ब्रिक्स घोषणापत्र से आगे

Updated at : 18 Oct 2016 1:36 AM (IST)
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ब्रिक्स घोषणापत्र से आगे

गोवा में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स देशों के राष्ट्रपतियों को आतंकवाद पर भारत की चिंताओं से अवगत कराते हुए इस बात पर जोर दिया था कि पड़ोसी देश की विध्वंसक नीतियां विकास और समृद्धि की राह में बड़ा अवरोध हैं. ऐसे में सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र में पाकिस्तान-समर्थित […]

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गोवा में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स देशों के राष्ट्रपतियों को आतंकवाद पर भारत की चिंताओं से अवगत कराते हुए इस बात पर जोर दिया था कि पड़ोसी देश की विध्वंसक नीतियां विकास और समृद्धि की राह में बड़ा अवरोध हैं.

ऐसे में सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र में पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद और आतंकी गिरोहों का उल्लेख न होना कूटनीतिक तौर पर भारत के लिए निराशाजनक है. उड़ी हमले के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के भारत के कूटनीतिक और राजनयिक प्रयासों को काफी सफलता मिली है. इससे उम्मीद जगी थी कि ब्रिक्स भी सीमा-पार के आतंक के विरुद्ध कठोर रवैया अपनायेगा, लेकिन चीन के हस्तक्षेप के कारण ऐसा न हो सका.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने गोवा में चीन और पाकिस्तान की मजबूत दोस्ती का हवाला देते हुए कहा कि चीन आतंकवाद को किसी देश, जातीयता और धर्म से जोड़ने का पक्षधर नहीं है. चीन का यह रुख आश्चर्यजनक नहीं है. पाकिस्तान को चीन से न सिर्फ आर्थिक और सैनिक मदद मिलती है, बल्कि चीन ने सुरक्षा परिषद् में आतंकी सरगना मसूद अजहर पर पाबंदी लगाने के भारतीय प्रस्ताव को भी रोक रखा है. चीनी राष्ट्रपति ने शी जिनपिंग ने सम्मेलन के प्राथमिक सत्र में ‘क्षेत्रीय समस्याओं के राजनीतिक समाधान’ की बात कह कर यह संकेत भी दे दिया था कि वे भारत-पाकिस्तान वार्ता के पक्ष में हैं. अब जरूरत इस बात की है कि भारत अपनी कूटनीतिक क्षमता का इस्तेमाल कर चीन समेत विभिन्न देशों के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने की कोशिशें जारी रखे. बहरहाल, संयुक्त घोषणापत्र में ब्रिक्स को बेहतर अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में विकसित करने तथा आपसी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है, और वैश्विक आतंक के विरुद्ध साझा साझेदारी की जरूरत को भी रेखांकित किया गया है.

ब्रिक्स के साथ बिम्सटेक देशों के संवाद ने भी सहयोग की नयी संभावनाओं के द्वार खोले हैं. दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सहभागिता और साझेदारी बढ़ने पर पाकिस्तान को अलग-थलग रखने की भारतीय नीति को ताकत मिलेगी. राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थायित्व को प्राथमिकता देने के कारण भारत के लिए पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को शह देने का मुद्दा महत्वपूर्ण बना रहेगा, लेकिन हमें चीन समेत विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर भी ध्यान देना है. ऐसा करके ही हमारे कूटनीतिक प्रयासों को मदद मिलेगी और पाकिस्तान को हाशिये पर रखने का उद्देश्य भी पूरा होगा.

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