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खेलों के प्रति बदले रवैया

अगर हमें खेलों में आगे आना है और पदक जीतने हैं, तो वक्त आ गया है कि खेलों के अनुकूल वातावरण बने और एक रोडमैप तैयार हो.

By आशुतोष चतुर्वेदी
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खेलों के प्रति बदले रवैया
खेलों के प्रति बदले रवैया
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किसी भी खिलाड़ी के लिए ओलिंपिक में हिस्सा लेना ही बड़ी उपलब्धि होती है. पदक जीतना तो किसी सपने के साकार होने जैसा होता है. नीरज चोपड़ा ने तोक्यो ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीत कर भारत का मान ऊंचा किया है. इस आयोजन में स्वर्ण पदक जीतनेवाले वे एकमात्र भारतीय खिलाड़ी हैं. इस जीत के साथ ही भारत के इस ओलिंपिक में सात पदक हो गये हैं, जो किसी ओलिंपिक खेल में सबसे अधिक पदक जीतने का भारत का नया रिकॉर्ड है.

नीरज ओलिंपिक के व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत के लिए गोल्ड जीतनेवाले दूसरे खिलाड़ी बन गये हैं. उनसे पहले अभिनव बिंद्रा ने 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में 10 मीटर राइफल शूटिंग में स्वर्ण जीता था. हरियाणा के पानीपत के एक छोटे से गांव से आनेवाले नीरज सेना में सूबेदार हैं. उन्होंने 2016 में पोलैंड में जूनियर खिलाड़ियों की प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था. राष्ट्रमंडल खेलों में और 2018 के एशियाई खेलों में भी उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था.

हालांकि भारतीय महिला हॉकी टीम कांस्य पदक तो हासिल नहीं कर सकी, लेकिन उन्होंने जिस जज्बे से ब्रिटेन की मजबूत टीम से मुकाबला किया, वह सराहनीय है. मीराबाई चानू ने रजत पदक जीत कर भारोत्तोलन स्पर्धा में भारत को 21 वर्षों बाद कोई पदक दिलाया. भारोत्तोलन में पदक जीतनेवाली वे भारत की दूसरी महिला हैं. इससे पहले 2000 के सिडनी ओलिंपिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीता था. वेटलिफ्टिंग ताकत का खेल हैं.

इसमें बहुत पौष्टिक आहार चाहिए, जबकि चानू का जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा. ओलिंपिक खेलों में गांव व छोटे शहरों से आये खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन कर देश का गौरव बढ़ाया है. इसमें उनकी निजी कोशिशों का योगदान कहीं ज्यादा अहम हैं. आम धारणा यह है कि खेलों में सुविधाओं के कारण समृद्ध देशों का प्रदर्शन बेहतर रहता है. इसके उलट गांव-देहात से और कमजोर पृष्ठभूमि से निकले हमारे खिलाड़ी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं.

मसलन, महिला हॉकी टीम में झारखंड की भी दो बेटियां- डिफेंडर निक्की प्रधान और मिडफील्डर सलीमा टेटे- खेलीं. ये दोनों काफी संघर्ष के बाद भारतीय टीम में जगह बना सकीं. निक्की प्रधान आदिवासी बहुल जिले खूंटी के हेसल गांव से हैं. उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि मजबूत नहीं है. सलीमा टेटे सिमडेगा जिले से हैं. उनका भी सफर आसान नहीं रहा है. पहलवान रवि दहिया हरियाणा के सोनीपत के नाहरी गांव से हैं.

डिस्कस थ्रो की खिलाड़ी कमलप्रीत पंजाब के मुक्तसर के एक गांव की रहनेवाली हैं. मुक्केबाज लवलीना असम के गोलाघाट जनपद के बरो मुखिया गांव से हैं. पैदल चाल में हिस्सा लेनेवाली मेरठ की प्रियंका गोस्वामी के पिता यूपी रोडवेज में परिचालक थे. खबरों के अनुसार लंबे समय तक प्रियंका एक समय का खाना गुरुद्वारे के लंगर में खाती थीं. पंजाब के लुधियाना जिले के एक गांव से निकली मुक्केबाज सिमरनजीत कौर की मां जीविकोपार्जन के लिए छोटे-मोटे काम करती थीं और पिता एक मामूली नौकरी में थे. इसके बावजूद सिमरनजीत ने कड़ी मेहनत कर ओलिंपिक टीम में जगह बनायी.

अगर हमें खेलों में आगे आना है और पदक जीतने हैं, तो वक्त आ गया है कि खेलों के अनुकूल वातावरण बने और एक रोडमैप तैयार हो. खेल के नाम पर हम ढांचा तो तैयार कर लेते हैं, लेकिन उसके रखरखाव की पर्याप्त व्यवस्था नहीं की जाती है. ज्यादातर राज्यों में खिलाड़ियों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था नहीं होती है और न ही राज्य स्तरीय अथवा अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं का लगातार आयोजन होता है.

भारतीय महिला और पुरुष हॉकी टीमों को ही लें. वे पहले हाफ में शानदार खेल का प्रदर्शन करती थीं, लेकिन दूसरे हाफ में वे दमखम के मामले में यूरोपीय खिलाड़ियों से पिछड़ जाती थीं. हॉकी देश का राष्ट्रीय खेल है और हॉकी व कुश्ती की पहचान भारत से हैं. लेकिन हॉकी में पदक जीतने में देश को 41 साल लग गये.

इस प्रक्रिया में आम देशवासी की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. माता-पिता को बच्चों को खेलों के प्रति प्रोत्साहित करना होगा, अन्यथा वे मोबाइल में लगे रहेंगे और आप इसका रोना रोते रहेंगे. खेलों के प्रति प्रोत्साहन में स्कूल व कॉलेजों की बड़ी भूमिका है. होता यह है कि स्कूलों में खेल का पीरियड तो होता है, लेकिन उसमें कोई खेल नहीं होता है. एक बला की तरह उसे टाल दिया जाता है.

हिंदीभाषी राज्यों में तो स्थिति बेहद खराब है. सबसे बड़ी आबादी वाला उत्तर प्रदेश हो अथवा बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़, देश की इतनी बड़ी आबादी से ओलिंपिक खेलों के लिए कोई खिलाड़ी ही नहीं निकल रहे हैं. हरियाणा से जरूर कुश्ती में अनेक खिलाड़ी सामने आ रहे हैं. झारखंड में तीरंदाजी, हॉकी और फुटबॉल खेली जाती है, लेकिन ओलिंपिक महिला हॉकी में केवल दो खिलाड़ी खेली हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लड़कों की कोई भागीदारी नहीं है.

देश की आबादी में आधी फीसदी से भी कम हिस्सेदारी रखनेवाला मणिपुर अब तक लगभग एक दर्जन ओलिंपिक स्तर के खिलाड़ी तैयार कर चुका है. तोक्यो ओलिंपिक में मणिपुर के छह खिलाड़ियों- मेरी कॉम (बॉक्सिंग), सुशीला चानू (हॉकी), एस नीलकांता (हॉकी), मीराबाई चानू (भारोत्तोलन), देवेंद्रो सिंह (बॉक्सिंग) और एल सुशीला देवी (जूडो)- ने हिस्सा लिया.

राष्ट्रीय खेलों में भी मणिपुर के खिलाड़ी दमदार उपस्थिति दर्ज कराते हैं. ओडिशा सरकार ने हॉकी को बढ़ावा देने में बड़ा योगदान दिया है. ओडिशा 2023 में होनेवाले पुरुष हॉकी विश्वकप की मेजबानी भी करेगा. स्थानीय प्रतिभाओं को निखारने के लिए एस्ट्रोटर्फ मैदान तैयार करने के साथ राउरकेला में अंतरराष्ट्रीय स्तर का हॉकी स्टेडियम भी बन रहा है.

यदि हर राज्य केवल एक खेल को बढ़ावा देने लगे, तो देश में खेलों के स्तर में बहुत सुधार आ सकता है, लेकिन हम भारतीयों की दिक्कत यह है कि हम खेलों में क्रिकेट के आगे कभी सोचते ही नहीं हैं. यह सही है कि क्रिकेट की उपब्धियों पर हम गर्व करें. मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं क्रिकेट के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन यह तथ्य हमारी शर्मिंदगी को कम नहीं कर सकता कि हम अन्य खेलों में कहीं नहीं ठहरते हैं. आजकल इंग्लैंड के साथ टेस्ट सीरीज चल रही है और आपको अपने आसपास ऐसे लोग बड़ी संख्या में मिल जायेंगे, जो मैच का आंखों देखा हाल सुना देंगे और हार-जीत का विश्लेषण भी कर देंगे, लेकिन अन्य खेलों के जानकार बेहद सीमित संख्या में मिलेंगे. यही वजह है कि सवा अरब से अधिक आबादी का देश ओलिंपिक में केवल सात पदक जीत पाता है.

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