प्रभात खबर की मुहिम, मेरा दीया देश के नाम

Updated at : 19 Oct 2016 1:15 AM (IST)
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प्रभात खबर की मुहिम, मेरा दीया देश के नाम

अनुज कुमार सिन्हा कर्ज चुकाने, फर्ज निभाने और अपने देश को मजबूत करने का सही वक्त आ गया है. सीमा पर रक्षा करते हुए आैर दुश्मन-आतंकियाें से लड़ते हुए हमारे अनेक जवानाें ने शहादत दी है. साेचिए, हम-आप ताे दीपावली मनायेंगे. उस शहीद परिवार पर क्या गुजर रहा हाेगा, जिसके पति, पिता या बेटे ने […]

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अनुज कुमार सिन्हा
कर्ज चुकाने, फर्ज निभाने और अपने देश को मजबूत करने का सही वक्त आ गया है. सीमा पर रक्षा करते हुए आैर दुश्मन-आतंकियाें से लड़ते हुए हमारे अनेक जवानाें ने शहादत दी है. साेचिए, हम-आप ताे दीपावली मनायेंगे. उस शहीद परिवार पर क्या गुजर रहा हाेगा, जिसके पति, पिता या बेटे ने शहादत देकर हम सभी की रक्षा की है, देश की रक्षा की है. कम से कम एक दीया उन शहीदाें के नाम ताे आप हर हाल में जलायें. यही तय करें. यही उन शहीदाें के प्रति सम्मान हाेगा. ठीक है हमारे बहादुर सैनिकाें ने सीमा पार जाकर, उनकी मांद में घुस कर आतंकियाें का खात्मा कर अपने शहीद सैनिक भाइयाें की माैत का बदला ले लिया, पर इतना ही काफी नहीं है.

इस समस्या का स्थायी निदान हाेना चाहिए. यह वक्त है पहचान करने का. दुश्मन आैर दाेस्ताें काे पहचानने का. यह साेचने का, कि कहीं हम जाने-अनजाने दुश्मन देशाें की मदद ताे नहीं कर रहे हैं. साेचिए, वे हमारे देश में बम-पटाखे, खिलाैने, दीया-मूर्ति के साथ-साथ हजाराें सामान भेजते हैं, हम पैसा खर्च कर उन्हें खरीदते हैं, पैसा उनके देश में जाता है आैर इसी पैसे का वे हमारे खिलाफ, हमारे देश के खिलाफ, हमारे सैनिकाें के खिलाफ उपयाेग करते हैं. हमारे पैसे से ही हमारा नाश करने की रणनीति बनाते हैं. हम सब इसे समझते क्याें नहीं? अब नहीं चेतेंगे ताे कब चेतेंगे?

ठीक है दुनिया बदल रही है. धंधे का दाैर है. लाभ-हानि काे देखने का समय है. कम से कम कीमत पर हम सामान खरीदने में विश्वास करते हैं. यही कारण है कि पड़ाेसी देशाें में बने सामान हमारे घराें में अंदर तक घुस गये हैं. माेबाइल सेट हाे, सिम हाे, टेलीविजन सेट हाे, इलेक्ट्राॅनिक सामान हाे, खिलाैना हाे, बर्तन हाे या राेजमर्रा के अन्य सामान, हमारे घर में ये घुस चुके हैं. इन्हें एका-एक राेकना संभव नहीं दिखता. लेकिन राेकने का प्रयास ताे किया जा सकता है. तय कर लें कि हम स्वदेशी चीजें ही खरीदेंगे (जहां तक संभव हाे सके) चाहे इसके लिए हमें अधिक कीमत ही क्याें न देनी पड़े. देश का पैसा देश में रहे. नहीं चाहिए हमें बाहर से आये सस्ती बिजली के सामान, नहीं चाहिए हमें दूसरे देशाें में बनी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, नहीं चाहिए हमें विदेशी पटाखे. कम से कम इन चीजाें पर ताे हम अंकुश लगा सकते हैं. हां, बड़े सामानाें में थाेड़ा वक्त लगेगा. तब तक, जब तक हमारी तकनीक इतनी समृद्ध नहीं हाे जाती कि हम कम से कम कीमत पर उसका उत्पादन कर सकें. दाेनाें चीजें नहीं चलेंगी. देश से प्यार करने की बात भी आैर सस्ती विदेशी चीजें भी चाहिए. तय करें कि इस दीपावली में हम-आप दीया जलायेंगे, अपने देश में बनाया हुआ, अपनी मिट्टी से बना दीया. अपने देश में बनी मूर्तियाें की पूजा करेंगे. साेचिए, इससे कितना बड़ा फर्क पड़ेगा. विदेशाें से आ रहे सस्ते सामान ने देश के कुम्हाराें काे बरबाद कर दिया है. वे अपने पारंपरिक पेशे काे छाेड़ रहे हैं. उन्हें बचाना हाेगा. इसे बचाने का दायित्व भी हम सभी का है. खुशी की बात यह है कि देश इस मामले पर अब गंभीर दिखता है. अाकलन है कि इस बार दीपावली में विदेशी उत्पादाें की खपत 30 फीसदी तक घट सकती है. हां, यह इसका स्थायी समाधान तभी हाेगा, जब हम अपनी तकनीक काे बेहतर कर सस्ती दर पर अपने ही देश में उत्पादन करने लगें. मत भूलिए कि अभी भी हमारे देश के बड़े-बड़े कामाें का ठेका पड़ाेसी देशाें काे दिया हुआ है.
देश के बारे में साेचना हाेगा. साेचिए. आंकड़ा देखिए. सिर्फ एक ताकतवर पड़ाेसी के साथ भारत का व्यापार घाटा 44 बिलियन यूएस डॉलर है. इसे काैन पाटेगा. पड़ाेसी देशाें की हजाराें कंपनियां हमारे यहां लगी हुई हैं. एक-एक कर हमारे देशज उद्याेग खत्म हाे रहे हैं. कीमत में वे मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं. याद कीजिए, 115 साल बाद आपके पास सशक्त स्वदेशी आंदाेलन चलाने का अवसर आया है. सात अगस्त 1905 काे बंगाल विभाजन के खिलाफ काेलकाता के टाउन हॉल में यह अांदाेलन आरंभ हुआ था. बाद में पूरे देश में फैल गया. अंगरेजाें के खिलाफ एक बड़ा सशक्त आंदाेलन बन गया था. इसकी अगुवाई बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, अरविंदाे घाेष, सैयद हैदर रजा, चिदंबरम पिल्लै जैसे देशभक्त कर रहे थे. अब फिर ऐसे नेताआें की देश काे जरूरत है, ताकि देश में सशक्त स्वदेशी आंदाेलन चल सके. समय लगेगा, परेशानी हाेगी, लेकिन देश काे अगर आर्थिक ताैर पर मजबूत करना है, ताे इन परेशानियाें काे सहना हाेगा. काम आसान नहीं है. आप राताे-रात सारी विदेशी चीजें फेंक नहीं सकते. वे ताे हमारे-आपके घराें में भरे पड़े हैं, लेकिन धीरे-धीरे उन चीजाें से आपकाे नफरत (कड़ा शब्द भले ही हाे) करनी हाेगी, अपनी माटी-अपने देश से लगाव बढ़ाना हाेगा. ताे चलिए, इसकी शुरुआत आज से ही करें. दीपावली में जितना आपसे बन सके, उतना ताे पहले कर ही लीजिए. अपने गांव-शहर में बने दीयाें काे जलायें, शहीदाें के नाम पर भी एक दीया जलायें. यही शहीद जवानाें के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हाेगी, सम्मान हाेगा.
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