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बिजली का बकाया

Updated at : 01 Aug 2022 8:11 AM (IST)
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बिजली का बकाया

दुनियाभर में ऊर्जा के तमाम स्रोत बहुत महंगे हैं. ऐसे में 2.3 लाख करोड़ रुपये जैसी बड़ी रकम की उधारी न तो राज्यों के हित में है, न ही कंपनियों के.

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देश के कई राज्यों पर बिजली उत्पादक कंपनियों का एक लाख करोड़ रुपये से अधिक तथा वितरण कंपनियों का लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपये का भारी बकाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य सरकारों से ये राशि चुकाने को कहा है ताकि इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति खराब न हो. उत्पादक कंपनियों का सबसे अधिक बकाया महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान पर तथा वितरण कंपनियों का सर्वाधिक उधार राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ पर है.

इस बकाये के अलावा राज्य सरकारों को विभिन्न कार्यक्रमों के तहत दिये जा रहे अनुदान के 76.34 हजार करोड़ रुपये का भुगतान करना है. उल्लेखनीय है कि हाल ही में कोयले की कमी से पैदा हुए बिजली संकट के कारण भी इन कंपनियों पर वित्तीय दबाव है. कई महीनों तक बिजली का पैसा नहीं चुकाने से कंपनियों के राजस्व में तो कमी होती ही है, राज्यों पर भी बोझ बढ़ता जाता है. इससे यह भी इंगित होता है कि राज्य सरकारों के वितरण और प्रबंधन में खामियां हैं.

अगर बिजली जैसी बुनियादी चीज को लेकर राज्यों का यह रवैया है, तो अन्य क्षेत्रों की स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. यदि कंपनियों को समय पर भुगतान होता रहे, तो वे हासिल धन को इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर करने में लगा सकती हैं ताकि वितरण में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके. ध्यान रहे, हमारे देश में बिजली को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की प्रक्रिया में 20 फीसदी से अधिक बिजली बर्बाद हो जाती है.

विकसित देशों में यह आंकड़ा पांच से आठ फीसदी ही है. वैसे भी हमारे देश में मांग की तुलना में बिजली का उत्पादन और उसकी आपूर्ति कम है. कंपनियों के पास पैसा नहीं होता है, तो उत्पादन भी कम होता है, जिससे औद्योगिक व कारोबारी गतिविधियों के साथ सामान्य जन-जीवन पर भी असर पड़ता है. हाल में गर्मी के दिनों में अनेक राज्यों में लगातार बिजली कटौती को लोग भूले नहीं हैं. हमारे अधिकतर विद्युत संयंत्र कोयले से चलते हैं और अभी बड़ी मात्रा में कोयला आयात भी करना पड़ रहा है.

दुनियाभर में ऊर्जा के तमाम स्रोत बहुत महंगे हैं. ऐसे में 2.3 लाख करोड़ रुपये जैसी बड़ी रकम की उधारी न तो राज्यों के हित में है, न ही कंपनियों के. इसका खामियाजा भी आखिरकार लोगों को ही भुगतना पड़ेगा और देश के विकास में भी अवरोध उत्पन्न होगा. सबसे अहम तो यह है कि राज्यों को यह नौबत ही नहीं आने देनी चाहिए थी कि उनसे प्रधानमंत्री को आग्रह करना पड़े.

विद्युत क्षेत्र की समस्याओं के समाधान की दिशा में बड़ी पहल करते हुए केंद्र सरकार ने तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि का एक कार्यक्रम शुरू किया है, जिसके तहत हर स्तर पर तकनीक में बेहतरी के उपाय होंगे. आशा है कि केंद्र व राज्य सरकारों तथा बिजली कंपनियों के परस्पर सहयोग से भारत ऊर्जा सक्षम राष्ट्र बन जायेगा.

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