कन्फ्यूजनात्मक पथ पर

Updated at : 22 May 2017 6:05 AM (IST)
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कन्फ्यूजनात्मक पथ पर

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार दस साल का वह बच्चा सुबह स्विमिंग सीखने जाता है, उसके दादा डिस्ट्रिक्ट लेवल के तैराक रहे थे. वही बच्चा दोपहर में एक स्कूल में लेखन वर्कशाप में लेखन सीखने जाता है, बच्चे की दादी काॅलेज की मैगजीन लेवल की लेखिका रही हैं. वही बच्चा शाम को आठ से दस भरतनाट्यम […]

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आलोक पुराणिक

वरिष्ठ व्यंग्यकार

दस साल का वह बच्चा सुबह स्विमिंग सीखने जाता है, उसके दादा डिस्ट्रिक्ट लेवल के तैराक रहे थे. वही बच्चा दोपहर में एक स्कूल में लेखन वर्कशाप में लेखन सीखने जाता है, बच्चे की दादी काॅलेज की मैगजीन लेवल की लेखिका रही हैं. वही बच्चा शाम को आठ से दस भरतनाट्यम भी सीखने जाता है, उसकी मां चाहती है कि वह बच्चा डांस इंडिया डांस या नच बलिये में कुछ नाम कमा ले. और उस बच्चे की गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं. बच्चा सोचता है कि अगर छुट्टियां इन्हें कहते हैं, तो ये हर साल क्यों आ जाती हैं.छुट्टियों में इन दिनों मध्यवर्गीय शहरी परिवारों में स्विमिंग से लेकर भरतनाट्यम मच रहा है.

विकट कन्फ्यूजन है. सिर्फ कन्फ्यूजन है. दस साल के बच्चे से उम्मीद है कि वह प्रेमचंद से लेकर शाहरुख खान तक, सब एक साथ हो जाये. मैं भविष्य की सोच कर डरता हूं कि बच्चे के गुणों के मामले में चुनाव की सुविधा अगर मां-बाप को हो, तो वह बच्चे की प्रोग्रामिंग में बतायेंगे कि कुछ सचिन जैसा, कुछ कोहली जैसा, कुछ अमिताभ बच्चन जैसा, कुछ बाहुबली प्रभास जैसा होना चाहिए. प्रोग्रामिंग मशीन ठप हो जायेगी, यह मैसेज देकर- सिस्टम एरर.

कन्फ्यूजन सब तरफ है. अभी एक घड़ी देखी पचास हजार रुपये की, दुकानदार ने बताया- इसमें बीजिंग, मास्को, अमेरिका, लंदन का टाइम एक साथ दिखता है. मैंने कहा- मैं आम तौर पर बीजिंग, मास्को नहीं जाता. दुकानदार बोला- आप क्या घड़ी टाइम देखने के लिए खरीदते हैं. ना, टाइम तो आपको हजार रुपये के मोबाइल में भी दीखता है, घड़ी तो दूसरों को बताने के लिए होती है कि देखो इसमें से इमेल भेज सकते हैं. व्हाॅट्सअप मैसेज रिसीव कर सकते हैं. फेसबुक चैट कर सकते हैं.

मैंने फिर निवेदन किया- ये सारे काम मोबाइल पर या लैपटाप पर कर सकता हूं, तो घड़ी में क्यों करूं? उसने बताया- अगर आप घड़ी का इस्तेमाल सिर्फ टाइम देखने के लिए करते हैं, तो आप पिछड़े हैं.

विकट कनफ्यूजन- आकर्षक कैश बैक देनेावाला एक आॅनलाइन पेमेंट वैलेट अब बैंक बन गया है. जो खर्च कराने का जुगाड़ कराता है, उसे अब जमा जुटाने का काम सौंप दिया गया है. क्या है यह, जो भी सेविंग होगी, यह आॅनलाइन वैलेट बैंक खर्च करवा देगा- दो के बजाय चार पिज्जा खाओ, कैश बैक है. चार के बजाय बीस शर्ट लो कैशबैक है.

खर्च की जुगाड़करनेवाला जब सेविंग का इंतजाम करता है, तो फिर बंदे की चिंता खत्म हो जाती है कि कहीं और नहीं जाना पड़ेगा खर्च करने को, यही निपटा लो.क्या कहा आपने कि यह कनफ्यूजनात्मक बात है. जी, आप सोच में बहुत पिछड़े हुए हैं अभी.

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