महंगाई और विकास दर में संतुलन की कोशिश

महंगाई और विकास दर
Inflation and Growth Rates : दुनियाभर में आर्थिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर लगातार दबाव बना हुआ है, जिस कारण सतर्कता बरतनी आवश्यक है.
Inflation and Growth Rates : महंगाई को चार प्रतिशत के लक्ष्य पर स्थिर रखने की प्रतिबद्धता, खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव और अनिश्चित वैश्विक आर्थिक माहौल के कारण तथा विकास की गति बनाये रखने के लिए सतर्क रुख अपनाते हुए रिजर्व बैंक ने छह फरवरी को नीतिगत ब्याज दर को 5.25 प्रतिशत के स्तर पर अपरिवर्तित रखा. रिजर्व बैंक का प्राथमिक लक्ष्य महंगाई को नियंत्रित करना है. अस्तु, खाद्य पदार्थों की कीमतों में अनिश्चितता के कारण रिजर्व बैंक ने फिलहाल दरों को कम न करने का निर्णय लिया, ताकि महंगाई और न बढ़े.
दुनियाभर में आर्थिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर लगातार दबाव बना हुआ है, जिस कारण सतर्कता बरतनी आवश्यक है. डॉलर के मुकाबले रुपये की अस्थिरता और बॉन्ड यील्ड के दबाव के कारण भी केंद्रीय बैंक ने रेपो दर में कटौती करने से गुरेज किया.
दिसंबर, 2025 में रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की कटौती की थी, जिससे यह मौजूदा स्तर पर आ गया. वैसे 2025 की शुरुआत से रिजर्व बैंक नीतिगत दरों में 125 आधार अंकों की कटौती कर चुका है, पर अभी तक बैंकों ने इस कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों को नहीं दिया है, क्योंकि अभी भी नये ऋणों में आधार अंकों की कटौती करना शेष है. इसलिए रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत दरों को यथावत रखने के बाद भी उधारी दरों में कटौती की गुंजाइश बनी हुई है.
हालांकि, नीतिगत दरों में कटौती न करने के बावजूद जरूरत पड़ने पर रिजर्व बैंक नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में कटौती कर और ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ) के जरिये बैंकिंग प्रणाली की तरलता बढ़ा सकता है. उल्लेखनीय है कि केंद्रीय बैंक 29 जनवरी को हुई नीलामी सहित ओएमओ के माध्यम से रिजर्व बैंक बैंकिंग प्रणाली में लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये डाल चुका है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की गति अच्छी है. केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक समीक्षा के दौरान वित्त वर्ष 2026 के लिए सकल घरेलू उत्पाद के वृद्धि अनुमान को 7.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया, जबकि वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में इसके 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो इसके पहले 6.7 प्रतिशत था. वहीं, वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में जीडीपी के सात प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पहले 6.8 प्रतिशत था. इसके अतिरिक्त, हाल ही में अमेरिकी सरकार ने टैरिफ को 50 से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है, जिससे निर्यात में वृद्धि, आर्थिक गतिविधियों में तेजी, व्यापार घाटे में कमी आने, विदेशी मुद्रा में बढ़ोतरी आदि होने की उम्मीद है, जिससे अर्थव्यवस्था में मजबूती आयेगी.
रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026 के दौरान महंगाई के 2.1 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पहले दो प्रतिशत था. वहीं वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में इसके 3.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पहले 2.9 प्रतिशत था. वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के दौरान महंगाई के चार प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पहले 3.9 प्रतिशत था. वहीं, वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में महंगाई के 4.2 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पहले चार प्रतिशत था.
विदित हो कि महंगाई के कारण लोगों की क्रय शक्ति में कमी, जीवन यापन की लागत में वृद्धि, और बचत के वास्तविक मूल्य में गिरावट आती है. इसका गरीबों पर सर्वाधिक असर पड़ता है. यह आर्थिक विकास को भी बाधित करती है और कंपनियों के मुनाफे को भी कम करती है. महंगाई दर के जमा दर से अधिक होने पर बैंक में जमा पैसों की वास्तविक कीमत घट जाती है और भविष्य के लिए जमा की गयी पूंजी कम हो सकती है. भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी, 2026 में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की ऋण वृद्धि दर धीमी होकर वर्ष दर वर्ष के आधार पर 13.1 प्रतिशत रह गयी, जो दिसंबर, 2025 में 14.5 प्रतिशत थी. वहीं, पांच जनवरी को समाप्त हुए पखवाड़े तक जमा वृद्धि दर कम होकर वर्ष दर वर्ष के आधार पर 10.6 प्रतिशत रह गयी. इस तरह, इस अवधि में बैंक जमा में लगभग तीन लाख, 57 हजार करोड़ रुपये की कमी आयी, जिससे क्रेडिट डिपॉजिट (सीडी) अनुपात रिकॉर्ड 82.2 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंच गया. इस वजह से फिलवक्त, बैंक तरलता की कमी का सामना कर रहे हैं और उन्हें जरूरतमंदों को ऋण देने में मुश्किलें आ रही हैं.
निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि महंगाई आमजन और विकास की राह में एक बड़ी बाधा है. चूंकि आगामी महीनों में इसमें तेजी आने की आशंका है. इसलिए रिजर्व बैंक ने सतर्कता बरतते हुए रेपो दर को यथावत रखा है. बैंक जमा में लगातार कमी आने के कारण मौजूदा समय में बैंक पूंजी की भारी कमी का सामना कर रहे हैं, जिससे ऋण वृद्धि दर में भी कमी आयी है. अभी भले ही केंद्रीय बैंक ने रेपो दर में कटौती नहीं की है, पर दूसरे विकल्पों, यानी सीआरआर और ओएमओ के जरिये वह बैंकिंग प्रणाली में तरलता बढ़ा सकता है. साथ ही, अभी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है. इसलिए महंगाई और विकास दर के बीच संतुलन बनाकर रखा जा सकता है. इस दृष्टिकोण से, रिजर्व बैंक के रेपो दर को यथावत रखने के निर्णय को पूरी तरह सही कहा जा सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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