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जल्द नहीं थमने वाली सोने की मांग और कीमत

Updated at : 26 Sep 2025 6:07 AM (IST)
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gold rate

सोने की मांग

Gold Price : भारत में सोने के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव है. लोग, खासकर महिलाएं अपनी बचत को सोने के रूप में रखने में गर्व महसूस करती हैं. अनुमान है कि दुनिया में कुल ज्ञात सोने में से, जो 1,87,000 टन है, लगभग 25,000 टन भारत में है, जो भारतीय घरों में ऐतिहासिक रूप से रखे गये सोने और दुनिया के बाकी हिस्सों से सोने की खरीद का परिणाम है.

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Gold Price : देश की राजधानी में 10 ग्राम सोना नवरात्रि में 1,17,475 रुपये की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद हालांकि थोड़ा लुढ़क गया, लेकिन इसमें तेजी बने रहने की संभावना है. विगत नौ सितंबर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 3,673.95 डॉलर पर पहुंच गयी थी. इस साल अब तक सोने की कीमतों में 38 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है. वर्ष 1988 में सोने की कीमत 430 डॉलर प्रति औंस थी, जो सितंबर, 2018 तक बढ़कर 1,195 डॉलर प्रति औंस हो गयी, यानी 30 वर्षों में 3.43 फीसदी की वार्षिक वृद्धि. पर पिछले सात साल में सोने की कीमत करीब 17.5 फीसदी सालाना की दर से बढ़कर 3,654 डॉलर तक पहुंच गयी है. दुनियाभर के आर्थिक विश्लेषक सोने की कीमतों में उछाल के पीछे वैश्विक मौद्रिक व वित्तीय स्थितियों में महत्वपूर्ण बदलावों की ओर इशारा कर रहे हैं.


भारत में सोने के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव है. लोग, खासकर महिलाएं अपनी बचत को सोने के रूप में रखने में गर्व महसूस करती हैं. अनुमान है कि दुनिया में कुल ज्ञात सोने में से, जो 1,87,000 टन है, लगभग 25,000 टन भारत में है, जो भारतीय घरों में ऐतिहासिक रूप से रखे गये सोने और दुनिया के बाकी हिस्सों से सोने की खरीद का परिणाम है. भारतीय रिजर्व बैंक के पास 31 दिसंबर, 2024 तक 876 टन सोना था, जो अब दुनिया में आठवां सबसे बड़ा भंडार है. खासकर विकासशील देशों को पिछले कुछ दशकों में डॉलर के लगातार मजबूत होने के कारण भारी नुकसान हुआ है. भारत भी कोई अपवाद नहीं है.

हाल ही में भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय भुगतानों में रुपये की भूमिका बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किये हैं. दूसरी ओर, उथल-पुथल और खासकर अमेरिका व यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर लगाये गये प्रतिबंधों व अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में कठिनाई के कारण स्थानीय मुद्राओं में भुगतान करने के प्रयासों में उल्लेखनीय तेजी आयी है. इन सभी को दुनिया में समग्र रूप से डॉलर विमुक्ति का एक अभिन्न अंग माना जा रहा है. देशों की सरकारों और केंद्रीय बैंकों की डॉलर के प्रति विमुखता ने सोने की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि की है. सोने की कीमतों में हुई यह वृद्धि भविष्य में भी जारी रह सकती है या इसकी गति में और तेजी आ सकती है.
सोने में आयी इस तेजी के कई कारण बताये जा रहे हैं.

अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की उदार नीति को इसका सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है. आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने हेतु फेडरल रिजर्व पिछले कुछ समय से ब्याज दर घटाने का रुख अपनाये हुए है, जिससे अमेरिकी ट्रेजरी में यील्ड कम रहेगी. इसके चलते सोने में ज्यादा लाभ रहने की संभावना है. इसके अलावा कम ब्याज दरें सोने की अवसर लागत को कम करती हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमत डॉलर में तय होती है. कमजोर डॉलर विदेशी खरीदारों के लिए सोने को सस्ता बनाता है, जिससे मांग बढ़ती है. सोने को मूल्य के भंडार और मुद्रास्फीति के विरुद्ध बचाव के रूप में देखा जाता है. निवेशक अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए इसे खरीदते हैं.


बढ़ते भू राजनीतिक तनाव के चलते भी सोने को सर्वाधिक सुरक्षित निवेश माना जा रहा है. युद्ध और संघर्ष की स्थिति में तमाम देश और लोग सोने में ही सर्वाधिक निवेश करने की प्रवृत्ति रखते हैं. रूस-यूक्रेन का युद्ध जारी है तथा इस्राइल का इस्लामी देशों के साथ संघर्ष रुकने का नाम नहीं ले रहा. ऐसे में सोने को सर्वाधिक सुरक्षित संपत्ति माना जा रहा है. दुनिया में अभी तक डॉलर को ही रिजर्व करेंसी के नाते सर्वाधिक मान्यता प्राप्त थी. पिछले कुछ साल में रिजर्व में डॉलर का महत्व कम होना शुरू हो गया है. इस बीच यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा जब रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को लगभग जब्त कर लिया गया, तो अमेरिका पर देशों का विश्वास टूटना शुरू हो गया है. ऐसे में, दुनियाभर के केंद्रीय बैंक अब डॉलरों की बजाय ज्यादा से ज्यादा सोना रखना चाहते हैं. इसलिए उनके द्वारा सोने की खरीद में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, और यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, वैश्विक भंडार के रूप में डॉलर की हिस्सेदारी 2010 में 62 प्रतिशत से घटकर 2020 में 59 प्रतिशत और 2025 में 57.74 फीसदी रह गयी है.


मुद्रास्फीति और मुद्रा अवमूल्यन भी सोने की अधिक मांग का कारण बन रहे हैं. जब मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो कागजी मुद्रा का वास्तविक मूल्य गिर जाता है. सोना, सीमित आपूर्ति वाली एक मूर्त संपत्ति होने के कारण धन की रक्षा करने में सहयोग करता है. सोने की मांग में वृद्धि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण टैरिफ युद्ध है. ट्रंप द्वारा दुनियाभर पर टैरिफ थोपने के कारण विदेशी व्यापार क्षेत्र में असमंजस बना हुआ है. यह असमंजस भी सोने की मांग और कीमत बढ़ाने का काम कर रहा है. ट्रंप के पद ग्रहण करने के बाद सोने की कीमत 2,696 डॉलर प्रति औंस से बढ़ कर 3,673 डॉलर प्रति औंस (यानी 36.2 फीसदी) तक बढ़ गयी है. यानी जो स्थिति है, उसमें सोने की मांग थमने वाली नहीं है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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