आम आदमी की पाठशाला

Updated at : 10 Aug 2016 5:49 AM (IST)
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आम आदमी की पाठशाला

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार मैंने उसे तब देखा था, जब वह पांच साल का रहा होगा. पतला-दुबला, संगमरमरी रंग, सुतवां नाक और काजल से सजी बड़ी-बड़ी आंखें. वह प्रेस के लिए कपड़े लेने घर आता था. अपने नन्हे हाथों से कपड़ों की पोटली उठा कर वह अपने सिर पर रखता और रेलिंग पकड़ कर धीरे-धीरे […]

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क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
मैंने उसे तब देखा था, जब वह पांच साल का रहा होगा. पतला-दुबला, संगमरमरी रंग, सुतवां नाक और काजल से सजी बड़ी-बड़ी आंखें. वह प्रेस के लिए कपड़े लेने घर आता था. अपने नन्हे हाथों से कपड़ों की पोटली उठा कर वह अपने सिर पर रखता और रेलिंग पकड़ कर धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरता.
उसे ज्यादा कपड़े देने में डर लगता. इतना छोटा बच्चा कैसे उठायेगा! लगता था कि लाख कहते रहो कि बच्चों से काम नहीं करवाना चाहिए, मगर बच्चों से तो अपने माता-पिता ही खूब काम करवाते हैं. अब तो सरकार ने भी नियम बना दिया है कि अपने घरेलू व्यवसाय-व्यापार में चौदह साल तक के बच्चे भी काम कर सकते हैं. ऐसे में घरेलू काम और बच्चे को अपना रिश्तेदार बता कर काम करवाना बहुत आसान हो गया है. अब तो बाल श्रम का डर भी नहीं रहेगा.
खैर, जिस लड़के की बात कर रही हूं वह अकसर मिलता. उसकी पढ़ाई के बारे में भी बातें होतीं. धीरे-धीरे समय बीता. फिर उसके साथ उसका छोटा भाई भी आने लगा, और फिर उससे भी छोटा. छोटे भाइयों ने उसका काम संभाल लिया, तो उसका आना बंद हो गया.
कई वर्षों में अब वह गबरू जवान हो गया है. मूंछें उग आयी हैं. जींस और टी-शर्ट पहनता है. एक दिन मैंने उससे पूछा तो बताया कि वह नाइंथ में पढ़ता है. मैंने कहा- नाइंथ में तो तू पिछली साल भी था. तो उसने कहा- फेल हो गया था. यह कह कर उसने आंखें नीची कर लीं.
दिल्ली में जब से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने रेहड़ी वालों को न हटाने का एलान किया है, तब से सड़क के दोनों किनारे रेहड़ी वालों की बाढ़ आ गयी है. एक दिन उसी बड़े लड़के को भुट्टे और कच्चे खीरों का ठेला लगाये देखा. वहीं थोड़ी दूर पर उसका छोटा भाई कच्चा नारियल बेच रहा था.
मैंने पूछा- अरे! तुमने पढ़ाई छोड़ दी? उसने बताया कि वह शाम को पढ़ने जाता है, तब ठेला उसके पापा संभालते हैं. मैंने पूछा- एक दिन में कितना कमा लेते हो‍? उसने सकुचाते हुए कहा- तीन-चार सौ. हालांकि, उसके चेहरे से लगा कि वह अपनी हर रोज की कमाई के बारे में हर एक को नहीं बताना चाहता. फिर भी उसकी बताने के हिसाब से यह तो पता चल ही गया कि वह हर महीने पंद्रह-बीस हजार रुपये कमा लेता है.
मध्यवर्ग के बच्चे जहां छुट्टियां शुरू होते ही संगीत सीखते हैं, ताइक्वांडो, डांस और थिएटर की क्लास में जाते हैं, दूर-दराज की यात्राओं पर निकलते हैं, वहीं ये गरीब बच्चे अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए कोई काम करने के बारे में सोचते हैं.
एक आदमी एक साथ तरह-तरह के कई काम करता है. एक चायवाला चाय बेच रहा है. चाय के साथ तरह-तरह के बिस्कुट-टॉफी भी उपलब्ध हैं. पान और पान मसाला, शीतल पेय, पत्र-पत्रिकाएं, ब्रेड आदि भी हैं. साथ में फीस लेकर मोबाइल, बिजली, टेलीफोन आदि के बिल देने की सुविधा भी है.
इसके अलावा घर-घर सामान सप्लाई और प्राॅपर्टी डीलिंग का धंधा भी. सामने ग्राहकों के बैठने के लिए पार्क में लगी एक बेंच उखाड़ कर रख दी गयी है. इन्फ्रास्ट्रक्चर का कोई खर्चा नहीं, सिर्फ शारीरिक मेहनत और कमाई. परिवार के हर हाथ को काम है. बस काम करने और उससे पैसा बनाने का जज्बा और होशियारी चाहिए.
ऐसे किसी एक व्यक्ति में ही बहुत सारे एंटरप्रेनरशिप के पाठ पढ़े जा सकते हैं. इसे मल्टीटास्किंग का नाम देकर बड़े-बड़े बिजनेस स्कूल में पढ़ाया जाता है. बच्चे लाखों रुपये खर्च करके इन्हें सीखते हैं. मगर आम आदमी पटरी बाजार और जीवन की पाठशाला में जो पाठ पढ़ता है, वह अनोखा होता है. अनुभव की प्रयोगशाला सबसे बड़ी शिक्षक होती है और अनुभव एक-दूसरे से सीख-कर ही मिलता है.
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