अपने प्रयोजन में विफल है मृत्युदंड

Updated at : 12 May 2017 1:10 AM (IST)
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अपने प्रयोजन में विफल है मृत्युदंड

प्रो फैजान मुस्तफा वाइस चांसलर, नलसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद दो सौ वर्षों से भी अधिक पहले फ्रांस की राष्ट्रीय असेंबली में सजा-ए-मौत के विरुद्ध दलीलें देते हुए फ्रांसीसी क्रांति की प्रमुख हस्तियों में एक रॉब्सपीयर ने कहा था: ‘न्याय और विवेक की आवाज सुनें! यह कहती है कि मानवीय विचार शक्ति कभी इतनी निश्चित […]

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प्रो फैजान मुस्तफा
वाइस चांसलर, नलसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद
दो सौ वर्षों से भी अधिक पहले फ्रांस की राष्ट्रीय असेंबली में सजा-ए-मौत के विरुद्ध दलीलें देते हुए फ्रांसीसी क्रांति की प्रमुख हस्तियों में एक रॉब्सपीयर ने कहा था: ‘न्याय और विवेक की आवाज सुनें! यह कहती है कि मानवीय विचार शक्ति कभी इतनी निश्चित नहीं हो सकती कि वह कुछ मानवीय प्राणियों द्वारा किसी अन्य मानवीय प्राणी के प्राण लेने का फैसला कर समाज को वैसा करने दे… आप ऐसी त्रुटियां सुधार सकने के मौकों से खुद को वंचित क्यों करें? किसी निर्दोषिता पर हुए जुल्म के सामने आने पर आप स्वयं को एक निरुपायता की स्थिति में क्यों डालें?’
व्यवहार में, दुनिया में कोई भी ऐसा देश नहीं, जहां कभी मृत्युदंड का अस्तित्व न रहा हो. पर वर्तमान में, 140 से भी ज्यादा देश इसे अपने यहां खत्म कर चुके हैं. पूरे यूरोप में यह अभी केवल बेलारूस में ही बचा है.
भारत में इसे कायम रख कर हम नैतिकता की दृष्टि से ईरान, इराक, सऊदी अरब तथा चीन के संदेहास्पद समूह में सहभागी बने हुए हैं. भारत में हर तीसरे दिन एक व्यक्ति को मृत्युदंड सुनाया जाता है और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी यह स्वीकार कर चुका है कि यह संख्या असाधारण रूप से ऊंची है. ज्योति बलात्कार मामले में मृत्युदंड का स्वागत हुआ है, पर उदार बुद्धिजीवीवर्ग या दंड के सिद्धांतों की बेहतर समझ रखनेवाले इस पर अब भी निश्चित नहीं हैं. फिर, बिलकिस मामले में हाइकोर्ट ने क्यों मृत्युदंड नहीं दिया, यह समझ पाना कठिन है.
भारतीय विधि आयोग ने अपनी 262वीं रिपोर्ट में आतंकवाद से संबद्ध अपराधों को छोड़ कर बाकी सबके लिए सजा-ए-मौत समाप्त करने का समर्थन किया. आतंकी अपराधों के लिए भी आयोग ने यह माना कि उनके साथ भिन्न व्यवहार का कोई दंडशास्त्रीय औचित्य नहीं है.
इससे भी बढ़ कर, आतंक के साथ सफल संघर्ष तथा सजा-ए-मौत के बीच किसी संबंध के कोई साक्ष्य नहीं हैं.
यह तथ्य है कि ब्रिटेन ने आयरिश रिपब्लिक आर्मी के आतंकी कृत्यों के चरम काल में ही मृत्युदंड समाप्त करने का फैसला किया था. 18वीं सदी के इंगलैंड में पॉकेटमारी के लिए मृत्यु की सजा थी, लेकिन जब किसी पॉकेटमार को सार्वजनिक रूप से फांसी दी जा रही होती, तो वहां इकठ्ठी भीड़ में भी पॉकेटमार अपने हाथ साफ करने से बाज नहीं आते थे. इससे पता चलता है कि मृत्युदंड का प्रभाव तथा भय कितना कम होता है.
अन्य देशों के विपरीत, भारत में विभिन्न दंड प्रावधानों के अंतर्गत 34 अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया जा सकता है. पुराना इसलामी कानून भी आधे दर्जन से कम अपराधों के लिए ही मृत्युदंड के प्रावधान करता है. यह जानना अप्रसन्नताजनक होगा कि मृत्युदंड के 13 ऐसे प्रावधान हैं, जो गैर-मानववध अपराधों के लिए भी मृत्युदंड की अनुमति देते हैं.आयोग ने ऐसी सभी वजहों में कोई दम नहीं पाया, अमूमन जिनके आधार पर मृत्युदंड को सही ठहराने की दलीलें दी जाती हैं.
सजा तय करने में जनमत अप्रासंगिक होता है. बिलकिस मामले में क्यों राष्ट्रीय अंतरात्मा की चीख नहीं उठी, जबकि उसमें भी सिर्फ सामूहिक बलात्कार ही नहीं, बल्कि उसके 19 परिजनों की क्रूर हत्या भी शामिल है?
बचन सिंह मामले में जस्टिस भगवती ने ठीक ही कहा था कि मृत्युदंड देना मनमाना कृत्य है, क्योंकि यह जजों की दृष्टि, झुकाव, पूर्वबोध, मूल्य प्रणाली तथा सामाजिक दर्शन के साथ ही न्यायिक पीठ की संरचना पर भी निर्भर है. उन्होंने बताया कि एक जज नक्सलवादियों के साथ सहानुभूति रख सकता है, जबकि दूसरा उनसे नफरत कर सकता है.
वर्ष 2000 के पश्चात सुप्रीम कोर्ट के एक अकेले जज ने 30 मामलों में 14 में मृत्युदंड दिया. यह दुखद है कि इन 14 मामलों में से दो में हाइकोर्ट ने अभियुक्त को बरी कर दिया था, जबकि अन्य दो में सुप्रीम कोर्ट के ही दूसरे जज ने अभियुक्त को बरी किया था. इस तरह, भारत में सिद्धांत-आधारित सजा की बातें अभी दूर की कौड़ी हैं.
जजों के मतों में भिन्नता खुद ही सजा-ए-मौत न दिये जाने का आधार मुहैया करती है. केवल एक सहअपराधी के साक्ष्य या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर मृत्युदंड नहीं दिया जाना चाहिए. ‘विरल में भी सर्वाधिक विरल’ तय करना और कुछ नहीं, बल्कि जिसे आयोग ने ठीक नाम दिया है, ‘कानूनी कल्पना’ मात्र है.
वर्ष 2000 से लेकर 2015 तक, ट्रायल कोर्ट ने 1970 मामलों में मृत्युदंड दिया और सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया कि उनमें से 95.7 प्रतिशत मामलों में यह दंड देना गलत था. 2000 से 2013 तक स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने 69 मामलों में मृत्युदंड सुनाया, जिनमें से 16 मामलों में यह गलत था. इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट स्वयं भी 23.2 फीसदी मामलों में गलती का शिकार हुआ. आयोग ने मृत्युदंड दिये जाने में बड़ी क्षेत्रीय भिन्नता भी पायी. केरल में एक हत्यारे के लिए मृत्युदंड की संभावना देश के दूसरे हिस्सों से दोगुनी है. झारखंड में यह संभावना 2.4 प्रतिशत ऊंची, दिल्ली में छह गुनी और जम्मू-कश्मीर में 6.8 गुनी अधिक पायी गयी.
बरियार मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि सर्वाधिक जघन्य अपराधों समेत सभी मामलों में अपराधी के साथ मौजूद परिस्थिति को पूरी अहमियत दी जानी चाहिए. कोर्ट ने माना है कि ‘विरल में भी सर्वाधिक विरल’ (रेयरेस्ट ऑफ द रेयर) एक ऐसा सिद्धांत है, जिसे प्रयुक्त करने में वह मनमाना एवं परस्पर विरोधी रहा है.
अंततः, यह भी संदेहास्पद है कि मृत्यु एक सजा ही है. सीजर ने इससे ऐसे इनकार किया था: ‘मृत्युदंड के संबंध में मैं सच्चाई से कह सकता हूं कि दुख एवं दुर्दशा में मृत्यु कष्टों से छुटकारा है, दंड नहीं. यदि मृत्यु से हम किसी की खुशी खत्म करते हैं, तो उसी परिमाण में उसके दुखों व अपमान का अवसान भी करते हैं.
मृत्यु एक आश्रय है, जो दंड के लिए अभेद्य है.’ बलात्कार तथा आतंकी अपराधों समेत जुर्म दर में सजा-ए-मौत कोई कमी न तो ला सकती थी, और न ही ला सकेगी. आधुनिक दंडशास्त्र अपराध से अपराधी और प्रतिशोध से व्यक्ति के वास्तविक सुधार तथा उसे स्वस्थ करनेवाले न्याय की दिशा में बढ़ रहा है. सच तो यह है कि मृत्युदंड नैतिक रूप से निंदनीय है एवं कानूनी रूप से असमर्थनीय है. मृत्युदंड सचमुच में कोई सजा नहीं है.
मौत क्या एक लफ्जे-बेमानी। जिसको मारा हयात ने मारा।।
(अनुवाद: विजय नंदन)
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