक्षा व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाना.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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लेखक के बारे में
By आनंद कुमार
आनंद कुमार नई दिल्ली स्थित विश्लेषक हैं, जिनकी विशेषज्ञता रणनीतिक मामलों, सुरक्षा मुद्दों और दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में है। उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित थिंक टैंकों में कार्य किया है। वे चार पुस्तकों के लेखक और दो संपादित ग्रंथों के संपादक हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक Strategic Rebalancing: China and US Engagement with South Asia है।
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