हर्ष कक्कड़, मेजर जनरल (सेवानिवृत्त)
Defence Deal: पिछले साल के अंत में रक्षा मंत्री के नेतृत्व वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने 79,000 करोड़ रुपये की रक्षा खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दी. वित्त वर्ष 2025-26 के लिए रक्षा क्षेत्र के लिए बजट में 6.81 लाख करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे, जिनमें से 1.49 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत खर्च के लिए रखे गये थे. इस धनराशि का 75 प्रतिशत घरेलू उत्पादन के लिए रखा गया था, ताकि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को गति दी जा सके. रिपोर्टों के मुताबिक, वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही तक सरकार ने पूंजीगत खर्च के लिए आवंटित धनराशि का 80 फीसदी खर्च कर दिया, जो 1.2 लाख करोड़ रुपये बैठता है. ऐसे में, उम्मीद है कि वित्त वर्ष के खात्मे तक पूरी आवंटित धनराशि का इस्तेमाल हो जायेगा. यह अच्छी बात है, क्योंकि इससे पहले तक रक्षा मंत्रालय आवंटित धनराशि का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाता था. दरअसल सशस्त्र बलों की ओर से लगातार यह मांग की जाती रही थी कि उनकी जरूरतों के हिसाब से बजट में ऐसा प्रावधान किया जाये कि यदि उसका कुछ हिस्सा खर्च न हो पाये, तो उसे लौटाये बिना अगले बजट में जोड़ दिया जाये. उसकी वजह यह है कि रक्षा खरीद की प्रक्रिया लंबी होती है. जब सेना को हथियारों व उपकरणों की जरूरत होती है, तो उसका प्रस्ताव बनाकर भेजा जाता है, उसे मंजूरी मिलती है, उसकी जांच होती है, फिर रक्षा उत्पादों की आपूर्ति होती है.
सरकार ने रक्षा खरीद प्रक्रिया की अवधि कम करने के लिए नयी रक्षा खरीद नियमावली जारी की है, जो पिछले साल एक नवंबर से लागू हो चुकी है. इसका उद्देश्य रक्षा खरीद प्रक्रिया की अवधि को पांच-आठ साल से घटाकर दो साल करने का है. सरकार ने तत्काल आपातकालीन रक्षा खरीद के लिए 40,000 करोड़ रुपये के फंड का प्रावधान भी रखा है. इसके तहत रक्षा उत्पादों की खरीद के प्रस्ताव को 40 दिन में मंजूरी मिल जानी है और एक साल के अंदर इनकी आपूर्ति हो जानी है. इस प्रावधान के तहत रक्षा बल ड्रोन और गोला-बारूद की आसान खरीद कर सकते हैं, जो देश में ही उपलब्ध हैं. इसके अलावा सेना रक्षा बजट को बढ़ाकर जीडीपी के तीन प्रतिशत के आसपास करने की मांग करती आ रही है, ताकि नयी सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर सेना के आधुनिकीकरण के अभियान को अंजाम दिया जा सके. जबकि अभी रक्षा बजट जीडीपी का मात्र 1.9 प्रतिशत है.
बेशक सरकार एक बार में रक्षा बजट बढ़ाकर जीडीपी का तीन प्रतिशत नहीं कर सकती. उसे इसमें लगातार वृद्धि करनी चाहिए. लेकिन भारत चूंकि एक विकासशील देश है, ऐसे में, सरकार को बजट आवंटन में सामाजिक तथा कल्याणकारी योजनाओं तथा जनसंख्या की विकास जरूरतों का भी ध्यान रखना होगा. रक्षा खरीद की प्रक्रिया चूंकि धीमी होती है, लिहाजा अभी जिन रक्षा उत्पादों की खरीद का आदेश पारित किया जाता है, उनकी आपूर्ति में समय लग जाता है. उसमें भी जो रक्षा उपकरण आधुनिकतम और परिष्कृत होते हैं, उनकी उपलब्धता में उतना ही अधिक समय लगता है. जैसे एचएएल (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) हर साल तेजस लड़ाकू विमान का सीमित संख्या में ही उत्पादन कर पाती है. नौसेना के लिए राफेल की खरीद का आदेश पिछले साल दिया गया, पर नौसेना को वे राफेल 2028-29 में ही मिल पायेंगे. इसी तरह 31 एमक्यू 9बी प्रीडेटर ड्रोन के ऑर्डर पिछले साल जारी किये, पर इसकी पहली खेप 2029 तक ही मिल पायेगी. यह सिलसिला अगले कुछ वर्षों तक जारी रहेगा.
भविष्य की आवश्यकताओं के हिसाब से रक्षा उपकरणों की सूची बनाने के लिए व्यापक अध्ययन और विश्लेषण की जरूरत पड़ती है. ऐसा इसलिए, क्योंकि जिन रक्षा उपकरणों को सैन्य बेड़े में शामिल किया जाता है, उनका इस्तेमाल आगामी कई दशकों तक होता है. लड़ाकू विमानों, जहाजों और टैंकों को लगातार अपग्रेड किया जाता है, जिससे कि वे लंबे समय तक सेवा में बने रह सकें. ऐसे में, रक्षा खरीद प्रक्रिया में लिया गया कोई गलत फैसले का आर्थिक और सुरक्षा के मोर्चे पर होने वाला नुकसान बहुत ज्यादा हो सकता है. इसीलिए रक्षा खरीद प्रक्रिया में हड़बड़ी नहीं की जाती. युद्ध के बदलते स्वरूप के मद्देनजर भी सशस्त्र बल लगातार और हर स्तर पर तकनीक में बदलाव लाने की कोशिश करते हैं. भैरव बटालियन, रुद्र ब्रिगेड और शक्तिवान बटालियन के गठन के जरिये भी सेना ने युद्ध में बदलती तकनीकों पर निर्भरता बढ़ायी है. ड्रोन के इस्तेमाल में पारंगत ये नयी सैन्य इकाइयां नियमित सैन्य टुकड़ी के साथ संतुलन बनाते हुए ऑपरेशन को अंजाम देंगी, जिससे हमारी सैन्य मारक क्षमता बढ़ेगी.
ऐसी रिपोर्ट है कि सेना ने एक लाख ड्रोन ऑपरेटरों का पूल तैयार किया है. ताजा रक्षा खरीद को मिली मंजूरी में रूटीन रक्षा उत्पादों के अलावा अपग्रेड टी-90 टैंक, सटीक निशाने तक पहुंचने वाले हथियार, लंबी दूरी वाले रॉकेट और एंटी ड्रोन प्रणाली हैं. रक्षा बल की सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए तो इनकी आवश्यकता है ही, इनके जरिये दुश्मनों के ड्रोन हमलों से भी सुरक्षा सुनिश्चित होगी. ड्रोन, एंटी ड्रोन प्रणाली और लंबी दूरी तक मार करने वाले पिनाक मिसाइलों का उत्पादन स्थानीय स्तर पर होता है. जबकि युद्धक्षेत्र की बढ़ती चुनौतियों के मद्देनजर टैंकों को अपग्रेड करना पड़ता है. यूक्रेन युद्ध का भी सबक यही है कि रक्षा उत्पादों का आधुनिकीकरण और उन्हें नियमित तौर पर अपग्रेड करना जरूरी है.
नौसेना के लिए जिन रक्षा उत्पादों को मंजूरी मिली है, उनमें वार शिप और संचार प्रणाली तो हैं ही, अपनी निगरानी क्षमता मजबूत करने के लिए अमेरिका से दो एयरक्राफ्ट सिस्टम लीज पर लेने का प्रस्ताव भी शामिल है. जबकि वायुसेना के लिए मिसाइल, उन्नत सिमुलेटर्स और स्वचालित टेक ऑफ तथा लैंडिंग रिकॉर्डिंग सिस्टम की खरीद को मंजूरी मिली है. जिन मिसाइलों की खरीद होनी है, उनमें भारत-इस्राइल द्वारा मिलकर बनायी जाने वाली बराक मिसाइलें भी हैं. इन रक्षा उपकरणों की खरीद से सैन्य आधुनिकीकरण का लक्ष्य पूरा होगा. हमारे सशस्त्र बल आसन्न चुनौतियों के मद्देनजर धीरे-धीरे अपनी रक्षा क्षमता बढ़ा रहे हैं, क्योंकि उन्हें अंदेशा है कि ऑपरेशन सिंदूर 2.0 कभी भी शुरू हो सकता है और वैसी स्थिति में चीन पाकिस्तान की मदद करेगा. इसलिए सेना चाहती है कि रक्षा जरूरतों के लिए न सिर्फ पर्याप्त बजट हो, उपकरणों की उपलब्धता में भी अधिक समय न लगे. इस संदर्भ में रक्षा उत्पादन करनेवाली देश की सार्वजनिक कंपनियों को भी समय पर रक्षा उत्पादों की आपूर्ति करनी होगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

