दक्षिण में राजनीतिक दबाव

Updated at : 23 May 2017 6:10 AM (IST)
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दक्षिण में राजनीतिक दबाव

आर राजगोपालन राजनीतिक विश्लेषक राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भारत की हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में दक्षिण भारत की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर आकर खड़ी है. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम, वाइएसआर कांग्रेस तथा तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा के उम्मीदवार को अपने समर्थन का वादा कर […]

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आर राजगोपालन
राजनीतिक विश्लेषक
राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भारत की हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में दक्षिण भारत की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर आकर खड़ी है. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम, वाइएसआर कांग्रेस तथा तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा के उम्मीदवार को अपने समर्थन का वादा कर दिया है. दूसरी ओर, दक्षिण भारत की राजनीति का एक संजीदा पहलू भी है. पी चिदंबरम के पुत्र पर संकट के बादल घिर आये हैं. एआइएडीएमके के दो परस्पर विरोधी धड़े नरेंद्र मोदी एवं भाजपा सरकार को अपना समर्थन प्रदान करने की स्पर्धा कर रहे हैं. कर्नाटक में, जहां भारतीय जनता पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करती जा रही है, वहीं कांग्रेस पूरी तरह कमजोर बन कर इस परिदृश्य से बाहर होती दिखती है.
इस सप्ताह दक्षिण में तेलंगाना के संदर्भ में एक दिलचस्प राजनीतिक घटना हुई. केंद्रीय रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने सिकंदराबाद में रक्षा मंत्रालय के अधिकार में स्थित 60 एकड़ जमीन तेलंगाना सरकार को सौंपने के एक प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति दे दी, ताकि वह उसमें अपने लिए नये सचिवालय भवन का निर्माण करा सके. रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने रक्षा सचिव को इसकी प्रक्रिया शीघ्र निबटाने को कहा, क्योंकि इसके लिए मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से किया गया अनुरोध पिछले एक वर्ष से लंबित रहा है.
ऐसा समझा जाता है कि जेटली एक पत्र द्वारा केसीआर को केंद्र के इस निर्णय से अवगत कराते हुए उनके समक्ष कुछ शर्तें भी रखेंगे, क्योंकि रक्षा मंत्रालय की जमीन राज्य सरकारों को हस्तांतरित करने में कानूनी पहलू भी निहित होते हैं. अब संभावना यह है कि यह प्रक्रिया पूरी होने में तकरीबन छह महीने लग जायेंगे.
यह जानना दिलचस्प होगा कि मोदी ने किस तरह आंध्र तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों को भाजपा के राष्ट्रपति उम्मीदवार के समर्थन हेतु तैयार होने पर मजबूर कर दिया. दोनों राज्यों के बंटवारे के बाद पिछले चार वर्षों के दौरान दोनों की राजधानियों और सचिवालय भवनों के निर्माण के संबंध में बिलकुल चुप्पी सी छायी थी.
चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र की राजधानी के लिए अमरावती का चयन किया, जबकि केसीआर को राजधानी के लिए हैदराबाद तो मिल गया, पर उसके सचिवालय के लिए उन्हें उपयुक्त जगह उपलब्ध नहीं थी, जबकि रक्षा मंत्रालय के पास सैन्यकर्मियों की निशानेबाजी के अभ्यास के लिए एक विशाल भूभाग उपलब्ध था, जहां उन्हें अभी भी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है. केसीआर ने रक्षा मंत्रालय का यह भूभाग प्राप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी को एक प्रस्ताव सौंपा, जो पिछले तीन वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा था.
वर्तमान समय में स्टील तथा सीमेंट की कीमतें कम हैं. न केवल अमरावती, बल्कि हैदराबाद में भी निर्माण की विपुल गतिविधियां होनेवाली हैं. निजी सीमेंट निर्माता इस विशाल आवश्यकता की आपूर्ति कर अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करेंगे. अगले चुनावों में जब तेलुगु देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू और दूसरी ओर तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के के चंद्रशेखर राव (केसीआर) अपने मतदाताओं का सामना करेंगे, तो वे गर्व से यह कह सकेंगे कि उन्होंने अपनी नयी राजधानियों तथा सचिवालयों का निर्माण किया. लेकिन, क्या साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा भी इसका फायदा उठा सकेगी? क्या इसके बदले कहीं कुछ कीमत भी चुकाई गयी?
नयी दिल्ली का राजनीतिक माहौल इन अटकलों से भरा है कि केसीआर की ओर से डाले गये दबाव से उनकी पार्टी टीआरएस अंततः राष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा के उम्मीदवार का समर्थन करने पर राजी हो गयी है.
पिछले दो वर्षों से राज्य सरकार रक्षा मंत्रालय से विभिन्न स्तरों पर विभिन्न माध्यमों द्वारा संपर्क साध रही थी. पर, पिछले सप्ताह, जब केसीआर ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक व्यक्तिगत बैठक कर राष्ट्रपति के लिए भाजपा उम्मीदवार को तेलंगाना राष्ट्र समिति के समर्थन का भरोसा दिलाया, तब कहीं जाकर बात बनी.
पर, भारतीय जनता पार्टी के साथ ही रक्षा मंत्रालय भी उपर्युक्त घटनाक्रम से इनकार करते हुए यह बता रहा है कि पिछले रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर भी केसीआर के अनुरोध पर विचार कर रहे थे. लेकिन, तथ्य यह है कि टीआरएस राष्ट्रपति के भाजपा उम्मीदवार को अपने मत देगी और उसके बदले उसे रक्षा मंत्रालय का भूभाग आवंटित किया जायेगा. यह देखना दिलचस्प रहा कि इस राजनीतिक दबाव ने किस तरह केसीआर को भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में राजी किया.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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