तिहरे तलाक पर सुनवाई
Updated at : 12 May 2017 1:01 AM (IST)
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देश के पांच सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने तिहरे तलाक के मुद्दे पर नियमित सुनवाई शुरू कर दी है. बहस का मसला और समय निर्धारित होने से यह उम्मीद बंधी है कि जल्दी ही इस पर कोई फैसला आ जायेगा. वरिष्ठता के साथ खंडपीठ के न्यायाधीश अलग-अलग पांच धर्मों से भी संबद्ध हैं. यह […]
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देश के पांच सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने तिहरे तलाक के मुद्दे पर नियमित सुनवाई शुरू कर दी है. बहस का मसला और समय निर्धारित होने से यह उम्मीद बंधी है कि जल्दी ही इस पर कोई फैसला आ जायेगा. वरिष्ठता के साथ खंडपीठ के न्यायाधीश अलग-अलग पांच धर्मों से भी संबद्ध हैं.
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह संवेदनशील मुद्दा पर्सनल लॉ से संबंधित है. पूरी बहस इस बात पर केंद्रित होगी कि क्या तिहरा तलाक इसलाम की बुनियादी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय इसे एकतरफा और अवैध करार दे चुका है. उसकी राय है कि पर्सनल लॉ के प्रावधान संविधान के दायरे में ही लागू हो सकते हैं और इस तरह से तलाक देना समानता के संवैधानिक अधिकार के विरुद्ध है.
बीते साल अक्तूबर में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में तिहरे तलाक, निकाह हलाल और बहु-विवाह का विरोध करते हुए कहा था कि इन मसलों पर लैंगिक समानता और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के आधार पर पुनर्विचार होना चाहिए. मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क है कि ये सब धार्मिक व्यवहार से जुड़े हैं और न्यायपालिका को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है.
हालांकि बोर्ड ने माना है कि बहु-विवाह और तिहरे तलाक जैसे मामले विधायी नीति के मामले हैं. बहरहाल, अब सर्वोच्च न्यायालय पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं और उम्मीद है कि सुनवाई से समुचित और संतुलित समाधान निकल सकेगा, जिससे धार्मिक विशेषाधिकारों को नुकसान नहीं होगा और महिलाओं के अधिकारों का दायरा भी बढ़ सकेगा. इस मुद्दे पर लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक बहस हो रही है. आशा है कि अब इसे विराम मिल सकेगा.
यह भी गौरतलब है कि कई सालों में अदालतों में विभिन्न धर्मों के पर्सनल लॉ के अनेक प्रावधानों को खारिज किया गया है और औरतों के अधिकारों को विस्तार दिया गया है. शाहबानो और मेरी रॉय मामलों के अलावा बॉम्बे उच्च न्यायालय का तिहरे तलाक पर फैसला, अविवाहित माता तथा मुसलिम महिलाओं के गोद लेने जैसे मामले खासा असर डालने में कामयाब रहे हैं.
अदालतों से बाहर धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं पर बहस के दौरान इनकी संवेदनशीलता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए तथा इन्हें राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धि का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए. किसी भी तरह इन्हें सांप्रदायिक रंग देने से भी परहेज करना चाहिए. सभ्य और लोकतांत्रिक देश में कानूनी बदलाव या समीक्षा की संस्थागत व्यवस्था है, जिनका मान रखा जाना चाहिए.
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