भारत निकाले बीच का रास्ता

Updated at : 17 May 2017 6:11 AM (IST)
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भारत निकाले बीच का रास्ता

एमके वेणु आर्थिक मामलों के जानकार delhi@prabhatkhabar.in साल 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से ही पूरी दुनिया में एक ऐसा माहौल बना हुआ है, जिसमें कई अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ाती चल रही हैं. बीसवीं सदी में पश्चिमी देशों- अमेरिका और यूरोप को वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन माना जाता था, लेकिन यही पश्चिमी देश यह कहने लगे […]

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एमके वेणु
आर्थिक मामलों के जानकार
delhi@prabhatkhabar.in
साल 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से ही पूरी दुनिया में एक ऐसा माहौल बना हुआ है, जिसमें कई अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ाती चल रही हैं. बीसवीं सदी में पश्चिमी देशों- अमेरिका और यूरोप को वैश्विक अर्थव्यवस्था का इंजन माना जाता था, लेकिन यही पश्चिमी देश यह कहने लगे हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के इंजन के ऐतबार से 21वीं सदी एशिया की सदी है. और एशिया की दो बड़ी महाशक्तियां हैं चीन और भारत. ऐसे में अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व एशिया को करना है और इसमें ये दो महाशक्तियां साथ नहीं चलेंगी, तो फिर एशिया की सदी का क्या अर्थ हुआ? भारत ने जिस तरह से चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ (ओबीओआर) प्रोजेक्ट से दूरी बनाये रखी है और इसके पीछे नाराजगी यह है कि इस प्रोजेक्ट का एक हिस्सा पीओके से होकर जाता है, वह उचित नहीं है.
भारत का यह रुख विरोधाभासी है, जबकि भारत-चीन ने मिल कर एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक भी बनाया है, ताकि एशिया में निर्माण परियोजनाओं के लिए निवेश को बढ़ावा मिल सके. पंद्रहवीं सदी में एशिया को यूरोप से जोड़नेवाला सिल्क रूट में आज वर्तमान में रेलवे, ट्रांसपोर्टेशन, पाइपलाइन, पोर्ट आदि के निर्माण के लिए तो चीन-भारत का साथ मिल कर काम करना बहुत जरूरी है.
ओबीओआर की पहली मीटिंग से भारत ने किनारा करके यह संकेत दे दिया है कि मोदी जी की विदेश नीति चीन और पाकिस्तान को एक ही डब्बे में डाल कर देख रही है. हालांकि, भारत का यह अंतिम रुख नहीं है. पिछले बीस-तीस साल में हमारा चीन के साथ द्विपक्षीय व्यापार खूब बढ़ा है.
इसलिए भारत को चाहिए कि वह ओबीओआर का हिस्सा बने. यह परियोजना 900 बिलियन डॉलर की है और इसमें तीन दर्जन से ज्यादा देश शामिल हैं. यूरोप, सेंट्रल एशिया, इस्ट एशिया और दक्षिण एशिया के कुछ देश भी इसमें अपनी भागीदारी कर रहे हैं. सिर्फ भारत ही है, जो सीपेक (चीन-पाक आिर्थक गलियारा) को लेकर संप्रभुता के सवाल पर नाराज है कि यह परियोजना पीओके से होकर जा रहा है, इसलिए उसे दिक्कत है. ध्यान रहे कि पीओके क्षेत्र में यह परियोजना सिर्फ 50 बिलियन डॉलर की है.
ओबीओआर का उद्देश्य यह है कि सिल्क रूट में पड़नेवाले सारे देश मिल कर इस क्षेत्र में आयात-निर्यात को सुगम बनायें. मसलन, म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका में चीन की मदद से पोर्ट बन रहे हैं.
नेपाल तक चीन रेल लिंक ले जा रहा है. चीन चाहता है कि जो चीज नेपाल तक जाये, वही चीज उसके नीचे तराई में यानी भारतीय सीमा से होकर पूरे भारत तक क्यों न जाये, क्योंकि भारत भी एक बड़ा मार्केट है. भारत भी इस बात को समझता है और भारत खुद भी अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देकर इन चीजों से जुड़ कर व्यापार और निवेश में तरक्की कर सकता है. इसलिए अगर भारत ओबीओआर से जुड़ता है, तो इससे निवेश और व्यापार में भारी वृद्धि होगी. आज के दौर में जिस तरह की आर्थिक मंदी से हम दो-चार हो रहे हैं, इससे निपटने के लिए ऐसी परियोजनाओं की जरूरत है.
इससे न सिर्फ हमारा आर्थिक विकास होगा, बल्कि रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे.वर्तमान में भारत का फोकस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर है. ऐसे में भारत चाहे, तो वह इसे चीन के ओबीआेआर से जोड़ सकता है और यूरोप व दूसरे क्षेत्रों के बहुत पास पहुंच सकता है. देशों के बीच में दूरियां तभी कम होंगी और व्यापार की सुगमता बढ़ेगी, जब ओबीओआर जैसी परियोजनाओं पर काम किया जायेगा. भारत इस बात को मानता है, लेकिन उसने एक इगो पाल रखा है कि चूंकि चीन कई मामलों में पाकिस्तान का साथ दे रहा है, इसलिए भारत ओबीओआर का हिस्सा नहीं बनेगा. इस मामले में भारत को अमेरिका से सीख लेनी चाहिए.
अमेरिका को भी चीन की कुछ नीतियों से दिक्कतें हैं, लेकिन वह चीन के साथ अपना व्यापार करता रहता है. नीति के स्तर पर दो देशों के बीच में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इसके असर को व्यापार पर नहीं डालना चाहिए. नीतिगत रिश्ते और आर्थिक रिश्ते, दोनों के अपने अलग-अलग दायरे होते हैं और दोनों का अपना अलग-अलग महत्व होता है. इसलिए इस प्रोजेक्ट को हमें एक वैश्विक आर्थिक विकास के नजरिये से ही देखना चाहिए.
भारत में, लोग यह कह रहे हैं कि ओबीओआर के जरिये चीन एक नव उपनिवेशवाद खड़ा करने जा रहा है, जैसा एक जमाने में इंगलैंड ने किया था. लेकिन, मेरा मानना है कि ऐसा कुछ भी नहीं है. इस 21वीं सदी में 19वीं सदी जैसा नव उपनिवेशवाद खड़ा किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि आज कई देशों के पास परमाणु हथियार हैं. दूसरी बात यह है कि ओबीओआर में तकरीबन तीस-चालीस देश शामिल हैं और सब के सब अपनी मर्जी से शामिल हैं, चीन ने उन्हें जबरन शामिल नहीं किया है.
पूरी दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं कह रहा है कि यह नव उपनिवेशवाद जैसा कुछ है, सिर्फ भारत ही ऐसा कह रहा है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने भी आधिकारिक रूप से यह बात कही है कि चीन का जो ओबीओआर प्रोजेक्ट है, वह ‘एक नया एशियाई ग्लोबल विजन’ है, जो बीसवीं सदी में पश्चिमी देशों की तरफ से आया था. दावोस के वर्ल्ड इकोनाॅमिक फोरम में ट्रंप ने संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज्म) की बात की, लेकिन वहीं शी जिनपिंग ने ग्लोबल विजन की बात कही.
यह उल्टा हो रहा है- पश्चिमी देश आजकल संरक्षणवाद की बात कर रहे हैं, वहीं चीन वैश्वीकरण की बात कर रहा है. ऐसे में सचमुच में 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाना है, तो भारत को अपना अड़ियल रुख छोड़ कर ओबीओआर के साथ शामिल होना चाहिए. आज अमेरिका और यूरोप के पास भी इतना पैसा नहीं है कि वह इसमें निवेश करें. मिस्र के आर्थिक संकट को उबारने में चीन का आर्थिक सहयोग था. चीन आजकल यूरोपीय देशाें को भी पैसे दे रहा है. आर्थिक रूप से एशिया में चीन बहुत मजबूत है, इसलिए भारत को एक बीच का रास्ता निकाल कर ओबीओआर प्रोजेक्ट के साथ सहयोग करना चाहिए.
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