हांकने की फांस, गेहूं बना ग्रास

Updated at : 19 Dec 2016 7:02 AM (IST)
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हांकने की फांस, गेहूं बना ग्रास

अिनल रघुराज संपादक, अर्थकाम.काॅम शरद पवार जैसे बहुरंगी कलाकार की जगह उन्नीस महीने पहले जब राधा मोहन सिंह को देश का कृषि मंत्री बनाया गया, तो आम धारणा यही बनी कि जमीन से जुड़े नेता होने के नाते वे कृषि अर्थव्यवस्था ही नहीं, किसानों के व्यापक कल्याण का भी काम करेंगे. संयोग से करीब सवा […]

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अिनल रघुराज
संपादक, अर्थकाम.काॅम
शरद पवार जैसे बहुरंगी कलाकार की जगह उन्नीस महीने पहले जब राधा मोहन सिंह को देश का कृषि मंत्री बनाया गया, तो आम धारणा यही बनी कि जमीन से जुड़े नेता होने के नाते वे कृषि अर्थव्यवस्था ही नहीं, किसानों के व्यापक कल्याण का भी काम करेंगे. संयोग से करीब सवा साल बाद मंत्रालय का नाम भी बदल कर कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय कर दिया गया.
लेकिन, उसके बमुश्किल एक महीने बाद राधा मोहन सिंह ने ऐसा बयान दे दिया, जिसकी उनकी सोच-समझ पर सवालिया निशान लग गया.
दिल्ली में कृषि वैज्ञानिकों व किसानों के एक समारोह में राधा मोहन सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार ने योगिक खेती करने का फैसला लिया है. राजयोग की मदद से किसानों का मनोबल बढ़ेगा और वे ग्लोबल वॉर्मिंग व जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपट सकेंगे. सिंह ने कहा, ‘योगिक खेती के पीछे विचार यह है कि सकारात्मक सोच से हम बीज को सशक्त बना सकते हैं. परमात्मा-शक्ति की किरणों से हमें बीजों की उर्वरता बढ़ानी चाहिए. इससे भारत को विश्वगुरु बनाने में मदद मिलेगी और भारत एक बार फिर सोने की चिड़िया बन सकेगा.’
इसके बाद कृषि वैज्ञानिकों का भरोसा उनमें डगमगाने लगा. कुछ वैज्ञानिकों ने चुटकी ली कि सिंह की यह सोच लगता है कि पौराणिक कहानियों वाले टीवी सीरियल देख कर निकली है, क्योंकि हमारे प्राचीन ग्रंथों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है. बाजार भी उनकी क्षमता व दावों पर संदेह करने लगा. इस बीच समय का पहिया बेरोकटोक चलता रहा. दो साल के सूखे के बाद रबी की मुख्य फसल खेतों में लहलहा रही थी. तभी कृषि मंत्रालय ने 15 फरवरी, 2016 को पहला अनुमान पेश किया कि देश में 2015-16 के रबी सीजन में 938.2 लाख टन गेहूं की बंपर पैदावार होने जा रही है, जो 2014-15 में हुए 865.3 लाख टन उत्पादन से 8.42 प्रतिशत ज्यादा होगी. बाजार व वैज्ञानिकों ने कहा कि मिट्टी व वायुमंडल के सूखेपन को देखते हुए ऐसा संभव नहीं है. मार्च तक साफ होने लगा कि गेहूं की बालियों में कम दाने आयेंगे. बाजार ने आगाह किया कि गेहूं का उत्पादन बहुत हुआ, तो 800 से 850 लाख टन तक जा सकता है.
फिर भी राधा मोहन सिंह के नेतृत्व में कृषि मंत्रालय ने गेहूं उत्पादन का आकलन घटाने के बजाय बढ़ा कर 940.4 लाख टन कर दिया. उसके बाद तो इस बड़बोलेपन ने ऐसा दुष्चक्र पैदा किया, जो आज किसानों ही नहीं, बल्कि देश के लिए मुसीबत का सबब बन गया है. चक्र यूं चला कि कृषि मंत्रालय की बातों में आकर केंद्र सरकार ने गेहूं पर आयात शुल्क 10 से बढ़ा कर 25 प्रतिशत कर दिया. पहले इसके लागू होने की तिथि 31 मार्च, 2016 तक थी. फिर इसे 30 जून तक बढ़ाया गया और उसके बाद इसे बिना किसी अंतिम तारीख तक बढ़ा दिया गया.
यह सब तब हो रहा था, जब भारतीय खाद्य निगम समेत सभी सरकारी एजेंसियां अप्रैल-जून के दौरान केवल 229.6 लाख टन गेहूं ही खरीद सकीं, जबकि साल भर पहले की समान अवधि में उन्होंने इससे 22.29 प्रतिशत ज्यादा 280.8 टन गेहूं खरीदा था. इस हकीकत से रूबरू होने के बाद भी कृषि मंत्रालय हांकने से बाज नहीं आया. 2 अगस्त को कृषि भवन ने गेहूं उत्पादन का सबसे नया आंकड़ा 935 लाख टन का जारी किया जो बाजार के आकलन से कम-से-कम 85 लाख टन ज्यादा है. पर, धीरे-धीरे झूठे दावों की सतह के नीचे से सच्चाई सिर उठाने लगी और केंद्र सरकार की गति सांप-छछुंदर जैसी हो गयी.
उपलब्धता कम होने से बाजार में गेहूं के दाम बढ़ने लगे. जुलाई में थोक मूल्यों पर आधारित मुद्रास्फीति की दर 3.55 प्रतिशत थी, जबकि गेहूं का थोक मूल्य इस दौरान 6.90 प्रतिशत बढ़ा. सितंबर में थोक मुद्रास्फीति की दर 3.57 प्रतिशत रही, जबकि गेहूं के थोक दाम 7.01 प्रतिशत बढ़ गये. सबसे नये आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर में थोक मुद्रास्फीति 3.25 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि गेहूं के थोक भाव साल भर पहले से 10.71 प्रतिशत ज्यादा रहे हैं. बाजार की इस हकीकत से निपटना सरकार के लिए जरूरी हो गया. उसने 23 सितंबर को गेहूं पर आयात शुल्क 25 से घटा कर सीधे 10 प्रतिशत कर दिया और कहा कि यह मार्च 2017 में गेहूं की नयी फसल आने तक लागू रहेगा. इस बीच नोटबंदी से गेहूं की बुवाई पर प्रतिकूल असर पड़ने की खबरें आने लगीं, तो उसने 8 दिसंबर से गेहूं पर आयात शुल्क एकदम खत्म कर दिया.
जब उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे दो प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों के विधानसभा चुनाव कुछ महीनों बाद होने हों, तब विदेश से सस्ते गेहूं का शुल्क-मुक्त आयात करना सरकार के लिए कतई आसान फैसला नहीं था. विदेशी गेहूं देश के बंदरगाहों पर प्रति क्विंटल 21 से 21.5 डॉलर या 1,425 से 1,430 रुपये में पहुंच रहा है. वहीं इस साल के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,625 रुपये प्रति क्विंटल है. जाहिर है कि बाजार में बाहर का गेहूं 200 रुपये कम में मिलेगा, तो भारतीय किसानों का गेहूं कौन पूछेगा! बीज से खाद तक के लिए कैश की तंगी से जूझ रहे किसान इससे और ज्यादा नाराज हो सकते हैं.
फिर भी सरकार ने गेहूं पर आयात शुल्क खत्म किया, तो यह उसकी मजबूरी थी. दरअसल 1 दिसंबर, 2016 तक सरकारी गोदामों में 164.96 लाख टन गेहूं ही बचा है, जो पिछले नौ सालों का न्यूनतम स्तर है. हर महीने राशन की दुकानों के लिए औसतन 25 लाख टन गेहूं निकलता है. इस हिसाब से मार्च तक गोदाम से 100 लाख टन गेहूं निकल जायेगा और 1 अप्रैल, 2017 को उसके पास 64.96 लाख टन गेहूं ही बचेगा, जबकि नियमतः उस समय गेहूं की नयी खरीद शुरू होने तक उसके पास कम-से-कम 74.6 लाख टन का बफर स्टॉक होना चाहिए.
इस तरह राजयोग, योगिक व वैदिक खेती की बात करनेवाले राधा मोहन सिंह के नेतृत्व में चल रहे कृषि मंत्रालय के हांकू अंदाज ने केंद्र सरकार को फजीहत झेलने की स्थिति में ला खड़ा कर दिया. ऊपर से देश भर में नोटबंदी का कोहराम मचा हुआ है. ताजा हाल यह है कि कालेधन का अजगर राजनीतिक पार्टियों के टैक्स-फ्री खातों की सुरंग में समाने की तैयारी में है. ऐसे में कृषि मंत्री का बड़बोलापन प्रधानमंत्री के दावे के टूटने से कहीं सरकार के लिए कोढ़ में खाज न साबित हो जाये.
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