अल नीनो से निपटने की व्यापक तैयारी हो

Author Prabhat Khabar|Edited by System
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अल नीनो से निपटने की व्यापक तैयारी हो

el nino effect : कमजोर माॅनसून की 60 फीसदी आशंका है, जिसका मतलब है कि कई क्षेत्रों में सामान्य से बहुत अधिक शुष्क परिस्थितियां या सूखा पड़ सकता है. इसे पिछले 26 वर्षों में सबसे कमजोर प्रारंभिक माॅनसून पूर्वानुमानों में से एक माना जा रहा है.

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El Nino Effect : वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस साल का अल नीनो अब तक दर्ज सबसे मजबूत घटनाओं में से एक हो सकता है, जिसे अक्सर ‘सुपर’ अल नीनो कहा जाता है. इस बार का अल नीनो ऐसे ग्रह पर विकसित हो रहा है, जो कुछ दशक पहले की तुलना में काफी अधिक गर्म है. भारत में अल नीनो के ताप प्रभाव पहले से ही दर्ज हैं. केवल 2024 में ही, भारतीय कृषि श्रमिकों ने औसतन 648 घंटे, यानी 54 पूरे कार्यदिवस, ऐसी गर्मी के कारण खो दिये.

इस बीच, भारतीय मौसम विभाग (आइएमडी) ने दक्षिण-पश्चिम माॅनसून के दौरान दीर्घकालिक औसत के 90 फीसदी के बराबर सामान्य से कम वर्षा का अनुमान लगाया है. कमजोर माॅनसून की 60 फीसदी आशंका है, जिसका मतलब है कि कई क्षेत्रों में सामान्य से बहुत अधिक शुष्क परिस्थितियां या सूखा पड़ सकता है. इसे पिछले 26 वर्षों में सबसे कमजोर प्रारंभिक माॅनसून पूर्वानुमानों में से एक माना जा रहा है. और इसके प्रभाव दिखाई दे रहे हैं : 27 जून तक देश में 42 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गयी है. इसके व्यापक परिणाम हो सकते हैं-फसल विफलता या सामान्य से कम खाद्य उत्पादन, आपूर्ति में कमी और खाद्य मुद्रास्फीति. रिजर्व बैंक ने अल नीनो को मुद्रास्फीति के लिए बड़ा जोखिम बताते हुए कहा है कि इससे खाद्य कीमतों में तेज वृद्धि हो सकती है.


संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने हाल ही में भारत को उन देशों में शामिल किया है, जो कृषि सूखे के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं. देश के बड़े हिस्से पहले से सूखे की चपेट में हैं. आइआइटी, गांधीनगर द्वारा संचालित नेशनल ड्रॉट मॉनिटर के अनुसार, 24 जून तक देश के कुल क्षेत्रफल का 37.1 फीसदी हिस्सा सूखे या सूखा-समान परिस्थितियों में था. यह आंकड़ा एक सप्ताह पहले 24.8 फीसदी और एक महीना पहले 20.1 फीसदी था. यानी शुष्क परिस्थितियां तेजी से फैल रही हैं. देश का पश्चिमी हिस्सा, जिसमें महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के कुछ हिस्से शामिल हैं, सबसे अधिक प्रभावित हैं, जहां 81 प्रतिशत क्षेत्र सूखे में हैं. मध्य भारत 51 प्रतिशत, पूर्वोत्तर 62 प्रतिशत और उत्तर 41 प्रतिशत पर है. केवल उत्तर-पश्चिम और दक्षिण अभी तक अधिकांशतः सामान्य हैं, हालांकि वहां भी कुछ स्थानों पर शुष्कता बढ़ रही है.

इससे पहले 30 मई से पांच जून के सप्ताह के लिए उपग्रह आधारित मिट्टी की नमी के आंकड़ों में कई क्षेत्रों में शुरुआती तनाव के संकेत दिखे थे. मिट्टी की नमी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताती है कि बीज अंकुरण और फसल वृद्धि के लिए पर्याप्त पानी है या नहीं. ओडिशा, छत्तीसगढ़, हरियाणा, दक्षिण कर्नाटक, पश्चिम महाराष्ट्र, दक्षिण पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों और पूर्वोत्तर के कई जिलों में 10 साल के औसत से कम नमी दर्ज की गयी है. यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के कुल बोये गये क्षेत्र का लगभग 55-60 प्रतिशत अब भी वर्षा आधारित है. आइएमडी के अनुसार, दो जुलाई को समाप्त होने वाले सप्ताह तक भी वर्षा कमजोर रहने की आशंका है.


भारत इस समय खरीफ बुवाई के मौसम के बीच में है, जो देश के करीब आधे वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन का योगदान देता है. इस अवधि में देरी या असमान वर्षा ने देश के कई हिस्सों में किसानों के बुवाई निर्णयों और फसल चयन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. चावल, दालें, तिलहन, मक्का और कपास खरीफ फसलें हैं, जो ग्रामीण आय का आधार हैं. जब मॉनसून कमजोर होता है, तब सबसे अधिक असर इन्हीं फसलों और इनके उत्पादकों पर पड़ता है. सुपर अल नीनो की चेतावनी और पहले से कम वर्षा ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है. सरकार ने देशभर में 111 जिलों को उच्च जोखिम और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया है. इन जिलों में दो कमजोरियां एक साथ मौजूद हैं-आइएमडी द्वारा पहले से अनुमानित कमजोर माॅनसून तथा 25 फीसदी से कम सिंचाई कवरेज. इनमें से अधिकांश जिले 12 राज्यों में स्थित हैं : मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा. नुकसान केवल इस सीजन तक सीमित नहीं रह सकता. यदि वर्षा की कमी जारी रहती है, तो इसका असर रबी सीजन तक जा सकता है, जो मुख्य रूप से जलाशयों और भूजल पर निर्भर करता है.

लगातार वर्षा की कमी जलाशयों और मिट्टी की नमी को अगले फसल चक्र तक प्रभावित कर सकती है. यह समय भारत के दाल और तिलहन मिशनों के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है. इन फसलों का करीब 90 फीसदी क्षेत्र वर्षा आधारित है. हालांकि मजबूत अल नीनो का मतलब हमेशा कृषि आपदा नहीं होता. वर्ष 2002 में, मध्यम अल नीनो के कारण राष्ट्रीय वर्षा में 20 फीसदी की कमी आयी और खाद्यान्न उत्पादन करीब 1.8 करोड़ टन घट गया. वर्ष 2015 में मजबूत अल नीनो के बावजूद वर्षा 14 फीसदी घट गयी, पर राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य उत्पादन में बड़ी गिरावट नहीं आयी. भारत ने हाल के वर्षों में रिकॉर्ड कृषि उत्पादन देखा है. पर मजबूत अल नीनो स्थानीय स्तर पर संकट पैदा कर सकता है.


अल नीनो से निपटने की आकस्मिक योजनाओं में प्रत्येक जिले की सिंचाई क्षमता, मिट्टी का प्रकार, फसल पैटर्न और भूजल उपलब्धता का विवरण होना चाहिए. किसानों के लिए चरणबद्ध उपाय भी होने चाहिए. जैसे, यदि अगस्त में बारिश विफल हो जाये, जो खरीफ फसलों के लिए सबसे महत्वपूर्ण महीना है, तो क्या किया जाये, किन वैकल्पिक फसलों की ओर रुख किया जाये और यदि घरेलू आपूर्ति कम हो, तो आयात कहां से किया जाये.

इसका एक समाधान मोटे अनाज में भी है, जो कठोर, सूखा-सहनशील और पोषक होते हैं. लेकिन जलवायु-लचीली फसलों की ओर बदलाव केवल किसानों पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि उनमें से कई पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर हैं. सरकार को इन फसलों के बीज वितरित करने, उचित मूल्य प्रोत्साहन देने और किसानों को बाजार जोखिम से बचाने की जरूरत है.भारत की कृषि ने दशकों में काफी प्रगति की है-सिंचाई का विस्तार हुआ है, भंडार रिकॉर्ड स्तर पर हैं और आकस्मिक योजना भी मौजूद है. पर सुधार का मतलब यह नहीं कि प्रणाली पूरी तरह लचीली है. यह एक महत्वपूर्ण वर्ष है और आने वाले महीनों में लिये गये निर्णय यह तय करेंगे कि भारत वास्तव में कितना सक्षम और लचीला है.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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