हिंदी में समीक्षा की दशा-दुर्दशा

Updated at : 08 Dec 2016 7:00 AM (IST)
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हिंदी में समीक्षा की दशा-दुर्दशा

प्रभात रंजन कथाकार हाल में ही एक युवा लेखक ने लिखा कि पुस्तक की समीक्षा लिखना बहुत नाजुक और संवेदनशील होता है. इससे ध्यान आया कि हिंदी मीडिया में हिंदी साहित्य के लिए सबसे अधिक स्पेस पुस्तक समीक्षा का ही होता है. सप्ताह में एक दिन कमोबेश हर अखबार में पुस्तक समीक्षा के स्तंभ छपते […]

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प्रभात रंजन

कथाकार

हाल में ही एक युवा लेखक ने लिखा कि पुस्तक की समीक्षा लिखना बहुत नाजुक और संवेदनशील होता है. इससे ध्यान आया कि हिंदी मीडिया में हिंदी साहित्य के लिए सबसे अधिक स्पेस पुस्तक समीक्षा का ही होता है. सप्ताह में एक दिन कमोबेश हर अखबार में पुस्तक समीक्षा के स्तंभ छपते हैं. हर सप्ताह अखबारों में, व्यावसायिक पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षा का प्रकाशन होता है. नयी किताबों के बारे में पाठकों को पहली सूचना अब भी ज्यादातर पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही मिलती है. हालांकि, सोशल मीडिया के प्रभावी से किताबों की सूचना आदान-प्रदान करने के माध्यम के रूप में फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों की भूमिका प्रभावी होती गयी है, लेकिन जिसको पुस्तक समीक्षा कहते हैं, वह अब भी पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा ही सामने आती है. फेसबुक समीक्षा से अधिक प्रचार का माध्यम बन गया है. वहां किताबों के बारे में सूचना दी जाती है, उनका प्रचार या तो लेखक या प्रकाशक द्वारा किया जाता है.

दुख की बात यह है कि पुस्तक समीक्षा विधा को हिंदी में उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता है, जबकि बहुत सारे लेखकों ने पुस्तक समीक्षाओं से ही अपने लेखन जीवन की शुरुआत की है.

मैं जब दिल्ली विवि में पढ़ता था, तब मैंने दिल्ली के राष्ट्रीय अखबारों में किताबों की समीक्षा के माध्यम से ही अपने लेखन की शुरुआत की थी. इसके पीछे कई लोभ रहते थे, एक तो कड़की के उन दिनों में मुफ्त में एक नयी और चर्चित किताब मिल जाती थी, वहीं दूसरे, राष्ट्रीय अखबार में हमारा नाम छप जाता था. तीसरा आकर्षण सबसे बड़ा होता था कि हमें मानदेय भी मिलता था. यानी बेरोजगारी के दिनों में समीक्षा लेखन हमारे लिए आय का स्रोत भी होता था.

तब हम समीक्षा की विधा को लेकर बहुत गंभीर रहते थे. उन दिनों में हिंदू कॉलेज में मेरे प्राध्यापक दीपक सिन्हा ने कहा था कि अगर अच्छी समीक्षा लिखनी है, तो वह समीक्षा पढ़ना, जो मलयज ने निराला की कविता ‘सरोज स्मृति’ की लिखी थी- दुख की स्वनिर्भर दुनिया से बाहर निकलने की छटपटाहट या अशोक वाजपेयी की अज्ञेय के काव्य संग्रह की लिखी समीक्षा ‘बूढ़ा गिद्ध क्यों पंख फैलाये’. कहने का मतलब यह है कि हम अच्छी मानी जानेवाली समीक्षाओं का अध्ययन करते थे और उनकी तरह लिखने का अभ्यास करते थे. दिल में यह साध थी कि किताबों की ऐसी समीक्षा लिखूंगा कि एक दिन इसी विधा में अपना नाम करूंगा.

मैंने अनुभव से यह जाना कि मैं समीक्षा को जितनी गंभीरता से लेता था, छापनेवाले या पढ़नेवाले उसको उतनी गंभीरता से नहीं लेते थे. समीक्षा विधा एक ऐसा हथियार है, जिसके जरिये हिंदी के किसी सत्ताधीश के करीब पहुंचा जा सकता है, अपने प्रियजनों की किताब को चमकाया जा सकता है. यह भी पता चला कि समीक्षा का मतलब जरूर पुस्तक का गुण-दोष विवेचन होता है, लेकिन दोषों से आंखें मूंद लेना चाहिए. चर्चा केवल गुणों की ही करनी चाहिए.

हिंदी में अगर आपने किसी की किताब की आलोचना कर दी, तो यह माना जाता है कि आपने उस लेखक की आलोचना कर दी. अंगरेजी में समीक्षा विधा की बहुत कद्र आज भी बनी हुई है. समीक्षकों की अपनी विश्वसनीयता होती है. जो प्रतिष्ठित समीक्षक होते हैं, अगर वे किसी किताब की आलोचना कर दें, तो उससे किताब की बिक्री के ऊपर असर पड़ जाता है. दुख इस बात का है कि हिंदी की सबसे अधिक छपनेवाली विधा समीक्षा को लेकर अब भी पेशेवर नजरिये का अभाव है.

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