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जरूरी है जेल की दुनिया को समझना

Updated at : 11 Jan 2021 7:24 AM (IST)
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जरूरी है जेल की दुनिया को समझना

जरूरी है जेल की दुनिया को समझना

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डॉ वर्तिका नंदा

जेल सुधारक

vartikalsr@gmail.com

इक्कीस लोगों- 16 पुरुष और पांच महिलाओं- की एक टीम है, जो इतिहास रचने की प्रक्रिया में है. ये बंदी हरियाणा की तीन अलग-अलग जेलों में सजा काट रहे हैं. इन सबको जेल रेडियो के लिए चुना गया है और बीते दिसंबर से इन्हें प्रशिक्षण दिया जा रहा है. इस तरह हरियाणा की जेलों के पहले जेल रेडियो के लिए पन्ने जुड़ने शुरू हुए. जुलाई, 2013 में मुझे दिल्ली की तिहाड़ जेल के रेडियो की शुरुआत का साक्षी बनने का मौका मिला था.

भारत में जेल रेडियो की शुरुआत दक्षिण एशिया के इस सबसे बड़े जेल परिसर से ही हुई थी. वहां बंदियों से बात करते हुए मैंने उस दिन सोचा था कि इस कोशिश को अपने कर्म और चिंतन का एक हिस्सा बनाऊं और वैसा हुआ भी.

साल 2019 में भारत की सबसे पुरानी जेल इमारत में चल रही आगरा जिला जेल आगरा को मैंने तिनका तिनका प्रिजन रेडियो मॉडल के लिए चुना. तब वहां करीब 2700 बंदी थे. पहली मुलाकात में जब बंदियों से पूछा गया कि क्या वे जेल रेडियो का हिस्सा बनना चाहेंगे, तो गिनती के कुछ बंदी ही सामने आये. उस समय इन बंदियों को इस बात का इल्म तक नहीं था कि कोरोना के दौर में यही जेल रेडियो जेल में उनका सबसे बड़ा सहारा बननेवाला है.

जेल का यह रेडियो महिला और पुरुष बैरक के बीच के एक हिस्से में है. यह पहले जेल के चीफ हेड वार्डर का कमरा होता था. बाद में इसे जेल रेडियो बना दिया गया. कई महीनों की मेहनत के बाद आखिरकार जुलाई 31, 2019 को जब इस जेल रेडियो की शुरुआत हुई, तो उत्साह देखने लायक था.

इसकी दीवार को अरबाज और सतीश ने बनाया. इसका रंग ठीक वही था, जो तिनका तिनका ने कुछ और जेलों की दीवारों में बनवाया है. उसी दौरान मुझे एक बंदी ने बताया कि वह कुछ दिन पहले आत्महत्या की कोशिश कर चुका है, लेकिन जेल के रेडियो की प्रक्रिया से जुड़ने से उसके अवसाद में कमी आयी है. रेडियो शुरू हुआ और सपनों ने पंख लेने शुरू किये.

महिला बैरक से हर रोज एक महिला बंदी आकर यहां पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगी, पुरुष जेल से एक युवक. देश की किसी जेल में शायद पहली बार ऐसा हुआ कि कोई रेडियो जॉकी महिला थी और वह नियमित तौर पर प्रसारण से जुड़ी थी. इस पूरी मुहिम में जेल अधीक्षक शशिकांत मिश्रा और उनकी टीम का भरपूर सहयोग मिला. जेल सृजनस्थली का स्वरूप लेने लगा.

इस कड़ी में दूसरी पहल थी- हरियाणा की जेलें. अक्टूबर महीने में प्रक्रिया शुरू हुई और दिसंबर में ऑडिशन हुआ. तीनों जेलों के करीब 60 बंदियों ने आवेदन दिया. ऑडिशन वाले दिन जबरदस्त उत्साह था. राज्य के जेलों के महानिदेशक के सेल्वाराज पूरी तल्लीनता से इस प्रक्रिया मे शामिल रहे. जेलों के अधीक्षक- जयकिशन छिल्लर, लखबीर सिंह बरार और देवी दयाल- भी वहां मौजूद रहे.

ऑडिशन के दौरान कुछ बंदियों ने कहा कि उन्हें ठीक से बोलना नहीं आता, लेकिन वे बोलना सीखने चाहते हैं. किसी बंदी ने इससे पहले रेडियो का हिस्सा बनने का सपना तक नहीं देखा था, लेकिन अब उनके सामने एक सुंदर हकीकत थी.

दिसंबर, 2020 के अंतिम दिनों में ट्रेनिंग वर्कशॉप में नियत समय से ज्यादा समय तक काम चला. उन्हें बताया गया कि वे इस जेल रेडियो के उत्पादक भी खुद है और उपभोक्ता भी. इस लिहाज से यह रेडियो पूरी तरह से उनका अपना है. इन पांच दिनों में हैरान करनेवाले नतीजे सामने आये. महिलाएं खुलकर बातें करने लगीं. उनके पास लिखने को और कहने को बहुत कुछ था.

तीनो जेलों ने भरपूर उत्साह के साथ जेल रेडियो का सिग्नेचर ट्यून बनाया और परिचय गान भी. आखिरी दिन फरीदाबाद जेल के बंदियों से मुलाकात हुई और वहां के सभी दस बंदियों ने बड़े जोश से बताया कि वे इस रेडियो के लिए क्या करना चाहेंगे. अब सभी ट्रेनी बंदी एक-दूसरे को आरजे (रेडियो जॉकी) कहते हैं और सृजन में मशगूल रहते हैं. बैरक से दिखते आसमान के टुकड़े में चमक दिखने लगी है. शिकायतें घटी हैं, सद्भाव बढ़ा है.

बाहर की दुनिया को शायद बरसों यह समझने में लगेंगे कि जेल की एक अलग दुनिया है. जेल को संसार की बनी-बनायी कसौटियों पर कसा नहीं जा सकता. बीते सालों में बहुत से लोगों ने मुझसे कहा कि वे जेल के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर कुछ करने में कहीं से पूंजी पाने की एक लालसा दिखी.

जेल कुछ दे नहीं सकतीं, आर्थिक तौर पर तो बिल्कुल नहीं, लेकिन मानसिक और आध्यात्मिक तौर पर बहुत कुछ देती हैं, जिसको मापना बाहरी दुनिया के बस में अक्सर होता ही नहीं. कोरोना में अपनी निजी परेशानियों से जूझ रहे लोगों के लिए नये साल के जश्न के बीच में यह सोचना भी गवारा नहीं था कि जेल में कुछ लोग ऐसे हैं, जिनकी परवाह किसी को नहीं है.

बहरहाल, इन बंदियों ने जेल रेडियो में अपना आसरा ढूंढ लिया है. उनके पास अपना रेडियो होगा, तो अपनी उम्मीदें भी होंगी. जेलों में इंद्रधनुष बनाने की एक तिनका कोशिश भर ने संभावनाओं के कई पिटारे खोल दिया है. कौन जानता है, ये 21 बंदी कभी जेल और कैदी होने के बजाय, अपनी आवाज से ही पहचाने जाने लगें! क्या पता उजली नीयत से उपजा जेल का यह जादुई रेडियो खुशी की किसी बंद गुफा की चाबी समेटे हो.

Posted By : Sameer Oraon

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डॉ वर्तिका

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By डॉ वर्तिका

डॉ वर्तिका is a contributor at Prabhat Khabar.

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