संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

Updated at : 04 Aug 2016 1:48 AM (IST)
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संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई बलात्कार की घृणित घटना ने एक बार फिर राजनीति, प्रशासन और समाज के भयानक खोखलेपन को जाहिर किया है. घटना के बाद प्रशासन की आपराधिक लापरवाही और अब अपनी खामियों पर परदा डालने के इरादे से दिये गये राज्य में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रोफेसर रामगोपाल यादव […]

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उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई बलात्कार की घृणित घटना ने एक बार फिर राजनीति, प्रशासन और समाज के भयानक खोखलेपन को जाहिर किया है. घटना के बाद प्रशासन की आपराधिक लापरवाही और अब अपनी खामियों पर परदा डालने के इरादे से दिये गये राज्य में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रोफेसर रामगोपाल यादव और मंत्री आजम खान के बयान राजनीतिक संवेदनहीनता के निम्न स्तर को इंगित करते हैं.

उत्तर प्रदेश में 2015 में बलात्कार की घटनाओं में 161 फीसदी तथा बलात्कार के प्रयासों में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. हजारों मामले अदालतों में लंबित है, तो अनेक मामलों में समुचित जांच न हो पाने के कारण दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है. बड़े दुर्भाग्य की बात है कि पूरे देश में महिलाओं पर अत्याचारों की घटनाओं में तेजी आयी है. देश की राजधानी दिल्ली में सिर्फ इसी साल 450 बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामले सामने आये हैं. इसके साथ ही ऐसे मामलों में राजनेताओं की अमानवीय सोच के उदाहरण भी देशभर में हैं और इनमें कमोबेश हर पार्टी के नेता शामिल हैं. क्या ऐसी मानसिकता के साथ बलात्कार जैसे अपराधों पर लगाम लगायी जा सकती है? यह भी सोचा जाना चाहिए कि क्या बलात्कार को एक अपराध के रूप में सिर्फ कानून-व्यवस्था की कमी का मामला माना जाये?

आंकड़े बताते हैं कि तकरीबन 90 फीसदी मामलों में दोषी पीड़िता के परिवारजन, संबंधी और परिचित होते हैं. बलात्कार जैसे अपराधों पर चुप्पी और पीड़िता को ही दोष देने की मानसिकता हमारे समाज में गहरे तक पैठी हुई है. अगर यह सुनिश्चित भी हो जाये कि दोषी व्यक्ति को विधान के मुताबिक सजा होगी ही, तब भी क्या किसी सचेत नागरिक को संतोष कर लेना चाहिए? चिंताजनक तथ्य है कि पीड़ितों की सामाजिक पुनर्वापसी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और हमारे सभ्य सामाजिक तंत्र में एक बड़ा मुश्किल सवाल है. यह सब परेशानियां बलात्कार के बारे में हमारी सोच और संवेदनाओं की सीमा के कारण पैदा हुई हैं. स्त्री के शरीर के साथ हुए अपराध को उसकी आत्मा पर लगे घाव के रूप में देखने की समझ हम निरंतर आधुनिक होते जाने के बावजूद अब तक विकसित नहीं कर सके हैं. पितृ-प्रधान समाज स्त्री को शरीर-मात्र मानने की सोच से ऊपर नहीं उठ सका है. प्रशासनिक स्तर पर देखें, तो पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. अक्षम और भ्रष्ट पुलिस तंत्र निगरानी, जांच और गिरफ्तारियों को लेकर बेहद लापरवाह है. अदालतों में न्याय की बाट जोहते पीड़ितों और उनके परिवार जल्दी ही हिम्मत हार जाते हैं. चार साल पहले दिल्ली के निर्भया मामले के बाद बिफरे जनाक्रोश के दबाव में बलात्कार के मामलों में जल्दी सुनवाई का प्रावधान किया गया था, पर इस संबंध में प्रगति बेहद सुस्त है. विश्लेषकों का मानना है कि समाज, प्रशासन और न्यायालय के रवैये के कारण बलात्कार के ज्यादातर मामले तो सामने ही नहीं आ पाते हैं. जब भी कुछ मामलों को लेकर चर्चा होती है, तो राजनीतिक दल अपने स्वार्थ साधने के इरादे से परस्पर आरोप-प्रत्यारोपों में उलझ जाते हैं. थोड़े दिनों के बाद मामला शांत हो जाता है, पर थानों में बलात्कार की शिकायतें बढ़ती जाती हैं, पीड़ितों की सिसकियां और घुटन उसकी नियति बनते जाते हैं.

आखिर बलात्कार जैसा मुद्दा राजनीतिक विषय कैसे हो सकता है? इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद क्यों होना चाहिए? क्या आजादी के सात दशकों के बाद भी इतनी समझ हमारे नेताओं और राजनीति को नहीं आयी है कि बलात्कार जैसे मसलों पर क्या कहना और क्या करना चाहिए? हमें इस तथ्य को भी स्वीकार करना होगा कि न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित संस्थानों में सुधार की मांग बहुत गंभीरता से नहीं उठायी गयी है. इस कारण राजसत्ता, प्रशासन और न्यायपालिका पर जवाबदेही का दबाव भी बहुत नहीं है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 में देशभर में बलात्कार, यौन-शोषण, अपहरण और दुर्व्यवहार जैसे महिलाओं के विरुद्ध हुए अपराधों के 3,37,922 मामले दर्ज किये गये थे.

यह संख्या 2013 की तुलना में नौ फीसदी अधिक थी. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 38 फीसदी बलात्कार पीड़ितों की उम्र 18 वर्ष से कम थी. दिल्ली में त्वरित सुनवाई के लिए नौ अदालतें होने के बावजूद बलात्कार के 93 फीसदी मामले लंबित हैं. वर्ष 2013 में देशभर में ऐसे लंबित मामलों की संख्या करीब एक लाख थी. जहां हर घंटे बलात्कार के तीन-चार मामले दर्ज होते हैं, वहां क्या इसको लेकर समाज और सरकार के स्तर पर बेचैनी नहीं होनी चाहिए?

क्या शासन और विपक्ष में बैठे राजनेताओं को निहित स्वार्थों से परे इसकी रोकथाम के उपायों पर विमर्श नहीं करना चाहिए? क्या पुलिस और अदालत को अपनी जिम्मेवारी निभाने के लिए तत्पर नहीं होना चाहिए? क्या बलात्कार जैसे अपराध की संकीर्ण समझ से ग्रस्त समाज और परिवार के स्तर पर मानसिकता में बदलाव की कोशिश नहीं होनी चाहिए? इन सवालों के जवाब से ही भविष्य की दशा और दिशा का निर्धारण हो सकेगा.

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